सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०० सूरसागर सार सटीक
जा सकते है। वहाँ वे यादव पति स्वामी कहलाते हैं लेकिन हमे वटे नही लगते ।
कौन देवकी वसुदेव ( की बात करे ), फोन जाने तथा कौन समझे । सूरदास कहते हैं
(गोपियाँ कहती है) कृष्ण को देखते और मुझे अन्य कोई नही सूझता ॥६६॥
मन मैं रह्यौ नाहिंन ठौर ।
नंद-नंदन अछत कैसैं, आनियै उर और ।
चलत चितवत दिवस जागत, स्वप्न सोवत राति ।
हृदय तैं वह मदन मूरति, छिन न इत उत जाति ।
कहत कथा अनेक ऊधौ, लोग लोभ दिखाइ ।
कह करौं मन प्रेम पूरन, घट न सिंधु समाइ ।
स्याम गात सरोज आनन, ललित मृदु मुख हास ।
सूर इनकेँ दरस कारन, मरत लोचन प्यास ॥६७॥
अर्थ—मन मे स्थान अवशिष्ट (बचा) नही है । कृष्ण के रहते हुए हृदय मे
किसी और को कैसे लाया जाय ? चलते, देखते, दिन मे जागते, स्वप्न तथा रात मे
सोते हृदय से वह कामदेव तुल्य (कृष्ण की) मूर्ति क्षण भर भी इधर-उधर नही जाती ।
उद्धव ! लोग लालच दिखाकर अनेक कथाये कहते है लेकिन क्या करूँ, मन प्रेम से पूर्ण
है और घडे मे सागर समा (भी) नही सकता । श्याम शरीर, कमलमुख, ललित तथा
मधुर हंसी के दर्शन के लिए नेत्र प्यासे मरते हैं ॥६७॥
मधुकर स्याम हमारे चोर ।
मन हरि लियौ तनक चितवनि मैं, चपल नैन की कोर ।
पकरे हुते हृदय उर अंतर, प्रेम प्रीत कैं जोर ।
गए छँड़ाइ तोरि सब बंधन, दै गए हँसनि अंकोर ।
चौंकि परीं जागत निसि बीती, दूत मिल्यौ इक भौंर ।
सूरदास प्रभु सरबस लुट्यौ, नागर नवल-किसोर ॥६८॥
अर्थ—मधुकर (उद्धव) ! कृष्ण हमारे (मन) को चुराने वाले हैं । चंचल नयनो
के कोर से, क्षणिक निगाह से मेरे मन को चुरा लिया । हृदय के अन्दर प्रेम के बल से
उन्हे पकड रखा था । हँसी का घूस ( अस्थायी सुख ) देकर, सारे वधनों को छुड़ाकर
तथा (बधनो को) तोड़कर मुक्त हो गए । इसके बाद चौक कर जग पडी तथा रात
जागते ही बीत गयी, बाद मे दूर पर एक भ्रमर (उद्धव) मिला । सूरदास कहते हैं
(गोपियाँ कहती हैं) चतुर नवल किशोर कृष्ण सर्वस्व लूट ले गये ॥६८॥
सब दिन एकहिं से नहिं होतैं ।
तब अलि ससि सीरी अब ताती, भयो बिरह जरि मोतैं ।
तब षट मास रास-रस-अंतर, एकहु निमिष न जाने ।
अब औरै गति भई कान्ह बिनु, पल पूरन जुग माने ।