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सर्वकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 194

राधाकृष्ण . १८३
अर्थ - कृष्ण नागरि के मुख को देखकर हंसे और हर्षित होकर उन्होंने चंद्रावली
को गले से लगा लिया । बायी भुजा राधा पर और दाहिनी सखी पर रखकर वन की
ओर चले । (यह) शोभा कही नही जा सकती (अकथनीय है) । कृष्ण मानो दो
बिजलियों के बीच सुन्दर नवीन बादल हों । इस छवि को देखकर रति सहित काम
लज्जित होते हैं । मानो कंचन की लताओं के बीच सुन्दर तमाल का'वृक्ष हो, ऐसे ही
(दोनो) स्त्रियों के बीच कृष्ण शोभित हैं । वे कुंज-गृह मे गये और भ्रमर के गुंजार
तथा पुष्पों के पुंज को देखकर आनन्द से भर गये । सूरदास कहते हैं कि राधिका-
रमण, युवती-रमण, मनरमण (कृष्ण) की छवि को देखकर काम के मन में भी
कामेच्छा उत्पन्न हो गयी ॥१२०॥
मान लीला
मोहिं छुवौ जनि दूर रहौ जू ।
जाकौं हृदय लगाइ लयौ है, ताकीँ बाँह गहौ जू ।
तुम सर्वज्ञ और सब मूरख, सो रानी अरु दासी ।
मैंँ देखत हिरदय वह बैठी, हम तुमकौँ भइ हाँसी ।
बाँह गहत कछु सरम न आवति, सुख पावति मन माहींँ ।
सुनहु सूर मो तन यह इकटक, चितवति, डरपति नाहीँ ॥१२१॥
अर्थ - मुझे छुओ मत दूर रहो । जिसको हृदय से लगाया हो उसी की बांह
पकड़ो । तुम सर्वज्ञ हो और सब मूर्ख हैं ? वह रानी है और सब दासी हैं ? मैं देखती
हूँ कि वह हृदय में बैठी है, मैं तुम्हारे लिए हँसी की पात्री हूँ । बाँह पकड़ते कुछ लाज
नही आती, (ऊपर से) मन में सुख पाती है । सूरदास कहते हैं कि (राधा कहती है)
यह मेरी ओर एकटक देखती है और डरती नही ॥१२१॥
कहा भई धनि बाबरी, कहि तुमहिं सुनाऊँ ।
तुम तैं को है भावती, जिहिं हृदय बसाऊँ ।
तुमहिं स्रवन, तुम नैन हौ, तुम प्रान-अधारा ।
वृथा क्रोध तिय क्यों करौ, कहि बारम्बारा ।
भुज गहि ताहि बतावहु, जेहि हृदय बतावति ।
सूरज प्रभु कहै नागरी, तुम तैं को भावति ॥१२२॥
अर्थ - प्रिया तुम क्या पागल हो गयी हो, तुम्हे कैसे कहकर सुनाऊँ । तुमसे
अधिक प्रिय लगने वाली और कौन है जिसे (अपने) हृदय मे बसा लूं । तुम ही श्रवण
हो, तुम ही नेत्र हो और तुम ही प्राण की आधार हो । बार-बार कहकर, हे स्त्री,
क्रोध क्यो करती हो । भुजा पकड़कर उसे बताओ जिसे हृदय मे बताती हो । सूरदास
कहते हैं कि कृष्ण नागरि (राधा) से कहते है कि तुमसे अधिक कौन मुझे अच्छी
लगती है ॥१२२॥
पियहिं निरखि प्यारी हँसि दीन्हौ ।
रीझे स्याम अंग-अंग निरखत, हँसि नागरि उर लीन्हौ ।
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