सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
१८६ सूरसागर सार सटीक
कछु मैं हूँ पहिचानति तुमकौं, तुमहिं मिलाऊँ नंद-दुलारी।
काहे कौं तुम सकुचति हौ जू, कहौ काह है नाम तुम्हारी।
ऐसो सखी मिली तोहिं राधा, तौ हमकौं काहै न बिसारी।
सूरदास दम्पति मन जान्यौ, यातैं कैसें होत उबारी ॥११८॥
अर्थ- बस मथुरा मे ही तुम्हारा निवास है। राधा के द्वारा यह उपकार हुआ
कि तुम्हारा दुर्लभ दर्शन हो गया। वार-वार हाथ पकड कर देखती है (ओर कहती
है) घूंघट की ओट को दूर क्यो नही करती हों। कभी कपोल (गाल) छूकर हाथ छूती
है फिर चुटकी लेती है कि मेरी तरफ देखो। मैं तुमको कुछ पहचान रही हूँ, तुम्हे
कृष्ण से मिला दूँगी। तुम क्यो संकोच करती हो, कहो तुम्हारा क्या नाम है ? राधा
तुम ऐसी सखी पाकर हम जैसी सखियो को क्यो न भूल जाओ। सूरदास कहते है कि
कृष्ण और राधा दोनों मन मे जान गये कि अब इससे कैसे उवार हो ॥११८॥
ऐसी कुंवरि कहाँ तुम पाई।
राधा हूँ तें नख-सिख सुंदरि, अब लौं कहाँ दुराई।
काकी नारि, कौन की बेटी, कौन गाउँ तैं आई।
देखी सुनी न ब्रज, वृन्दावन, सुधि-बुधि हरति पराई।
धन्य सुहाग भाग याकौ, यह जुवतिनि की मनभाई।
सूरदास-प्रभु हरषि मिले हँसि, लै उर कठ लगाई ॥११९॥
अर्थ-अर्थतुम ऐसी कुमारी (कुंवरि) कहाँ पा गई। राधा से भी इसके नख-
शिख सुन्दर है, (ऐसे अंगो को) अब तक कहाँ छिपाये थी। किसकी स्त्री है, किसकी
बेटी है और किस गाँव से आई है। ब्रज और वृन्दावन मे (तुम्हे) न तो देखा है न
सुना है। (तुम) दूसरे की स्मृति और बुद्धि दोनों हरती हो। इसका सुहाग और भाग्य
दोनो धन्य है जो कि इन युवतियो के मन को भा गयी। सूरदास कहते है कि कृष्ण
हँसकर गले से लगाकर मिल गये ॥११९॥
नँद-नंदन हँसे नागरी-मुख चितै, हरषि चंद्रावलि कंठ लाई।
बाम भुज रवनि, दच्छिन भुज सखी पर, चले बन धाम सुख
कहि न जाई।
मनौ बिबि दामिनि, बीच नव घन सुभग, देखि छवि काम रति-
सहित लाजै।
किधौं कंचन-लता, बीच सुतमाल तरु, भामिनिनि बीच
गिरिधर विराजै।
गए गृहकुंज, अलिगुंज, सुमननि पुंज, देखि आनंद भरे सूर स्वामी।
राधिका-रवन, जुवती-रवन, मन-रँवन निरखि छवि होत मन-
काम कामी ॥१२०॥
राधाकृष्ण . १८३
अर्थ - कृष्ण नागरि के मुख को देखकर हंसे और हर्षित होकर उन्होंने चंद्रावली
को गले से लगा लिया । बायी भुजा राधा पर और दाहिनी सखी पर रखकर वन की
ओर चले । (यह) शोभा कही नही जा सकती (अकथनीय है) । कृष्ण मानो दो
बिजलियों के बीच सुन्दर नवीन बादल हों । इस छवि को देखकर रति सहित काम
लज्जित होते हैं । मानो कंचन की लताओं के बीच सुन्दर तमाल का'वृक्ष हो, ऐसे ही
(दोनो) स्त्रियों के बीच कृष्ण शोभित हैं । वे कुंज-गृह मे गये और भ्रमर के गुंजार
तथा पुष्पों के पुंज को देखकर आनन्द से भर गये । सूरदास कहते हैं कि राधिका-
रमण, युवती-रमण, मनरमण (कृष्ण) की छवि को देखकर काम के मन में भी
कामेच्छा उत्पन्न हो गयी ॥१२०॥
मान लीला
मोहिं छुवौ जनि दूर रहौ जू ।
जाकौं हृदय लगाइ लयौ है, ताकीँ बाँह गहौ जू ।
तुम सर्वज्ञ और सब मूरख, सो रानी अरु दासी ।
मैंँ देखत हिरदय वह बैठी, हम तुमकौँ भइ हाँसी ।
बाँह गहत कछु सरम न आवति, सुख पावति मन माहींँ ।
सुनहु सूर मो तन यह इकटक, चितवति, डरपति नाहीँ ॥१२१॥
अर्थ - मुझे छुओ मत दूर रहो । जिसको हृदय से लगाया हो उसी की बांह
पकड़ो । तुम सर्वज्ञ हो और सब मूर्ख हैं ? वह रानी है और सब दासी हैं ? मैं देखती
हूँ कि वह हृदय में बैठी है, मैं तुम्हारे लिए हँसी की पात्री हूँ । बाँह पकड़ते कुछ लाज
नही आती, (ऊपर से) मन में सुख पाती है । सूरदास कहते हैं कि (राधा कहती है)
यह मेरी ओर एकटक देखती है और डरती नही ॥१२१॥
कहा भई धनि बाबरी, कहि तुमहिं सुनाऊँ ।
तुम तैं को है भावती, जिहिं हृदय बसाऊँ ।
तुमहिं स्रवन, तुम नैन हौ, तुम प्रान-अधारा ।
वृथा क्रोध तिय क्यों करौ, कहि बारम्बारा ।
भुज गहि ताहि बतावहु, जेहि हृदय बतावति ।
सूरज प्रभु कहै नागरी, तुम तैं को भावति ॥१२२॥
अर्थ - प्रिया तुम क्या पागल हो गयी हो, तुम्हे कैसे कहकर सुनाऊँ । तुमसे
अधिक प्रिय लगने वाली और कौन है जिसे (अपने) हृदय मे बसा लूं । तुम ही श्रवण
हो, तुम ही नेत्र हो और तुम ही प्राण की आधार हो । बार-बार कहकर, हे स्त्री,
क्रोध क्यो करती हो । भुजा पकड़कर उसे बताओ जिसे हृदय मे बताती हो । सूरदास
कहते हैं कि कृष्ण नागरि (राधा) से कहते है कि तुमसे अधिक कौन मुझे अच्छी
लगती है ॥१२२॥
पियहिं निरखि प्यारी हँसि दीन्हौ ।
रीझे स्याम अंग-अंग निरखत, हँसि नागरि उर लीन्हौ ।
१३
१६४ सूरसागर सार सटीक
आलिंगन दै अधर दसत खंडि, कर गहि चिबुक उठावत ।
नासा सौं नासा लै जोरत, नैन नैन परसावत ।
इहिं अंतर प्यारी उर निरख्यौ, झझकि भई तब न्यारी ।
सूर स्याम मोकौं दिखरावत, उर ल्याए धरि प्यारी ॥१२३॥
अर्थ—प्रिय को देखकर प्यारी ने हँस दिया । कृष्ण अंग-अंग देखकर रीझ
गये, हँसकर उन्होने नागरि (राधा) को हृदय से लगा लिया । आलिंगन देकर,
अधरो पर दांतो के चिह्न देकर, हाथ से ठुड्डी पकड़कर उठाते हैं । नाक से नाक
जोड़ते हैं, नेत्र से नेत्र स्पर्श कराते हैं । इसी बीच प्यारी ने वक्ष-स्थल को देखा और
तब झिझककर अलग हो गयी । सूरदास कहते हैं कि मुझे दिखाते हुए कृष्ण ने प्यारी
को पकड़कर हृदय से लगा लिया ॥१२३॥
मान करौ तुम और सवाई ।
कोटि करौ एकै पुनि द्वै हौ, तुम अरु मोहन माई ।
मोहन सो सुनि नाम श्रवनहौँ, मगन भई सुकुमारी ।
मान गयौ, रिस गई तुरतहीँ, लज्जित भई मन भारी ।
धाइ मिली दूतिका कंठ सौं, धन्य-धन्य कहि बानी ।
सूर स्याम बन धाम जानिकै, दरसन कौँ अतुरानी ॥१२४॥
अर्थ—अब तुम सवाया (और अधिक) मान करो । हजारों यत्न करो, तुम और
मोहन अन्ततः एक ही होगे । मोहन का नाम कान से सुनकर सुकुमारी राधा प्रसन्न हो
