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सर्वकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 268

३०८ सूरसागर सार सटीक

के उर्ध्व और अध (ऊपर और नीचे) नभ, तल तथा वरुण (जल) और वायु के कारण
रूप मुरारी (कृष्ण को) देखने के लिए अन्तर दृष्टि की आवश्यकता है। मन, बुद्धि,
चित्त, अहकार तथा दसो इन्द्रियो को प्रेरित तथा स्तम्भित करने वाले कृष्ण के लिये
ये अबला नारियां वियोग का विचार करती । जिसको जैसा रूप रुचिकर हो उसे ही
अपने बस मे कर लो । आसन पर बैठो तथा ध्यान धारण करो तथा मन का आरोहण
कीजिये । छः दल कमल, आठ दल कमल, निर्मल बारह दल (पर ध्यान) तथा अजपा
जाप करो । त्रिकुटी के संगम तथा ब्रह्म द्वार को भेदकर वनमाली (कृष्ण से) मिलो ।
जिस तरह से सब मुनियो ने समझाया है, उसके लिये ग्यारह गीता साक्षो है। श्रीमुख
(कृष्ण के) सदेश को ऊधो ने इस प्रकार गोपियो को सुनाया ॥११६॥
ऊधौ हमारी सौं तुम जाहु ।
यह गोकुल पूनौ कौ चंदा, तुम ह्वै आए राहु ।
ग्रह के ग्रसे गुसा परगास्यौ, अब लौं करि निरबाहु ।
सब रस लै नंदलाल सिधारे, तुम पठाए बड़·साहु ।
जोग बेचि कै तदुल लौजै, बीच बसेरे खाहु !
सूरदास जबहीं उठि जैहौ, मिटिहै मन कौ दाहु ॥११७॥
अर्थ—ऊधो हमारी कसम तुम चले जाओ । यह गोकुल पूर्णिमा की चन्द्रमा है
तुम राहु होकर आये हो । ग्रह ग्रसे हम गोपियों को क्रोध दिलाते हो, अब तक उसका
निर्वाह किया, सब रस लेकर कृष्ण चले गये फिर बड़े सज्जन ने तुमको भेजा । योग
बेचकर चावल खरीद लो जिसे रास्ते के बसाव (टिकाव) मे खाना । सूरदास कहते हैं
(गोपियां कहती हैं) जब तुम उठकर जाओगे तभी हृदय की दाह मिटेगी ॥११७॥
ऊधौ मौन साधि रहे ।
जोग कहि पछिताति मन-मन, बहुरि कछु न कहै ।
स्याम कौं यह नहीं बूझै, अतिहि रहे खिसाइ ।
कहा मैं कहि-कहि लजानी, नार रह्यौ नवाई ।
प्रथम ही कहि बचन एकै, रह्यौ गुरु करि मानि ।
सूर प्रभु मोकौं पठायौ, यहै कारन जानि ॥११८॥
अर्थ—उद्धव ने चुप्पी साध ली । योग कहकर मन-ही-मन मे पछताते हैं फिर
कुछ नही कहा । कृष्ण के लिये यह उचित नही था, यह सोचकर क्रुद्ध हुये । पहले तो
मैं व्यर्थ ही कह-कहकर लज्जित हुआ तथा (ऊधो) गर्दन झुका ली । सूरदास कहते है
पहले एक ही वचन (सिद्धान्त अद्वैत) कह कर तथा मुझे गुरुवत् सम्मान देकर प्रभु ने
मुझे भेजा, उसका यही कारण जान पडता है (मुझे मूर्ख बनाने के लिये ही इस प्रकार
से कृष्ण ने भेजा यही रहस्य की बात मालूम पड़ती है) ॥११८॥
मधुकर भली करी तुम आए ।
वै बातैं कहि कहि या दुख में, ब्रज के लोग हँसाए ।