सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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२०० सूरसागर सार सटीक
इतनी कहा गाँठि कौ लागत, जी बातनि सुख पाइयै ।
रूठेहिं आदर देत सयाने, यहै सूर जस गाइयै ॥१३६॥
अर्थ—कृपा करके तनिक निकुंज मे आइये । अत्यधिक क्रोध से किशोरी
(राधा) दुर्बल हो रही है, उसे विनय पूर्वक मान लीजिए । हाथ और कपोल दोनों का-
अन्तर नही होता (अर्थात् हाथ पर कपोल रखे रहती है), अत्यधिक उच्छ्वास से
शरीर को तपाती है । अपने सुन्दर हाथों से सँवारे उसके बाल छूट गये है, मुख कुम्हला
गया है । जो बातों से ही सुख पाया जा सकता है, तो इसमे गाँठ का क्या लगता है
अर्थात् क्या खर्च होता है । रूठे हुए व्यक्ति को सज्जन (श्रेष्ठ लोग) आदर देते हैं ।
सूरदास इसका यश गाते है ॥१३८॥
बैठि मानिनी गहि मौन ।
मनौ सिद्ध समाधि सेवत, सुरनि साधे पौन ।
अचल आसन, पलक तारी, गुफा घूँघट-भौन ।
रोषही कौ ध्यान धारै, टेक टारै कौन ।
अबहिँ जाइ मनाइ लीजै, अबसि कीजै गौन ।
सूर के प्रभु जाइ देखौ, चित्त चौंधी जोन ॥१४०॥
अर्थ—मानिनी मौन धारण करके बैठी है । मानो सिद्ध समाधि का सेवन कर
रही है और देवता प्राण वायु सिद्ध (अवरुद्ध) किए हुए हैं । वह अचल आसन पर
बैठी है, पलक को लगातार रोके है (ध्यान लगाये है) । घूंघट के बीच का स्थान
गुफा के समान है । क्रोध पर ही ध्यान धारण किये हुए है, उसे हठ करके कौन टाल
सकता है । अभी जाकर उसे मना लीजिए । (उसके पास) अवश्य गमन कीजिए ।
सूरदास कहते हैं कि (सखी कहती है) कृष्ण जाकर उस चिन्ता से तिलमिलायी
(राधा) को अवश्य देखो ॥१४०॥
स्यामा तू अति स्यामहिं भावै ।
बैठत-उठत, चलत, गौ चारत, तेरौ लीला गावै ।
पीत बरन लखि पीत बसन उर, पीत धातु अंग लावै ।
चन्द्राननि सुनि, मोर चन्द्रिका, माथैँ मुकुट बनावै ।
अति अनुरागि सैनि संभ्रम मिलि, संग परम सुख पावै ।
बिछुरत तोहिँ क्वासि राधा कहि, कुज-कुंज प्रति धावै ।
तेरी चित्र लिखैँ, अरु निरखैँ, बासर-बिरह नसावै ।
सूरदास रस-रासि-रसिक सौं, अन्तर क्यौँ करि आवै ॥१४१॥
अर्थ—श्यामा (राधा) तू कृष्ण को अत्यधिक प्रिय है । बैठते, उठते, चलते,
गाय चराते तुम्हारी ही लीला गाते है । (तुम्हारे) पीले रंग को (शरीर को) देखकर
पीताम्बर हृदय से लगाते है, तथा पीली धातु का (शरीर पर) लेप करते है । (तुझे)
चन्द्रमा के समान मुख वाली जानकर मोर चन्द्रिका से मस्तक का मुकुट बनाते हैं ।