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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 203

२०२ सूरसागर सार सटीक
रहि री मानिनी मान न कीजै ।
यह जोवन अँजुरी की जल है, ज्यौँ गुपाल माँगे त्यौँ दीजै ।
छिनु छिनु घटति, बढ़ति नहिँ रजनी, ज्यौँ ज्यौँ कलाचंद्र की छीजै ।
पूरब पुन्य सुकृत फल तेरौ, काहै न रूप नैन भरि पीजै ।
सौँह करति तेरे पाँइनि की, ऐसी जियनि दसौ दिन जीजै ।
सूर सु जीवन सफल जगत कौ, वैरी बाँधि विबस करि लीजै ॥१४४॥
अर्थ—हे मानिनी, मान मत करो और रुककर विचार करो। यह यौवन
अँजुली के जल के समान है, जैसे इसे कृष्ण माँगे उसी प्रकार इसे दे दो। ज्यों-ज्यों चन्द्र
की कला क्षीण होती है रात भी घटती है, बढ़ती नही। तेरे पूर्व पुण्य का फल है, क्यो
रूप को नेत्र भरकर नही पीती। तेरे चरणों की सौगन्ध करती हूँ कि ऐसी जिन्दगी
यदि दस दिन भी रहे तो उत्तम है। सूरदास कहते हैं कि (सखी कहती है) वही जगत
का जीवन सफल है कि वैरी को बाँध कर विवश कर लिया जाय ॥१४४॥
राधा सखी देखि हरषानी ।
आतुर स्याम पठाई याकौँ, अन्तरगत की जानी ।
वह सोभा निरखत अँग-अँग की, रही निहारि निहारि ।
चकित देखि नागरि मुख वाकौ, तुरत सिंगारनि सारि ।
ताहि कह्यौ सुख दै चलि हरि कौँ, मैं आवति हौँ पाछैँ ।
वैसेँहि फिरी सूर के प्रभु पैँ, जहाँ कुंज गृह काछैँ ॥१४५॥
अर्थ—राधा सखी को देखकर हर्षित हो गयी। आतुर कृष्ण ने इसे भेजा हैं,
(वह) मन की बात जान गयी। निहार-निहार कर वह शोभा देखती रही। नागरि
(राधा) चकित होकर उसके मुख को देखकर तुरन्त श्रृंगार से सजाकर उससे कहा कि
आगे चल कर कृष्ण को सुख दो मैं पीछे आ रही हूँ। सूरदास कहते हैं तुरन्त ही कृष्ण
के पास उसी स्थान को वापस चली जिस कुंज-भवन मे कृष्ण शोभित थे ॥१४५॥
हरषि स्याम तिय बाँह गही ।
अपनैँ कर सारी अँग साजत, यह इक साध कही ।
सकुचति नारि बदन मुसुकानी, उतकौँ चितै रही ।
कोक-कला परिपूरन दोऊ, त्रिभुवन और नही ।
कुंज-भवन सँग मिलि दोउ बैठे, सोभा एक चही ।
सूर स्याम स्यामा सिर बेनी, अपनैँ करनि गुही ॥१४६॥
अर्थ—हर्षित होकर कृष्ण ने प्रिया की बांह पकड ली। वे अपने ही हाथ से
साड़ी से अंग सजाते हैं, यह (उनकी) एक अभिलाषा थी। सकुचाती हुई राधा मुख से
मुस्करायी और उधर (कृष्ण) की ओर देखती रही। दोनों काम कला से परिपूर्ण हैं।
तीनों लोक में और कोई ऐसा नही है। कुंज-भवन मे दोनो साथ मिलाकर बैठे थे और