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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 266

३०६ सूरसागर सार सटीक
सूरदास कहते है (गोपियां कहती हैं) कृष्ण ने मधुवन में निवास करते ही सब कुछ
भुला दिया ।।१११।।
ऊधौ जो हरि हितू तुम्हारे ।
तौ तुम कहियौ जाइ कृपा करि, ए दुख सबै हमारे ।
तन तरिवर उर स्वास पवन मैँ, बिरह दवा अति जारे ।
नहिं सिरात नहिं जात छार ह्वै, सुलंगि-सुलगि भए कारे ।
जद्यपि प्रेम उमंगि जल सींचे, वरषि-बरषि घन हारे ।
जौ सींचे इहिँ भाँति जतन करि, तौ एतैँ प्रतिपारे ।
कीर कपोत कोकिला चातक, बधिक वियोग विडारे ।
क्यौँ जीवैँ इहिँ भाँति सूर प्रभु, ब्रज के लोग विचारे ।।११२।।
अर्थ—उद्धव ! यदि कृष्ण तुम्हारे हितैषी हैं तो उनसे जाकर कृपा करके कहना
हमारे दुख इस प्रकार हैं । शरीर रूपी वृक्ष मे सांस रूपी पवन ने विरह की दावाग्नि
को अत्यधिक प्रज्वलित कर दिया । न तो (शरीर) शीतल होता है न जलकर राख
हो जाता है बल्कि सुलग-सुलग कर काला हो गया है । यद्यपि प्रेम ने उमगकर जल
बरसाया तथा (आंखें रूपी वादल) वरस-वरस कर हार गये । जो इतने यत्न पूर्वक
इसे सींचा तो (किसी तरह ये) बचा पायी । वियोग रूपी वधिक ने तोता, कबूतर,
कोयल, चातक आदि को भगा दिया । सूरदास कहते है (गोपियां कहती हैं) इस
प्रकार बेचारे ब्रज के लोग कैसे जीवित रहे ।।११२।।
बिलग हम मानैँ ऊधौ काकौ ।
तरसत रहे बसुदेव देवकी, नहिं हित मातु पिता कौ ।
काके मातु पिता को काको, दूध पियौ हरि जाकौ ।
नंद जसोदा लाड़ लड़ायौ, नाहिं भयौ हरि ताकौ ।
कहियौ जाइ बनाइ बात यह, को हित है अबला कौ ।
सूरदास प्रभु प्रीति है कासौँ, कुटिल मीत कुविजा कौ ।।११३।।
अर्थ—उद्धव, हम किस-किस बात का बुरा माने । (कृष्ण) वसुदेव तथा
देवकी के लिये तरसते रहे (यशोदा नन्द) माता-पिता के हित को नही माना । कौन
उनका माता-पिता है (माता-पिता वही है) जिनका कृष्ण ने दूध पिया है । नन्द तथा
यशोदा ने कृष्ण को लाड़-प्यार किया लेकिन कृष्ण उनके नही हुए । जाकर कृष्ण से
बात बनाकर कहना (हम) अबलाओं का (उनके) क्या हित है । सूरदास कहते है
(गोपियां कहती है) कुब्जा के कुटिल मित्र कृष्ण को किससे प्रेम है ।।११३।।
जीवन मुख देखे कौ नीकौ ।
दरस, परस दिन राति पाइयत, स्याम पियारे पी कौ ।
सुनौ जोग कहा लै कीजै, जहाँ ज्यान है जी कौ ।
नैननि गूँदि मूँदि कह देखौँ, बैवौ ज्ञान पोथी कौ ।