गयी । मान समाप्त हो गया, तुरन्त ही क्रोध चला गया, मन मे अत्यधिक लज्जित हुई ।
धन्य-धन्य की वाणी कहकर, दौड़कर दूती के गले से लिपट गयी । सूरदास कहते हैं कि
कृष्ण को कुन्ज वन मे जानकर (राधा) दर्शन के लिए आतुर हो गयी ॥१२४॥
चलौ किन मानिनि कुंज-कुटीर ।
तुव बिनु कुँवर कोटि बनिता तजि, सहत मदन की पीर ।
गदगद स्वर संभ्रम अति आतुर, स्रवत सुलोचन नीर ।
क्वासि क्वासि वृषभानु नंदिनी, बिलपत बिपिन अधीर ।
बंसी बिसिष, माल ब्यालावलि, पंचानन पिक कीर ।
मलयज गरल, हुतासन मारुत, साखामृगरिपु चीर ।
हिय मैं हरषि प्रेम अति आतुर, चतुर चली पिय तीर ।
सुनि भयभीत बज्र के पिंजर, सूर सुरति-रनधीर ॥१२५॥
अर्थ—मानिनी कुन्ज-कुटीर क्यों नही चलती । तुम्हारे बिना कृष्ण हजारो स्त्रियो
को छोड़कर काम-पीड़ा सह रहे हैं। गद्गद स्वर तथा भ्रम के साथ आतुर होकर आंखो
से आंसू गिराते हैं । वृषभानु की बेटी (राधा) कहाँ है, कहां है (कहकर) वे वन में
विलाप कर रहे हैं ? (उनके लिए) वंशी वाण, माला सर्प, कोयल तथा तोता सिंह,
मलयज विष, वायु अग्नि, चोर शाखामृग (बन्दर) के शत्रु (कांटा) के समान हो गए
हैं। यह सुनकर काम क्रीडा में धैर्य धारण करने वाली राधा का कठोर मन भय
विह्वल हो गया और वे चतुर (राधा) हिय में हर्षित तथा प्रेम से आतुर होकर प्रिय
के पास चली ॥१२५॥
स्याम नारि कैँ बिरह भरे।
कबहुँक बैठन कुंज द्रुमनि तर, कबहुँक रहत खरे।
कबहुँक तनु की सुरति बिसारत, कबहुँक तनु सुधि आवत।
तब नागरि के गुनहिं बिचारत, तेई गुन गनि गावत।
कहूँ मुकुट, कहूँ मुरलि रही गिरि, कहूँ कटि पीत पिछौरी।
सूर स्याम ऐसी गति भीतर, आइ दूतिका दौरी ॥१२६॥
अर्थ—कृष्ण नारी (राधा) के विरह से आकुल हैं। कभी कुन्ज के वृक्षों के नीचे
बैठते हैं, कभी खड़े रहते हैं। कभी उन्हे शरीर की स्मृति भूल जाती है, कभी शरीर की
स्मृति आ जाती है। तब नागरि (राधा) के गुणो का विचार करते हैं, उसी के गुणों
का गुणगान करते हैं। कही मुकुट, कही मुरली तथा कही पीताम्बर तथा पिछौरी गिर
गयी है। सूरदास कहते हैं कि ऐसी अवस्था मे दूती दौडती हुई आई ॥१२६॥
धनि वृषभानु-सुता बड़ भागिनि।
कहा निहारति अंग-अंग-छवि, धन्य स्याम-अनुरागिनि।
और त्रिया नख-शिख सिंगार सजि, तेरैं सहज न पूरैँ।
रति, रम्भा, उरवसी, रमा सी, तोहिं निरखि मन झूरैँ।
ये सब कंत सुहागिनि नाहीं, तू है कंत-पियारी।
सूर धन्य तेरी सुन्दरता, तोसी और न नारी ॥१२७॥
अर्थ—बडे भाग्य वाली वृषभानु की बेटी (राधा) धन्य हो। अंग-अंग की
शोभा को क्या देखती हो। श्याम की अनुरागिनी (तुम) धन्य हो। अन्य स्त्रियां नख
से शिख तक श्रृंगार करके तुम्हारे सहज (सौंदर्य) की वरावरी नही कर सकती। तुम
रति, रंभा, उर्वशी के समान हो, तुम्हे देखकर मन झुलस जाता है। ये सब कंत
(कृष्ण) की सुहागिनी नही है तुम्ही कृष्ण को प्यारी हो। सूरदास कहते हैं कि
तुम्हारी सुन्दरता धन्य है, तुम्हारे समान और कोई नही है ॥१२७॥
सँग राजति वृषभानु कुमारी।
कुंज सदन कुसुमनि सेज्या पर, दम्पति सोभा भारी।
आलस भरे मगन रस दोऊ, अंग-अंग प्रति जोहत।
मनहुँ गौर स्यामल ससि नव तन, बैठे संमुख सोहत।
कुंज भवन राधा-मनमोहन, चहूँ पास ब्रजनारी।
सूर रहीँ लोचन इकटक करि, डारतिं तन मन वारी ॥१२८॥
अर्थ—कृष्ण के साथ राधा शोभित है। कुन्ज-सदन में कुसुम की शय्या पर
दम्पति की अत्यधिक शोभा है। आलस्य से भरे दोनो रस मग्न है, तथा एक-दूसरे के
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अंग की ओर देखते हैं। मानों गोरे और श्याम चन्द्रमा नवीन शरीर धारण कर
सम्मुख बैठे हैं। सूरदास कहते हैं कि वे निर्निमेष नेत्रो से उन पर अपना तन मन
न्योछावर कर डालती है ॥१२८॥
खण्डिता प्रकरण
काहे कौं कहि-गए आइहैं, काहैं झूठी सौंहैं खाए ।
ऐसे मैं नहिं जाने तुमकौं, जे गुन करि तुम प्रकट दिखाए ।
भली करी यह दरसन दीन्हे, जनम जनम के ताप नसाए ।
तब चितए हरि नैंकु तिया-तन, इतनैहिं सब अपराध छमाए ।
सूरदास सुन्दरी सयानी, हँसि लीन्हे पिय अंकम लाए ॥१२६॥
अर्थ-क्यो कहा था कि आयेगे और क्यो झूठी सौगंध खाई थी । मैं तुम्हे ऐसा
नही जानती थी, (मेरे लिए ये अपरिचित थे) जिन गुणो को तुमने प्रत्यक्ष दिखाया ।
अच्छा किया कि यह दर्शन दिया और जन्म-जन्म के ताप को नष्ट कर दिया । तब
कृष्ण ने तनिक प्रिया की ओर देखा, इतने मे ही सब अपराधो की क्षमा मांग ली ।
सूरदास कहते है कि सुन्दर सयानी राधा ने हँसकर प्रिय को अंक में ले लिया ॥१२६॥
धीर धरहु फल पावहुगे ।
अपनेहीँ सुख के पिय चाँड़े, कबहुँ तौ बस आवहुगे ।
हम सौं कहत और की औरै, इन बातनि मन भावहुगे ।
कबहुँ राधिका मान करैगी, अन्तर बिरह जनावहुगे ।
तब चरित्र हमहीँ देखैंगी, जैसैँ नाच नचावहुगे ।
सूर स्याम अति चतुर कहावत, चतुराई बिसरावहुगे ॥१३०॥
अर्थ-धीरज धरो, फल पाओगे । अपने ही सुख से प्रज्वल लालसा वाले कभी
तो वश मे आओगे । हमसे और का और कहते हो, इन्ही बातो से मन को अच्छे
लगोगे । कभी राधा मान करेगी तथा विरह का अन्तर जताओगे । तब जैसा नाच
नचाओगे उस चरित्र को हम ही देखेगी । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण तुम बहुत चतुर
हो, उस समय चतुरता भुला दोगे ॥१३०॥
मैं हरि सौं हो मान कियौ री ।
आवत देखि आन बनिता-रत्त, द्वार कपाट दियौ री ।
अपनैं हीँ कर साँकर सारी, संधिहिँ सन्धि सियौ री ।
जौ देखौं तो सेज सुमूरति, काँप्यौ रिसनि हियौ री ।
जब झुकि चली भवन तैँ बाहरि, तब हठि लौटि लियौ री ।
कहा कहौँ कछु कहत न आवै, तहँ गोविंद बियौ री ।
विसरि गई सब रोष, हरष मन, पुनि फिरि मदन जियौ री ।
सूरदास प्रभु अति रति नागर, छलि मुख अमृत पियौ री ॥१३१॥
अर्थ—मैंने कृष्ण से मान किया। दूसरी स्त्री मे रत कृष्ण को आते देखकर
द्वार के किवाड बन्द कर-दिये। अपने ही हाथ से सभी जंजीरों को तथा छिद्रों को बन्द
