सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउद्धव संदेश २६५
राजकुमार भलेँ हम जाने, घर मैँ कंस की दासी।
सूरदास जदुकुलहिँ लजावत, ब्रज मैं होति है हाँसी ॥८४॥
अर्थ--उद्धव, तुम पास के रहने वाले हो। यह निर्गुण लेकर उन्हें सुनाओ जो
सिर मुड़ाये हुए (संन्यासी) काशी में बसते हैं। मुरली धरने वाले (कृष्ण के) समस्त
अंग सुन्दर है (वह) रूप-सिंधु की राशि है। (तुम) योग बटोरकर लिए फिरते हो,
(जो) ब्रजवासियों के लिए फांसी के समान है। राजकुमार (कृष्ण) को हम भली-भाँति
जानती हैं, (तथा उनके) घर में (जो) कंस की दासी (कुबरी) है (वह भी ज्ञात है)।
सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) (कृष्ण) यदुकुल को लज्जित करते हैं, तथा ब्रज
में हँसी होती है ॥८४॥
जा दिन तैँ गोपाल चले ।
ता दिन तैँ ऊधौ या ब्रज के, सब स्वभाव बदले ।
घटे अहार बिहार हरष हित, सुख सोभा गुन गान ।
ओज तेज सब रहित सकल बिधि, आरति असम समान ।
बाढ़ी निसा, बलय आभूषन, उर-कंचुकी उसास ।
नैननि जल अंजन अंचल प्रति, आवन अवधि की आस ।
अब यह दसा प्रगट या तन की, कहियौ जाइ सुनाइ ।
सूरदास प्रभु सो कीजौ जिहिँ, बेगि मिलहिँ अब आइ ॥८५॥
अर्थ—जिस दिन से गोपाल गये, उसी दिन से उद्धव, इस ब्रज का सब स्वभाव
बदल गया। आहार, विहार, हर्ष, स्नेह, सुख, शोभा, गुणगान (सब कुछ) घट गया।
सब तरह से ओज-तेज सबसे रहित हो गये तथा सभी समान रूप से आर्त्त तथा अन्य-
वस्थित है। रात बढ़ गयी, केयूर-कंकण आदि तथा अन्य आभूषण (बढ़े पड गये)।
वक्ष पर कंचुकियां और उसासें बढ़ गई। नेत्रो का जल अंजन को आंचल की ओर (बहा
ले जाता है) केवल आने की अवधि की आशा है। प्रत्यक्ष ही इस शरीर की दशा को
जाकर सुनाकर कहना। सूरदास कहते हैं (गोपियां ऊधो से कहती हैं) कृष्ण से कुछ
ऐसा उपाय कीजिएगा ताकि अब तो शीघ्र आकर मिल जाएं ॥८५॥
हम तौ कान्ह केलि की भूखी।
कहा करैँ लै निगुर्न तुम्हरौ, बिरहिनि बिरह बिदूषी ।
कहियै कहा यहै नहिं जानत, कही जोग किहि जोग ।
पालगौँ तुमहीँ सेवा पुर, बसत बावरे लोग ।
चंदन, अभरन, चीर चारु बर, नेकु आप तन कीजै ।
दंड, कमंडल, भसम, अधारी, तब जुवतिनि कौँ दीजै ।
सूर देखि दृढ़ता गोपिन की, ऊधौ दृढ़ व्रत पायौ ।
करी कृपा जदुनाथ मधुप कौँ, प्रेमहिँ पढ़न पठायौ ॥८६॥