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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 254

२८४ सूरसागर सार, सटीक
यह ब्यौपार तुम्हारौ ऊधौ, ऐसैं ही धरचौ रैहै।
जिन पै तैं लै आए ऊधौ, तिनहिं के पेट समैहै।
दाख छांड़ि कै कटुक निबौरी, को अपने मुख खैहै।
गुन करि मोहि सूर साँवरैं, को निरगुन निरवैहै॥८२॥
अर्थ—योग की ठगमाया यहां नही बिकेगी। मूली के पत्तो के बदले, मुक्ताहल
कौन देगा। उद्धव ! तुम्हारी यह व्यापार (की सामग्री) ऐसे ही रखी रह जायेगी।
जिनसे लाये हो उन्ही के पेट मे यह समायेगी। द्राक्ष (अंगूर) छोडकर कटु निम्ब फल
कौन अपने मुख मे डालेगा। सूरदास कहते है (गोपियां कहती है) हम कृष्ण के गुणो
को समझ कर उन पर मोहित हुई हैं अतः हम निर्गुण से निर्वाह कैसे कर सकती
हैं? ॥८२॥
मीठी बातनि मैं कहा लीजै।
जौ पै वै हरि होहिं हमारे, करन कहैं सोइ कीजै।
जिन मोहन अपनैं कर काननि, करनफूल पहिराए।
तिन मोहन माटी के मुद्रा, मधुकर हाथ पठाए।
एक दिवस बेनी बृन्दावन, रचि पचि बिबिध बनाइ।
ते अब कहत जटा माथे पर, बदलौ नाम कन्हाइ।
लाइ सुगन्ध बनाइ आभूषण, अरु कीन्ही अरधंग।
सो वै अब कहि-कहि पठवत हैं, भसम चढ़ावन अंग।
हम कहा करैं दूरि नँद-नंदन, तुम जु मधुप मधुपाती।
सूर न होहिं स्याम के मुख की, जाहु न जारहु छाती ॥८३॥
अर्थ—मीठी बातों मे क्या (मजा) लिया जाय। जो यदि वे कृष्ण हमारे (ही)
हैं तो (जो) करने के लिए कहते है वही कीजिये। जिन मोहन ने अपने हाथो से कान
मे कर्णफूल पहनाये, उन्ही मोहन ने उद्धव के हाथ से मिट्टी की मुद्रा भेजी है। जिन्होंने
एक दिन वृन्दावन में विविध प्रकार से रच-रचकर वेणी गूंथी, वही अब मस्तक पर
जटा धारण करने को कहते हैं, (इस तरह) उनका 'कन्हाइ' नाम बदल दो। कृष्ण
सुगंधित (पुष्प) लाकर, आभूषण बनाकर (हमे) अर्धांगिनी (पत्नी) बनाया। वही अब
अंगो पर भस्म चढ़ाने के लिए कह-कह भेजते हैं। हम क्या करे कृष्ण दूर हैं तुम मधु
पर गिरने (पतित होने) वाले भ्रमर ठहरे ! ये बाते कृष्ण के मुख की नही हैं, जाओ
(हमारी) छाती न जलाओ ॥८३॥
ऊधौ तुम हौ निकट के बासी।
यह निरगुन लै तिनहिं सुनावहु, जे मुड़िया बसैं कासी।
मुरलीधरन सकल अंग सुन्दर, रूप सिंधु की रासी।
जोग बटोरे लिए फिरत हौ, ब्रजवासिन की फाँसी।