कर दिया। पर जब देखती हूँ तो सेज पर सुन्दर मूर्ति वाले कृष्ण दिखाई दिये। क्रोध
से मेरा हृदय काँप गया। जब क्रुद्ध होकर भवन से बाहर चली तब हठकर (अपने को)
लोटा लिया। क्या कहूँ कुछ कहा नही जाता। वहाँ दूसरे गोविन्द थे। सब क्रोध भूल
गयी, मन हर्षित हो गया। फिर काम की इच्छा जी गयी। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण
रति क्रीडा मे अत्यधिक चतुर हैं, छलकर उन्होने सुख का अमृत पी लिया ॥१३१॥
नंद-नंदन सुखदायक हैं।
नैन सैन दै हरत नारि मन, काम काम-तनु दायक हैं।
कबहुँ रैनि बसत काहू कैं, कबहुँ भोर उठि आवत हैं।
काहू कौ मन आपु चुरावत, काहू कैं मन भावत हैं।
काहू कै जागत सगरी निसि, काहूँ बिरह जगावत हैं।
सुनहु सूर जोइ जोइ मन भावै, सोइ सोइ रंग उपजावत हैं ॥१३२॥
अर्थ—कृष्ण सुख देने वाले है। नेत्रों का संकेत देकर स्त्रियो के मन को हर
लेते हैं। कामातुर शरीर मे (और) इच्छा पैदा करते है। कभी (किसी के यहाँ) रात
मे बसते है, कभी प्रातः उठकर आते है। किसी के मन को स्वयं चुराते है और किसी
के मन को स्वयं भा जाते हैं। किसी (के साथ) सारी रात जागते हैं, किसी के विरह
को जगा देते है। सूरदास कहते हैं कि जो मन को अच्छा लगता है वही रङ्ग उत्पन्न
करते हैं ॥१३२॥
नाना रंग उपजावत स्याम । कोउ रीझति कोउ खीझति बाम ॥
काहू कैं निसि बसत बनाइ । काहू मुख छुवै आवत जाइ ॥
बहु नायक ह्वै बिलसत आपु । जाकौ सिव पावत नहिं जापु ॥
ताकौं ब्रजनारी पति जानैं । कोउ आदरैं, कोउ अपमानैं ॥
काहू सौं कहि आवन साँझ । रहत और नागरि घर माँझ ॥
कबहुँ रैन सब सग बिहात । सुनहु सूर ऐसे नँद-तात ॥१३३॥
अर्थ—कृष्ण अनेक रंग उत्पन्न करते हैं, जिससे कोई स्त्री प्रसन्न होती है और
कोई खीझती है। किसी के यहां रात मे अच्छी तरह बसते हैं, आते-जाते किसी के मुख
को छूते हैं। बहुत से नायक का रूप धर के आप विलास करते हैं। जिसे शिव तप
करके नही पाते, उसे ब्रज की स्त्रियाँ पति रूप में जानती है। कोई (उनका) आदर
करती है कोई अपमान करती है। सन्ध्या समय किसी से आने के लिए कह आते हैं
और रहते है किसी और स्त्री के घर। कभी उनकी रात सबके साथ व्यतीत होती
है। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण ऐसे ही हैं ॥१३३॥
अब जुवतिनि सौं प्रगटे स्याम ।
अरस-परस सबहिनि यह जानी, हरि लुब्धे सबहिनि कैं धाम ।
१८८ सूरसागर सार सटीक
जा दिन जाकै भवन न आवत, सो मन मैं यह करति विचार ।
आजु गए औरहिं काहू कैं, रिस पावति, कहि बड़े लवार ।
यह लीला हरि कैं मन भावत, खंडित वचन कहत सुख होत ।
साँझ बोल दै जात सूर-प्रभु, ताकैं आवत होत उदोत ॥१३४॥
अर्थ—अब युवतियों के साथ कृष्ण प्रकट हुए । मिल-जुल कर सब ने यह जाना
कि कृष्ण सब ही के घर पर लुब्ध हैं । जिस दिन जिसके घर नही आते उस दिन वह
मन में यही विचार करती है कि आज कृष्ण (किसी) और के घर गये है । (वह)
क्रोधित होती है और कहती है कि वह बहुत धूर्त हैं। यह लीला कृष्ण के मन को अच्छी
लगने वाली है । खंडित वचन कहने पर उन्हे सुख मिलता है । सूरदास कहते है कि
सन्ध्या समय आने को कह जाते हैं पर आते-आते सबेरा हो जाता है ॥१३४॥
राधिका गेह हरि-देह-बासी । और तिय घरनि घर तनु-प्रकासी ॥
ब्रह्म पूरन द्वितीय नहिं कोऊ । राधिका सबै हरि सबै वोऊ ॥
दीप सौं दीप जैसैं उजारी । तैसैं हौ ब्रह्म घर-घर बिहारी ॥
खंडिता बचन हित यह उपाई । कबहुँ कहुँ जात, कहुँ नहिं कन्हाई ॥
जन्म कौ सुफल हरि यहै पावैं । नारि रस-वचन श्रवननि सुनावैं ॥
सूर-प्रभु अनतही मगन कीन्हौ । तहाँ नहिं गए जहाँ बचन दीन्हौ ॥१३५॥
अर्थ—राधिका का निवास-स्थान कृष्ण के शरीर मे स्थित उनका हृदय है,
जबकि और गोपियां अपने शरीर के घर-घर को प्रकाशित करती हैं । ब्रह्म पूर्ण रूप से
व्याप्त है, दूसरा कोई नही है । राधिका सब कुछ है वही कृष्ण की सब कुछ है । दीपक
से जैसे दीपक जलाया जाता है, वैसे ही ब्रह्म घर-घर विहार करने वाला है । खंडित
(खण्डिता नायिका के उपालम्भ) वचन (सुनने) के हित से कृष्ण (ऐसा) व्यवहार करते
है कि कभी कही जाते हैं (कभी) कही नही जाते । जन्म की सफलता कृष्ण को इसी
मे मिलती है कि स्त्रियां रस युक्त वचन कानो को सुनाये । सूरदास कहते हैं कि प्रभु
ने अन्यत्र गमन किया, वहां नही गये जहां के लिए वचन दिया था ॥१३५॥
मध्यम मान
स्याम पिया सन्मुख नहिं जोवत ।
कबहुँ नैन की कोर निहारत, कबहुँ बदन पुनि गोवत ।
मन-मन हँसत त्रसत तनु परगट, सुनत भावती बात ।
खंडित वचन सुनत प्यारी के, पुलक होत सब गात ।
यह सुख सूरदास कछु जानै, प्रभु अपने कौं भाव ।
श्री राधा रिस करति, निरखि मुख, तिहिं छवि पर ललचाव ॥१३६॥
अर्थ—कृष्ण प्रिया (राधा) के सम्मुख नही देखते । कभी नेत्रो की कोर को
देखते है, कभी फिर मुख छिपाते है । मन-ही-मन हँसते हैं, शरीर प्रकट करने से
डरते हैं । मन को अच्छी लगने वाली बात सुनते है । प्यारी (राधा) की खंडित वाणी
राधाकृष्ण १८४
सुनकर उनका समस्त शरीर पुलकित होता है। सूरदास प्रभु के भावों को अपनाकर
यह सुख कुछ-कुछ जानते है। श्रीराधा क्रोध करती है, उस (क्रोधित मुख) की छवि
(भक्त तथा कृष्ण को) ललचा देने वाली है ।।१३६।।
नैन चपलता कहाँ गँवाई।
मोसौँ कहा दुरावत नागर, नागरि रैन जगाई।
ताही कैँ रँग अरुन भए हैं, धनि यह सुन्दरताई।
मनौ अरुन अंबुज पर बैठे, मत्त भृंग रस पाई।
उड़ि न सकत ऐसे मतवारे, लागत पलक जम्हाई।
सुनहु सूर यह अंग माधुरी, आलस भरे कन्हाई ।।१३७।।
अर्थ-नेत्रों की चंचलता कहाँ गँवा दी। नागर कृष्ण मुझसे क्यों छिपाते
हो? रात में नागरि (अन्य स्त्री) ने (तुम्हें) जगाया है। उसी के रंग से (नेत्र) लाल
हो गये हैं। यह सुन्दरता धन्य है। मानों लाल कमल पर बैठे मतवाले भ्रमर रस पी
रहे हों। ऐसे मतवाले हो गये हैं कि उड़ नहीं सकते। पलकों में आलस (जम्हाई)
