सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराधाकृष्ण २०६
मदनमोहन तेरैं बस माई, सुनि राधे बड़भाग (री)।
बाजत ताल मृदंग झांझ डफ, का सोवै, उठि जाग (री)।
चोवा चंदन लै कुमकुम अरु, केसरि पैयाँ लाग (री)।
सूरदास-प्रभु तुम्हारे दरस कौं, राधा अचल सुहाग (री) ॥१६१॥
अर्थ—आज सखी तुम्हारे यहां कृष्ण फाग खेलने आयेगे। मैंने सगुन का
संदेशा सुना है। देखो तुम्हारे आंगन में कौवा बोल रहा है। मदनमोहन तुम्हारे वश
में हैं, बड़भागिनी राधा सुनो। मृदङ्ग, झांझ, डफ की ताल बज रही है, तुम क्यों
सोती हो, उठो, जागो। चोवा, चन्दन, कुमकुम तथा केसर लेकर उनके पैरों को
छुओ। सूरदास कहते हैं कृष्ण तुम्हारे दर्शन को पाने के लिए व्याकुल हैं। राधा अचल
सुहागवती हो ॥१६१॥
हरि संग खेलति हैं सब फाग।
इहिं मिस करति प्रगट गोपी, उर-अंतर कौ अनुराग।
सारी पहिरि सुरंग, कसि कंचुकि, काजर दै दै नैन।
बनि बनि निकसि-निकसि भईं ठाढ़ी, सुनि माधौ के बैन।
डफ, बाँसुरी रुंज अरु महुअरि, बाजत ताल मृदंग।
अति आनंद मनोहर बानी, गावत उठति तरंग।
एक कोध गोविंद ग्वाल सब, एक कोध ब्रज-नारि।
छाँड़ि सकुच सब देति परस्पर, अपनी भाई गारि।
मिलि दस पाँच अली कृष्णहिँ, गहि लावर्तिँ अचकाइ।
भरि अरगजा अबीर कनक-घट, देति सीस तैं नाइ।
छिरकतिँ सखी कुमकुमा केसरि, भुरकतिँ बंदन धूरि।
सोभित है तनु साँझ-समै-घन, आए हैं मनु पूरि।
दसहूँ दिसा भयौ परिपूरन, सूर सुरंग प्रमोद।
सुर-बिमान कौतूहल भूले, निरखत स्याम-विनोद ॥१६२॥
अर्थ-कृष्ण के साथ सब गोपियां फाग खेलती है। इसी के बहाने सब गोपियां
हृदय के अनुराग को प्रकट करती हैं। अच्छे रंग की साड़ी पहनकर, चोली कसकर तथा
नेत्रो में काजल दे-देकर सजधज कर, कृष्ण की वाणी सुनकर निकल पडी। डफ, बांसुरी,
रुंज, मधुकर, मृदंग का ताल बज रहा है। अत्यधिक आनंद तथा मनोहर वाणी से गाये
जाते हुए गीतों की तरंग उठ रही है। एक ओर गोविन्द तथा सभी ग्वाल है तथा एक
ओर ब्रज की स्त्रियां हैं। सभी संकोच छोड़कर परस्पर अपने मन को अच्छी लगने
वाली गाली दे रहे हैं। दस-पांच सखियां मिलकर कृष्ण को अचानक पकड़ लाती हैं।
सोने के घड़े मे अंगराज तथा अबीर भरकर सिर से डाल देती हैं। सखियां कुमकुम,
केसर तथा सिंदूर की धूल झोंकती है। शरीर ऐसे शोभित हैं, मानो सन्ध्या के समय
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