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सर्वकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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राधाकृष्ण २०३
एक मात्र शोभा को देखते थे। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण ने राधा की वेणी अपने हाथ
से गूँथी ॥१४६॥
खंजन नैन सुरँग रस माते।
अतिसय चारु विमल, चंचल ये, पल पिंजरा न समाते।
बसे कहूँ सोइ बात सखी कहि, रहे इहाँ किहिं नातै ?
सोइ संज्ञा देखति औरासी, विकल उदास कला तैं।
चलि-चलि जात निकट स्रवननि के, सकि ताटंक फँदाते।
सूरदास अंजन गुन अटके, नतरु कबै उड़ि जाते ॥१४७॥
अर्थ—खंजन रूपी नेत्र सुन्दर रूप रस मे मद मस्त है। अत्यधिक सुन्दर तथा
विमल ये (चंचल) नेत्र पलक रूपी पिंजड़े मे नही समाते। सखी यह नेत्र (रात) मे कही
दूसरी जगह बसे है। फिर बता, यहाँ ये किस नाते रहें ? अपनी चंचलता के कारण ये
नेत्र उसी विचित्र संकेत (विशिष्ट मुद्रा) को देखते रहते है तथा (अन्य) कलाओ
(सौंदर्य) से सर्वथा व्याकुल एवं उदासीन रहते है। जान पड़ता है कि कानों में पहने
हुए ताटंक को फाँद कर चले जायेगे। सूरदास कहते हैं कि अंजन (कृष्ण के श्याम रंग)
के गुण (रस्सी) से अटके हुए हैं नही तो कभी के उड़ गये होते ॥१४७ ॥
धन्य धन्य बृषभानु-कुमारी, गिरिवरधर, बस कीन्हे (री)।
जोइ जोइ साध करी पिय रस की, सो सब उनकौँ दीन्हे (री)।
तोसी तिया और त्रिभुवन मैं, पुरुष स्याम से नाहीं (री)।
कोक-कला पूरन तुम दोऊ, अब न कहूँ हरि जाहीँ (री)।
ऐसे बस तुम भए परस्पर, मोसौँ प्रेम दुरावै (री)।
सूर सखी आनँद न सम्हारति, नागरि कंठ लगावै (रौ) ॥१४८॥
अर्थ - वृषभानु कुमारी (राधा) तुम धन्य हो, (क्योकि) तुमने गिरिधर कृष्ण
को वश में कर लिया। जो प्रिय के साथ किया वह सब उनको समर्पण कर दिया।
तुम्हारे समान स्त्री और कृष्ण के समान पुरुष त्रिभुवन मे कोई और नही है। तुम दोनो
काम कला से पूर्ण हो, अब कृष्ण कही और नही जायेंगे। तुम दोनों ऐसे प्रेम के वश
में हो गये हो, (किन्तु) मुझसे प्रेम छिपाती हो। सूरदास कहते हैं कि सखी आनन्द
नही सम्हाल पाती और राधा को गले से लगा लेती है ॥१४८॥
राधेहिं स्याम देखी आइ।
महा मान दृढ़ाइ बैठी, चितै कापैं जाइ।
रिसहिं रिस भइ मगन सुन्दरि, स्याम अति अकुलात।
चकित ह्वै जकि रहे ठाढ़े, कहि न आवै बात।
देखि ब्याकुल नंद-नंदन, सखी करति बिचार।
सूर दोऊ मिलैं जैसौं, करौं सोइ उपचार ॥१४६॥