लग रहा है। सूरदास कहते हैं कि (राधा कहती है) यह आलस भरे कृष्ण के अंग
की मधुरिमा है ।।१३७।।
यह कहि कै तिय धाम गई।
रिसनि भरी नख-सिख लौँ प्यारी, जोबन-गर्व-भई।
सखी चलीँ गृह देखि दसा यह, हठ करि बैठी जाइ।
बोलति नहीं मान करि हरि सौँ, हरि अंतर रहे आइ।
इहिँ अंतर जुवती सब आईं, जहाँ स्याम घर-द्वारैँ।
प्रिया मान करि बैठि रही है, रिस करि क्रोध तुम्हारैँ।
तुम आवत अतिहीँ झहरानी, कहा करी चतुराई।
सुनत सूर यह बात चकित पिय, अतिहिँ गए मुरझाई ।।१३८।।
अर्थ-यह कहकर प्रिया (राधा) घर गयी। यौवन गर्व से युक्त प्यारी नख से
शिख तक क्रोध से भर गयी। सखियाँ इस दशा को देखकर अपने घर चलीं। राधा
हठ करके बैठ गयी, कृष्ण से मान करके किसी से बोलती नहीं, इसी बीच कृष्ण आ
गये। इसके बाद सभी युवतियाँ वहीं आईं (जहाँ) कृष्ण घर के द्वार पर खड़े थे।
(फिर कहने लगी) प्रिया तुम्हारे ऊपर क्रोध कर मान करके बैठी है। तुम्हारे आते
ही अत्यधिक झल्लाई, तुमने (इस समय) क्या चतुरता की। सूरदास कहते हैं यह
सुनते ही चकित प्रिय कृष्ण अत्यधिक मुरझा गये ।।१३८।।
नैंकु निकुंज कृपा करि आइये।
अति रिस कृस ह्वै रही किसोरी, करि मनुहार मनाइयै।
कर कपोल अन्तर नहिं पावत, अति उसास तन ताइयै।
छूटे चिहुर बदन कुम्हिलानी, सुहथ संवारि बनाइयै।
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२०० सूरसागर सार सटीक
इतनी कहा गाँठि कौ लागत, जी बातनि सुख पाइयै ।
रूठेहिं आदर देत सयाने, यहै सूर जस गाइयै ॥१३६॥
अर्थ—कृपा करके तनिक निकुंज मे आइये । अत्यधिक क्रोध से किशोरी
(राधा) दुर्बल हो रही है, उसे विनय पूर्वक मान लीजिए । हाथ और कपोल दोनों का-
अन्तर नही होता (अर्थात् हाथ पर कपोल रखे रहती है), अत्यधिक उच्छ्वास से
शरीर को तपाती है । अपने सुन्दर हाथों से सँवारे उसके बाल छूट गये है, मुख कुम्हला
गया है । जो बातों से ही सुख पाया जा सकता है, तो इसमे गाँठ का क्या लगता है
अर्थात् क्या खर्च होता है । रूठे हुए व्यक्ति को सज्जन (श्रेष्ठ लोग) आदर देते हैं ।
सूरदास इसका यश गाते है ॥१३८॥
बैठि मानिनी गहि मौन ।
मनौ सिद्ध समाधि सेवत, सुरनि साधे पौन ।
अचल आसन, पलक तारी, गुफा घूँघट-भौन ।
रोषही कौ ध्यान धारै, टेक टारै कौन ।
अबहिँ जाइ मनाइ लीजै, अबसि कीजै गौन ।
सूर के प्रभु जाइ देखौ, चित्त चौंधी जोन ॥१४०॥
अर्थ—मानिनी मौन धारण करके बैठी है । मानो सिद्ध समाधि का सेवन कर
रही है और देवता प्राण वायु सिद्ध (अवरुद्ध) किए हुए हैं । वह अचल आसन पर
बैठी है, पलक को लगातार रोके है (ध्यान लगाये है) । घूंघट के बीच का स्थान
गुफा के समान है । क्रोध पर ही ध्यान धारण किये हुए है, उसे हठ करके कौन टाल
सकता है । अभी जाकर उसे मना लीजिए । (उसके पास) अवश्य गमन कीजिए ।
सूरदास कहते हैं कि (सखी कहती है) कृष्ण जाकर उस चिन्ता से तिलमिलायी
(राधा) को अवश्य देखो ॥१४०॥
स्यामा तू अति स्यामहिं भावै ।
बैठत-उठत, चलत, गौ चारत, तेरौ लीला गावै ।
पीत बरन लखि पीत बसन उर, पीत धातु अंग लावै ।
चन्द्राननि सुनि, मोर चन्द्रिका, माथैँ मुकुट बनावै ।
अति अनुरागि सैनि संभ्रम मिलि, संग परम सुख पावै ।
बिछुरत तोहिँ क्वासि राधा कहि, कुज-कुंज प्रति धावै ।
तेरी चित्र लिखैँ, अरु निरखैँ, बासर-बिरह नसावै ।
सूरदास रस-रासि-रसिक सौं, अन्तर क्यौँ करि आवै ॥१४१॥
अर्थ—श्यामा (राधा) तू कृष्ण को अत्यधिक प्रिय है । बैठते, उठते, चलते,
गाय चराते तुम्हारी ही लीला गाते है । (तुम्हारे) पीले रंग को (शरीर को) देखकर
पीताम्बर हृदय से लगाते है, तथा पीली धातु का (शरीर पर) लेप करते है । (तुझे)
चन्द्रमा के समान मुख वाली जानकर मोर चन्द्रिका से मस्तक का मुकुट बनाते हैं ।
अत्यधिक अनुराग पूर्ण इशारे तथा संभ्रम से मिलकर साथ में परम सुख प्राप्त करते
हैं। तुमसे बिछुड़ते ही 'राधा कहां हो' कहकर कुंज-कुंज में दौड़ते हैं। तेरा चित्र
बनाते है और देखते हैं, इस प्रकार दिवस का विरह दूर करते हैं। सूरदास कहते है
कि रस की राशि कृष्ण से भेद-भाव क्यों करती हो ॥१५४१॥
राधे हरि तेरौ नाम विचारैँ।
तुम्हरेइ गुन ग्रन्थित करि माला, रसनाकर सौँ टारैँ।
लोचन-मूँदि ध्यान धरि, दृढ़ करि, पलकन नैंकु उघारैँ।
अंग अंग प्रति रूप माधुरी, उर तैँ नहीँ बिसारैँ।
ऐसो नेम तिहारे पिय कैँ, कह जिय निठुर तिहारैँ।
सूर स्याम मनकाम पुरावहु, उठि चलि कहैँ हमारैँ ॥१५४२॥
अर्थ-हे राधा कृष्ण तेरे नाम का ही विचार करते रहते है। तुम्हारे गुणो
की माला गूंथकर वाणी रूपी हाथ से घुमाते रहते हैं। आंख मूंदकर, दृढ़ करके पलको
को तनिक भी नहीं उघाड़ते। अंग-अंग के रूप माधुर्य को तनिक भी हृदय से विस्मृत
नही होने देते। तुम्हारे प्रिय का ऐसा नियम है, और दूसरी ओर तुम्हारा मन
कितना कठोर है। सूरदास कहते हैं कि (सखी कहती है) कृष्ण की मनोकामना पूर्ण
करो और हमारे कहने से उठ कर चलो ॥१५४२॥
कहा तुम इतनैँहि कौँ गरबानी।
जीवन रूप दिवस दसही कौ, जल अँजुरी कौ जानी।
तृन की अगिनि, धूम कौ मदिर, ज्यौँ तुषार-कन-पानी।
रिसहीँ जरति पतंग ज्योति ज्यौँ, जानत लाभ न हानी।
नरि कछु ज्ञानऽभिमान जाव दै, हैऽब कौन मति ठानी।
तन धन जानि जाम जुग छाया, भूलति कहा अयानी।
नवसै नदी चलति मरजादा, सुधियै सिन्धु समानी।
सूर इतर ऊसर के बरषैँ, थोरैँहि जल इतरानी ॥१५४३॥
अर्थ-इतने ही पर तुम क्यों गर्वित हो गयी हो। यह जीवन का सौंदर्य केवल
दस ही दिन (कुछ ही समय) के लिए है। यह अँजुली के जल के समान है। (यह) तृण
की आग, धुएं के मन्दिर तथा तुषारकण के पानी (की तरह क्षणिक है)। क्रोध से पतंग
जैसे ज्योति (आग) मे जल जाता है, वह लाभ हानि नही जान पाता। (अतः) कुछ
समझ-बूझ कर अभिमान छोड़ दे। अब कौन-सी बुद्धि ठान ली है। शरीर और धन को
दो घड़ी की छाया समझो। अज्ञानी इसे क्यों भूलती हो। समतल पर प्रवाहित नदियां
मर्यादा से चलकर सीधे समुद्र में समा जाती हैं। सूरदास कहते हैं कि (सखी कहती
है) अन्यथा ऊसर मे बरसने पर थोड़े ही जल से नदियां इतरा जाती हैं ॥१५४३॥
२०२ सूरसागर सार सटीक
रहि री मानिनी मान न कीजै ।
यह जोवन अँजुरी की जल है, ज्यौँ गुपाल माँगे त्यौँ दीजै ।
छिनु छिनु घटति, बढ़ति नहिँ रजनी, ज्यौँ ज्यौँ कलाचंद्र की छीजै ।
पूरब पुन्य सुकृत फल तेरौ, काहै न रूप नैन भरि पीजै ।
सौँह करति तेरे पाँइनि की, ऐसी जियनि दसौ दिन जीजै ।
सूर सु जीवन सफल जगत कौ, वैरी बाँधि विबस करि लीजै ॥१४४॥
अर्थ—हे मानिनी, मान मत करो और रुककर विचार करो। यह यौवन
अँजुली के जल के समान है, जैसे इसे कृष्ण माँगे उसी प्रकार इसे दे दो। ज्यों-ज्यों चन्द्र
की कला क्षीण होती है रात भी घटती है, बढ़ती नही। तेरे पूर्व पुण्य का फल है, क्यो
रूप को नेत्र भरकर नही पीती। तेरे चरणों की सौगन्ध करती हूँ कि ऐसी जिन्दगी
यदि दस दिन भी रहे तो उत्तम है। सूरदास कहते हैं कि (सखी कहती है) वही जगत
का जीवन सफल है कि वैरी को बाँध कर विवश कर लिया जाय ॥१४४॥
राधा सखी देखि हरषानी ।
आतुर स्याम पठाई याकौँ, अन्तरगत की जानी ।
वह सोभा निरखत अँग-अँग की, रही निहारि निहारि ।
चकित देखि नागरि मुख वाकौ, तुरत सिंगारनि सारि ।
ताहि कह्यौ सुख दै चलि हरि कौँ, मैं आवति हौँ पाछैँ ।
वैसेँहि फिरी सूर के प्रभु पैँ, जहाँ कुंज गृह काछैँ ॥१४५॥
अर्थ—राधा सखी को देखकर हर्षित हो गयी। आतुर कृष्ण ने इसे भेजा हैं,
(वह) मन की बात जान गयी। निहार-निहार कर वह शोभा देखती रही। नागरि
(राधा) चकित होकर उसके मुख को देखकर तुरन्त श्रृंगार से सजाकर उससे कहा कि
आगे चल कर कृष्ण को सुख दो मैं पीछे आ रही हूँ। सूरदास कहते हैं तुरन्त ही कृष्ण
के पास उसी स्थान को वापस चली जिस कुंज-भवन मे कृष्ण शोभित थे ॥१४५॥
हरषि स्याम तिय बाँह गही ।
अपनैँ कर सारी अँग साजत, यह इक साध कही ।
सकुचति नारि बदन मुसुकानी, उतकौँ चितै रही ।
कोक-कला परिपूरन दोऊ, त्रिभुवन और नही ।
कुंज-भवन सँग मिलि दोउ बैठे, सोभा एक चही ।
सूर स्याम स्यामा सिर बेनी, अपनैँ करनि गुही ॥१४६॥
अर्थ—हर्षित होकर कृष्ण ने प्रिया की बांह पकड ली। वे अपने ही हाथ से
साड़ी से अंग सजाते हैं, यह (उनकी) एक अभिलाषा थी। सकुचाती हुई राधा मुख से
मुस्करायी और उधर (कृष्ण) की ओर देखती रही। दोनों काम कला से परिपूर्ण हैं।
तीनों लोक में और कोई ऐसा नही है। कुंज-भवन मे दोनो साथ मिलाकर बैठे थे और
राधाकृष्ण २०३
एक मात्र शोभा को देखते थे। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण ने राधा की वेणी अपने हाथ
से गूँथी ॥१४६॥
खंजन नैन सुरँग रस माते।
अतिसय चारु विमल, चंचल ये, पल पिंजरा न समाते।
बसे कहूँ सोइ बात सखी कहि, रहे इहाँ किहिं नातै ?
सोइ संज्ञा देखति औरासी, विकल उदास कला तैं।
चलि-चलि जात निकट स्रवननि के, सकि ताटंक फँदाते।
सूरदास अंजन गुन अटके, नतरु कबै उड़ि जाते ॥१४७॥
अर्थ—खंजन रूपी नेत्र सुन्दर रूप रस मे मद मस्त है। अत्यधिक सुन्दर तथा
विमल ये (चंचल) नेत्र पलक रूपी पिंजड़े मे नही समाते। सखी यह नेत्र (रात) मे कही
दूसरी जगह बसे है। फिर बता, यहाँ ये किस नाते रहें ? अपनी चंचलता के कारण ये
नेत्र उसी विचित्र संकेत (विशिष्ट मुद्रा) को देखते रहते है तथा (अन्य) कलाओ
(सौंदर्य) से सर्वथा व्याकुल एवं उदासीन रहते है। जान पड़ता है कि कानों में पहने
हुए ताटंक को फाँद कर चले जायेगे। सूरदास कहते हैं कि अंजन (कृष्ण के श्याम रंग)
के गुण (रस्सी) से अटके हुए हैं नही तो कभी के उड़ गये होते ॥१४७ ॥
धन्य धन्य बृषभानु-कुमारी, गिरिवरधर, बस कीन्हे (री)।
जोइ जोइ साध करी पिय रस की, सो सब उनकौँ दीन्हे (री)।
तोसी तिया और त्रिभुवन मैं, पुरुष स्याम से नाहीं (री)।
कोक-कला पूरन तुम दोऊ, अब न कहूँ हरि जाहीँ (री)।
ऐसे बस तुम भए परस्पर, मोसौँ प्रेम दुरावै (री)।
सूर सखी आनँद न सम्हारति, नागरि कंठ लगावै (रौ) ॥१४८॥
अर्थ - वृषभानु कुमारी (राधा) तुम धन्य हो, (क्योकि) तुमने गिरिधर कृष्ण
को वश में कर लिया। जो प्रिय के साथ किया वह सब उनको समर्पण कर दिया।
तुम्हारे समान स्त्री और कृष्ण के समान पुरुष त्रिभुवन मे कोई और नही है। तुम दोनो
काम कला से पूर्ण हो, अब कृष्ण कही और नही जायेंगे। तुम दोनों ऐसे प्रेम के वश
में हो गये हो, (किन्तु) मुझसे प्रेम छिपाती हो। सूरदास कहते हैं कि सखी आनन्द
नही सम्हाल पाती और राधा को गले से लगा लेती है ॥१४८॥
राधेहिं स्याम देखी आइ।
महा मान दृढ़ाइ बैठी, चितै कापैं जाइ।
रिसहिं रिस भइ मगन सुन्दरि, स्याम अति अकुलात।
चकित ह्वै जकि रहे ठाढ़े, कहि न आवै बात।
देखि ब्याकुल नंद-नंदन, सखी करति बिचार।
सूर दोऊ मिलैं जैसौं, करौं सोइ उपचार ॥१४६॥
२०४ सूरसागर सार सटीक
अर्थ—कृष्ण ने आकर राधा को देखा । वह महामान दृढ़ करके बैठी है (उस
मान को) कौन देख सकता है ? सुन्दरी क्रोध-ही-क्रोध मे मग्न हो गई है, (इसे देखकर)
कृष्ण अत्यधिक अकुलाते है । वे चकित होकर खड़े रहे । उनके मुख से बात नही निक-
लती है । कृष्ण को व्याकुल देखकर सखी विचार करती है कि ऐसा कोई उपचार करूं
कि कृष्ण और राधा दोनो मिल जाएँ ॥१५४॥
यह ऋतु रूसिवे की नाहीं ।
बरषत मेघ मेदिनी कैं हित, प्रीतम हरषि मिलाहीँ ।
जेती बेलि ग्रीष्म ऋतु डाहीं, ते तरवर लपटाहीं ।
जे जल बिनु सरिता ते पूरन, मिलन समुद्रहिं जाहीं ।
जोबन धन है दिवस चारि कौ, ख्यौ, बदरी की छाहीँ ।
मैं, दंपति-रस-रीति कही है, समुझि चतुर मन माहीं ।
यह चित धरि री सखी राधिका, दै दूती कौँ बाहीं ।
सूरदास उठि चलि री प्यारी, मेरैं सँग पिय' पाहीँ ॥१५०॥
अर्थ—यह रूठने की ऋतु नही है । बादल पृथ्वी के हित मे बरस रहे हैं,
(स्त्रियाँ) प्रियतम से हर्षित होकर मिल रही हैं । जितनी लताये ग्रीष्म ऋतु मे झुलस गयी
थी, वे वृक्ष से लिपट रही हैं। जो नदियां बिना जल की हो गयी थी, वे जल से पूर्ण
होकर समुद्र से मिलने जा रही हैं । यौवन धन केवल चार दिन का (क्षणिक) है, जैसे
बादल की छाया । मैंने दम्पति के रस की रीति कह दी, हे चतुर मन मे समझो और
अपने चित्त मे रख लो । सोच समझ कर दूती का अवलम्बन ग्रहण करो । सूरदास
कहते हैं कि (सखी कहती है) हे प्यारी, मेरे साथ उठकर प्रिय के पास चलो ॥१५०॥
तोहि किन रूठन सिखई प्यारी ।
नवल बैस नव नागरि स्यामा, वे नागर गिरधारी ।
सिगरी रैनि मनावति बीती, हा हा करि हौँ हारी ।
एते पर हठ छांड़ति नाहीं, तू वृषभानुदुलारी ।
सरद-समय-ससि-दरस समरसर, लागै उन तन भारी ।
मेटहु त्रास दिखाइ बदन-बिंधु, सूर स्याम हितकारी ॥१५१॥
अर्थ—प्यारी तुम्हे रूठना किसने सिखा दिया । राधा नयी उम्र की नवीन
चतुर सभ्य (कृष्ण की) प्रिया है । वे (कृष्ण) नागर गिरधारी है । सारी रात मनाते
हुए बीत गयी, विनती करके मै हार गयी । इतने पर तू वृषभानु की लाड़िली (राधा)
हठ नही छोड़ती । शरद के समय चन्द्र को देखकर काम का बाण उनके शरीर मे जोर
से लग गया है । अपने चन्द्रमा के समान मुख को दिखा कर कृष्ण के भय को मिटा
दो । (यह तेरा मुख ही) कृष्ण का हित करने वाला है ॥१५१॥
हरि-मुख राधा-राधा बानी ।
धरिनि परे अचेत नहीं सुधि, सखी देखि अकुलानी ।
राधाकृष्ण २०५
बासर गयौ, रैनि इक बीती, बिनु भोजन बिनु पानी ।
बाँह पकरि तब सखिनि जगायौ, धनि-धनि सारँगपानी ।
ह्वाँ तुम बिबस भए हौं ऐसे, ह्वाँ तौ वै बिबसानी ।
सूर बने दोउ नारि पुरुष तुम, दुहुँ की अकथ कहानी ॥१५२॥
अर्थ—कृष्ण के मुख मे 'राधा-राधा' की (ही) वाणी है। वे धरणी पर अचेत
पडे हैं। उन्हे (कुछ) स्मरण नही है। (ऐसी दशा देखकर) सखी आकुल हो गयी। दिन
बीत गया, एक रात भी बीत गयी, (किन्तु) वे बिना भोजन तथा पानी के पड़े हैं।
बांह पकड़कर सखियो ने उन्हें जगाया (और कहा) सारँगपाणि तुम धन्य हो। यहाँ
तुम इतने विवश हुए हो, वहाँ वे विवश है। सूरदास कहते है कि (सखियां कहती हैं)
तुम दोनो (अनोखे) स्त्री-पुरुष बने हो, दोनों की कहानी अकथनीय है ॥१५२॥
सुनि री सयानी तिय, रूसिबे कौ नेम लियौ, पावस दिननि
कोऊ ऐसौ है करत री ।
दिसि-दिसि घटा उठी, मिलि री पिया सौँ रूठी, निडर हियौ है
तेरौ नैँकु न डरत री ।
चलिए री मेरी प्यारी, मोकौँ मान देन हारी, प्रानहुँ तैँ प्यारे पति
धीर न धरत री ।
सूरदास प्रभु तोहिँ, दियौ चाहै हित-बित, हँस क्यों न मिलै तेरौ
नेम है टरत री ॥१५३॥
अर्थ—सुनो सयानी स्त्री तुमने रूठने का व्रत ले लिया है । पावस के दिनों में
कोई ऐसा करता है ? हर दिशा में घटाएं उठती हैं, हे रूठी प्रिय से मिलो, तुम्हारा
हृदय निडर है तनिक भी नही डरता । मेरी प्यारी चलो, मुझे मान देने वाली (राधा)
प्राणों से भी प्रिय (कृष्ण) धैर्य नही धारण करते । सूरदास कहते हैं (सखी कहती है)
कि कृष्ण तुम्हें हित-वित सब देना चाहते हैं। हँस कर तू क्यों नही मिलती, तुम्हारा
नियम टलता जा रहा है ॥१५३॥
बेरस कीजै नाहिं भामिनी, रस मैं रिस की बात ।
हौँ पठई तोहिँ लेन साँवरैं, तोहिं बिनु कछु न सुहात ।
हा हा करि तेरे पाइँ परति हौँ, छिनु छिनु निसि घटि जात ।
सूर स्याम तेरौ मग जोवत, अति आतुर अकुलात ॥१५४॥
अर्थ—हे स्त्री, क्रोध की बातो से प्रेम के प्रसंग को नीरस मत करो। मुझे
कृष्ण ने तुम्हे बुलाने को भेजा है। तुम्हारे बिना (उन्हे) कुछ नही सुहाता है। बिनती
करके मैं तुम्हारे पैरों पर पड़ती हूँ। क्षण-क्षण रात घटती जा रही है । सूरदास कहते
हैं कि (सखी कहती है) कृष्ण तेरा ही रास्ता ताक रहे हैं और (वह) अत्यधिक आतुर
होकर अकुलाते हैं ॥१५४॥
२०६ सूरसागर सार सटीक
माधौ तहाँ बुलाई राधे, जमुना निकट सुसीतल छहियाँ ।
आछी नीकी कुसुँभी सारी, गोरैं तन चलि हरि पिय पहियाँ ।
दूती एक गई मोहिनि पै, जाइ कह्यौ यह प्यारी कहियाँ ।
सूरदास सुनि चतुर राधिका, स्याम रैनि वृन्दावन महियाँ ॥१५५॥
अर्थ—कृष्ण ने राधा को यमुना के किनारे वहीं बुलाया जहाँ शीतल छाया
थी । तुम अच्छी, कुसुंभी रंग की साड़ी पहनकर कृष्ण के पास चलो । एक दूती ने
राधा के पास जाकर यही बात कही । सूरदास कहते हैं कि चतुर राधिका ने सुनकर
(जान लिया) कृष्ण रात मे वृन्दावन मे हैं ॥१५५॥
झूँमक सारी तन गोरैं हो ।
जगमग रह्यौ जराइ कौ टीकौ, छवि की उठतिँ झकोरैं हो ।
रत्न जटिल कै सुभग तरचौना, मनहुँ जात रवि भोरैं हो ।
दुलरी कंठ निरखि पिय इक टक, दृग भए रहैं चकोरैं हो ।
सूरदास प्रभु तुम्हरे मिलन कौं, रीझि-रीझि तृन तोरैं हो ॥१५६॥
अर्थ—झब्बेदार साड़ी गोरे शरीर पर (शोभित) है । जड़े हुए टीके जगमगा
रहे है, छवि का झकोरा उठ रहा है । रत्न से जड़ा हुआ सुन्दर तरौना मानो प्रातः
काल का सूर्य हो । दो-लड़ी की माला कंठ पर देखकर कृष्ण की आंखे चकोर की तरह
हो गयी हैं । सूरदास कहते है कि तुम्हारे (राधा के) मिलन के लिए कृष्ण रीझ-रीझकर
(मगल कामना से कि कही नजर न लग जाय) तृण तोड़ते है ॥१५६॥
राधिका बस्य करि स्याम पाए ।
विरह गयौ दूरि, जिय हरष हरि कै भयौ, सहस मुख निगम
जिहिं नेति गाए ।
मान तजि मानिनी मैन कौ वल हरच्यौ, करत तनु कंत जो
त्रास भारी ।
कोक विद्या निपुन, स्याम स्यामा बिपुल, कुंज-गृह द्वार ठाढे
मुरारी ।
भक्त-हित-हेत अवतारि लीला करत, रहत प्रभु तहाँ निजु
ध्यान जाकैं ।
प्रगट प्रभु सूर ब्रजनारि कैं हित बँधे, देत मन-काम-फल सग
ताकैं ॥१५७॥
अर्थ—कृष्ण ने राधा को वश मे कर लिया । विरह दूर चला गया मन में हर्ष
हुआ । ये वे ही कृष्ण हैं जिन्हे सहस्रों मुख से निगम नेति-नेति कहकर गाते हैं । मान
त्यागकर मानिनी (राधा) ने कामदेव के बल को हर लिया जो कृष्ण के शरीर को
त्रसित कर रहा था । काम-कला मे निपुण कृष्ण और राधा बार-बार (मिलते हैं) । कृष्ण
कुंज-गृह के द्वार पर खड़े है। भक्तो के हित के लिए जो अवतार लेकर लीला करते हैं,
ओर उन्ही का प्रभु ध्यान रखते हैं। सूरदास कहते हैं वही कृष्ण व्रजनारियों के हित
से बँधकर, उनके साथ उन्हें विभिन्न मनोवांछित फल दे रहे हैं ॥१५७॥
वसंतोत्सव
झूलत स्याम स्यामा संग।
निरखि दंपति अंग सोभा, लजत कोटि अनंग ।
मंद त्रिविध समीर सीतल, अंग अंग मुगंध ।
मचत उड़त सुवास संग, मन रहे मधुकर बंध ।
तैसियै जमुना सुभग जहं, रच्यौ रंग हिडोल ।
तैसियै वृज-वधू वनि, हरि चितै लोचन कोर ।
तैसोई वृन्दा-विपिन-घन-कुंज-द्वार-बिहार ।
बिपुल गोपी, विपुल वन गृह, रवन नंदकुमार ।
नित्य लीला, नित्य आनंद, नित्य मंगल गान्ह ।
सूर सुर-मुनि मुखनि अस्तुति, धन्य गोपी कान्ह ॥१५८॥
अर्थ- कृष्ण प्रिया के साथ झूलते हैं। दम्पति के अंगो की शोभा देखकर हजार
कामदेव लज्जित होते हैं। अंग-अंग को सुगन्धित करने वाली मन्द शीतल त्रिविध समीर
(वायु) चल रही है। साथ में सुगन्धित पराग उड़ रहा है जिस पर मन रूपी भ्रमर
मुग्ध हो गया है। वैसे ही यहाँ सुन्दर यमुना तट पर हिंडोला झूलने की क्रीड़ा रचायौ
गयी है। वैसे ही ब्रज की वधुएँ सज-धजकर कृष्ण की ओर तिरछे नेत्रों से देखती है,
वैसे ही वृन्दावन के कुन्जो के द्वारों का विहार है। बहुत सी गोपियां, विशाल वन-गृह
तथा रमण करने वाले कृष्ण है। (वहाँ) नित्य लीला, नित्य आनन्द तथा नित्य मंगल-
गान होता है। सूरदास कहते है कि देवता तथा मुनियो के मुख में नित्य स्तुति रहती
है कि गोपी तथा कृष्ण धन्य हो ॥१५८॥
नित्य धाम वृन्दावन स्याम। नित्य रूप राधा ब्रज-वाम ॥
नित्य रास, जल नित्य बिहार। नित्य मान, खंडिताऽभिसार ॥
ब्रह्म-रूप येई करतार। करन हरन त्रिभुवन येइ सार ॥
नित्य कुंज-सुख नित्य हिंडोर। नित्यहिं त्रिविध-समीर झकोर ॥
सदा बसंत रहत जहां वास। सदा हर्ष, जहँ नहीं उदास ॥
कोकिल कीर सदा तहँ रोर। सदा रूप मन्मथ चितचोर ॥
विविध सुमन वन फूले डार। उन्मत मधुकर भ्रमर अपार ॥
नव पल्लव वन सोभा एक। विहरत हरि संग सखी अनेक ॥
कुहू कुहू कोकिला सुनाई। सुनि सुनि नारि परम हरपाईं ॥
वार वार सो हरिहिं सुनावतिं । ऋतु वसंत आयौ समुझावतिं ॥
फाग-चरित रस साध हमारैं। खेलहिं सब मिलि संग तुम्हारैं ॥
सुनि सुनि सूर स्याम मुसुकाने। ऋतु वसंत आयौ हरषाने ॥१५६॥
२०८ सूरसागर सार सटीक
अर्थ—वृन्दावन का धाम तथा कृष्ण नित्य हैं। ब्रज की स्त्रियां तथा राधा का
रूप नित्य है। रास, जल विहार, मान, खंडित (नायिका), अभिसार सब नित्य हैं।
ब्रह्मा रूप में ये ही कर्त्ता हैं, कर्त्ता और हर्त्ता यही त्रिभुवन के सार हैं। कुन्ज का सुख
तथा हिंडोला क्रीड़ा नित्य हैं। त्रिविधि समीर का झकोरा शाश्वत है। जहां सदा वसंत
रहता है, सदा हर्ष रहता है, जहां उदासी नहीं है। वहाँ कोयला तथा तोते का शब्द
सदैव गूंजता रहता है, चित्तचोर कामदेव तथा रूप सदा रहते हैं। वन की डालो में रंग
रंग के फूल फूलते हैं और बहुत से भ्रमर मस्त होकर घूमते रहते हैं। नव पल्लवो की
एक ही शोभा रहती है और कृष्ण के साथ अनेक सखियां विहार करती रहती हैं।
कोकिल ने कू-कू का शब्द सुनाया, सुन-सुनकर स्त्रियां परम हर्षित हुईं। बार-बार वे
कृष्ण को सुनाती है और समझती हैं कि वसन्त ऋतु आ गयी। हमारे मन मे फाग
चरित की साध है कि हम सब मिलकर तुम्हारे साथ खेले। सूरदास कहते हैं कि सुन-
सुनकर कृष्ण मुस्कराये, वे वसन्त ऋतु (आया हुआ जानकर) हर्षित हुए ॥१५८॥
पिय प्यारी खेलैँ जमुन तीर। भरि केसरि कुमकुम अरु अबीर ॥
घसि मृगमद चंदन अरु गुलाल। रंग भीने अरगज वस्त्र माल ॥
कूजत कोकिल कल हंस मोर। ललितादिक स्यामा एक ओर ॥
वृन्दादिक मोहन लई जोर। बाजै ताल मृदंग रवाब घोर ॥
प्रभु हँसि कै गेंदुक दइ चलाइ। मुख पट दै राधा गइ बचाइ ॥
ललिता पट-मोहन गह्यौ धाइ। पीताबर मुरली लइ छिंडाइ ॥
हौं सपथ करौं छोड़ौं न तोहिं। स्यामा जू आज्ञा दई मोहिं ॥
इक निज सहचरि आई बसीठि। सुनी री ललिता तू भई ढीठि ॥
पट छोड़ि दियौ तब नव किसोर। छवि रीझि सूर तृन दियौ तोर ॥१६०॥
अर्थ—प्रिय और प्यारी यमुना के किनारे कुमकुम केसर और अबीर भरकर
खेलते हैं। मृग के मद, गुलाल और चन्दन का लेप किये हुए है तथा अंगराग के रंग
से भीगे है तथा वस्त्र और माला (पहने हैं)। कोयल, हंस तथा मोर कूंज रहे हैं।
ललिता आदि कृष्ण की प्रेमिकाएँ एक ओर हैं। वृन्दादि ने कृष्ण को जोर से ले (पकड)
लिया। मृदंग, रवाब (सारंगी) की घोर आवाज हो रही है। कृष्ण ने हँसकर गेंद
चला दी, मुख पर (घूंघट) कपड़ा देकर राधा ने अपना मुख बचा लिया। ललिता ने
दौड़कर मोहन के वस्त्र को पकड़ लिया, उसने पीतांबर तथा मुरली छीन ली। मैं शपथ
करती हूँ कि तुम्हे छोड़ूंगी नही, क्योकि राधा ने मुझे आज्ञा दी है। इतने मे एक
सहचरी दूतो आ गयी और बोली कि सुना है ललिता तू ढीठ हो गयी है। तब ललित
ने कृष्ण के वस्त्र छोड़ दिया और रीझकर भक्त सूर ने तृण तोड़ दिया ॥१६०॥
तेरैं आवैंगे आजु सखी हरि, खेलन कौं फाग (री)।
सगुन संदेसौ हौं सुन्यौँ, तेरैं आँगन बोलै काग (री)।
राधाकृष्ण २०६
मदनमोहन तेरैं बस माई, सुनि राधे बड़भाग (री)।
बाजत ताल मृदंग झांझ डफ, का सोवै, उठि जाग (री)।
चोवा चंदन लै कुमकुम अरु, केसरि पैयाँ लाग (री)।
सूरदास-प्रभु तुम्हारे दरस कौं, राधा अचल सुहाग (री) ॥१६१॥
अर्थ—आज सखी तुम्हारे यहां कृष्ण फाग खेलने आयेगे। मैंने सगुन का
संदेशा सुना है। देखो तुम्हारे आंगन में कौवा बोल रहा है। मदनमोहन तुम्हारे वश
में हैं, बड़भागिनी राधा सुनो। मृदङ्ग, झांझ, डफ की ताल बज रही है, तुम क्यों
सोती हो, उठो, जागो। चोवा, चन्दन, कुमकुम तथा केसर लेकर उनके पैरों को
छुओ। सूरदास कहते हैं कृष्ण तुम्हारे दर्शन को पाने के लिए व्याकुल हैं। राधा अचल
सुहागवती हो ॥१६१॥
हरि संग खेलति हैं सब फाग।
इहिं मिस करति प्रगट गोपी, उर-अंतर कौ अनुराग।
सारी पहिरि सुरंग, कसि कंचुकि, काजर दै दै नैन।
बनि बनि निकसि-निकसि भईं ठाढ़ी, सुनि माधौ के बैन।
डफ, बाँसुरी रुंज अरु महुअरि, बाजत ताल मृदंग।
अति आनंद मनोहर बानी, गावत उठति तरंग।
एक कोध गोविंद ग्वाल सब, एक कोध ब्रज-नारि।
छाँड़ि सकुच सब देति परस्पर, अपनी भाई गारि।
मिलि दस पाँच अली कृष्णहिँ, गहि लावर्तिँ अचकाइ।
भरि अरगजा अबीर कनक-घट, देति सीस तैं नाइ।
छिरकतिँ सखी कुमकुमा केसरि, भुरकतिँ बंदन धूरि।
सोभित है तनु साँझ-समै-घन, आए हैं मनु पूरि।
दसहूँ दिसा भयौ परिपूरन, सूर सुरंग प्रमोद।
सुर-बिमान कौतूहल भूले, निरखत स्याम-विनोद ॥१६२॥
अर्थ-कृष्ण के साथ सब गोपियां फाग खेलती है। इसी के बहाने सब गोपियां
हृदय के अनुराग को प्रकट करती हैं। अच्छे रंग की साड़ी पहनकर, चोली कसकर तथा
नेत्रो में काजल दे-देकर सजधज कर, कृष्ण की वाणी सुनकर निकल पडी। डफ, बांसुरी,
रुंज, मधुकर, मृदंग का ताल बज रहा है। अत्यधिक आनंद तथा मनोहर वाणी से गाये
जाते हुए गीतों की तरंग उठ रही है। एक ओर गोविन्द तथा सभी ग्वाल है तथा एक
ओर ब्रज की स्त्रियां हैं। सभी संकोच छोड़कर परस्पर अपने मन को अच्छी लगने
वाली गाली दे रहे हैं। दस-पांच सखियां मिलकर कृष्ण को अचानक पकड़ लाती हैं।
सोने के घड़े मे अंगराज तथा अबीर भरकर सिर से डाल देती हैं। सखियां कुमकुम,
केसर तथा सिंदूर की धूल झोंकती है। शरीर ऐसे शोभित हैं, मानो सन्ध्या के समय
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२१० सूरसागर सार सटीक
आकाश मे बादल फैल गये हो । सूरदास कहते हैं सुन्दर रंग दशों दिशाओ मे परिपूर्ण
हो गया । देवतागण विमान मे विस्मृत हो कृष्ण के विनोद को देखते हैं ॥१६२॥
नंद नंदन बृषभानु किसोरी, मोहन राधा खेलत होरी ।
श्रीवृन्दावन अतिहिं उजागर, वरद बरन नव दंपति भोरी ।
एकनि कर है अगरु कुमकुमा, एकनि कर केसरि लै घोरी ।
एक अर्थ सौं भाव दिखावति, नाचति तरुनि बाल वृध भोरी ।
स्यामा उतहिं सकल ब्रज-वनिता, इतहिं स्याम रस रूप लहौ री ।
कंचन की पिचकारी छूटति, छिरकत ज्यौं सचुपावैं गोरी ।
अतिहिं ग्वाल दधि गोरस माते, गारी देत कहौ न करौ री ।
करत दुहाई नंदराइ की, लै जु गयौ कल बल छल जोरी ।
झुंडनि जोरि रही चंद्रावलि, गोकुल मैं कछु खेल मच्यौ री ।
सूरदास-प्रभु फगुआ दीजै, चिरजीवौ राधा वर जोरी ॥१६३॥
अर्थ-कृष्ण तथा राधा होली खेलते हैं। वृन्दावन अत्यधिक प्रकाशित (चहल-
पहलमय) है। रंग-रंग के नवीन दम्पति विभोर खड़े हैं। एक (के) हाथ मे अगरु और
कुमकुम है, तो एक हाथ मे लेकर केसर घोलता है। (सब) एक ही तरह का भाव
दिखाते हैं। बाल, वृद्ध तथा तरुण सभी विभोर होकर नाचते हैं। उधर राधा तथा
समस्त ब्रजवनिंताये हैं, इधर कृष्ण रूप लाभ कर रहे हैं। सोने की पिचकारी छूट रही
है, छिरकने पर सखियां सुखी होती हैं। ग्वाल अत्यधिक दूध तथा दही से मस्त हैं,
गाली देते हुए कहना नही करते। नंदराय (कृष्ण) की दुहाई देते हैं जो उपाय, बल
तथा छल से जोड़ी लेकर चले। चन्द्रावली आदि झुण्ड बनाकर बोली कि गोकुल मे
कुछ खेल मचा है। सूरदास कहते हैं (चन्द्रावली कहती है) प्रभु अब फगुआ (इनाम)
दीजिये, राधा की श्रेष्ठ जोड़ी अनन्त काल तक जिये ॥१६३॥
गोकुलनाथ विराजत डोल ।
संग लिये वृषभानु-नंदिनी, पहिरे नील निचोल ।
कंचन खचित लालमनि मोती, हीरा जटित अमोल ।
झुलवहिँ जूथ मिलै ब्रजसुंदरि, हरषित करतिं कलोल ।
खेलतिँ, हँसतिँ परस्पर गावर्ति, बोलतिँ मीठे बोल ।
सूरदास स्वामी, पिय-प्यारी, झूलत हैं झकझोल ॥१६४॥
अर्थ - कृष्ण झूले पर शोभित है। नीले रंग की ओढनी पहने हुए राधा को
साथ लिये हुए है। (राधा) सोने से खचित लाल मणि, मोती तथा हीरे से जड़ा अमूल्य
हार पहने है। ब्रज की सुन्दरियां मिलकर उन्हे झुलाती हैं तथा हर्षित होकर कल्लोल
करती हैं। खेलती हैं, हँसती हैं तथा परस्पर मीठी बोली बोलती है। सूरदास कहते हैं
कि कृष्ण और प्यारी राधा झूले पर झोके के साथ झूलते हैं ॥१६४॥
मथुरा गमन
अक्रूर ब्रज आगमन
कंस नृपति अक्रूर बुलाये ।
बैठि इकंत मंत्र दृढ़ कीन्हौ, दोऊ बंधु मंगाये ।
कहूँ मल्ल, कहूँ गज दै राखे, कहूँ धनुष कहूँ वीर ।
नंद महर के बालक मेरैं, करषत रहत सरीर ।
उनहिं बुलाइ बीच ही मारौं, नगर न आवन पावैं ।
सूर सुनत अक्रूर कहत, नृप मन-मन मौज बढ़ावैं ॥१॥
अर्थ – राजा कंस ने अक्रूर को बुलाया। एकांत मे बैठकर दृढ़ मंत्रणा करके
दोनों भाइयो (कृष्ण और बलराम) को मँगाया। कही पर मल्ल (योद्धा), कही हाथी,
कही धनुष तथा कही वीरो को तैनात करके रखा। (कंस ने कहा) नंद महर के पुत्र
मेरे शरीर में चुभते रहते हैं; उन्हे बुलाकर बीच मे ही मार डालूँ, नगर तक आने ही
न पावें। सूरदास कहते हैं कि अक्रूर कंस की बातों को सुनते हैं तथा राजा कंस कहते
हुए मन-ही-मन आनन्द बढ़ाते हैं ॥१॥
उत नंदहिं सपनौ भयौ, हरि कहूँ हिराने ।
बल-मोहन कोउ लै गयौ, सुनि कै बिलखाने ।
ग्वाल सखा रोवत कहैं, हरि तौ कहूँ नाहीँ ।
संगहि संग खेलत रहे, यह कहि पछिताहीं ।
दूत एक सँग लै गयौ, बलराम कन्हाई ।
कहा ठगौरी सी करी, मोहिनी लगाई ।
वाही के दोउ ह्वै गए, हम देखत ठाढ़े ।
सूरज प्रभु वै निठुर ह्वै, अतिहीं गए गाढ़े ॥२॥
अर्थ – उधर (मथुरा मे) नन्द को स्वप्न हुआ कि कृष्ण कही खो गये। बलराम
और मोहन को कोई ले गया यह सुनकर (सब) बिलखने लगे। ग्वाल सखा रोते हुए
कहते हैं कि कृष्ण तो कहीं नहीं हैं। (हम) साथ-साथ खेलते रहे यह कह कहकर पछताते
हैं। बलराम और कृष्ण को कोई दूत साथ ले गया। मोहनी लगाकर पता नही क्या
जादू सा कर दिया कि दोनों उसी के हो गये, हम खड़े देखते रहे। सूरदास कहते हैं
कि (ग्वाल कहते हैं) वे कृष्ण निष्ठुर होकर अत्यधिक कष्ट देकर चले गये ॥२॥
सुफलक-सुत हरि दरसन पायौ ।
रहि न सक्यौ रथ पर सुख-व्याकुल, भयौ वहै मन भायौ ।