सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराधाकृष्ण २०५
बासर गयौ, रैनि इक बीती, बिनु भोजन बिनु पानी ।
बाँह पकरि तब सखिनि जगायौ, धनि-धनि सारँगपानी ।
ह्वाँ तुम बिबस भए हौं ऐसे, ह्वाँ तौ वै बिबसानी ।
सूर बने दोउ नारि पुरुष तुम, दुहुँ की अकथ कहानी ॥१५२॥
अर्थ—कृष्ण के मुख मे 'राधा-राधा' की (ही) वाणी है। वे धरणी पर अचेत
पडे हैं। उन्हे (कुछ) स्मरण नही है। (ऐसी दशा देखकर) सखी आकुल हो गयी। दिन
बीत गया, एक रात भी बीत गयी, (किन्तु) वे बिना भोजन तथा पानी के पड़े हैं।
बांह पकड़कर सखियो ने उन्हें जगाया (और कहा) सारँगपाणि तुम धन्य हो। यहाँ
तुम इतने विवश हुए हो, वहाँ वे विवश है। सूरदास कहते है कि (सखियां कहती हैं)
तुम दोनो (अनोखे) स्त्री-पुरुष बने हो, दोनों की कहानी अकथनीय है ॥१५२॥
सुनि री सयानी तिय, रूसिबे कौ नेम लियौ, पावस दिननि
कोऊ ऐसौ है करत री ।
दिसि-दिसि घटा उठी, मिलि री पिया सौँ रूठी, निडर हियौ है
तेरौ नैँकु न डरत री ।
चलिए री मेरी प्यारी, मोकौँ मान देन हारी, प्रानहुँ तैँ प्यारे पति
धीर न धरत री ।
सूरदास प्रभु तोहिँ, दियौ चाहै हित-बित, हँस क्यों न मिलै तेरौ
नेम है टरत री ॥१५३॥
अर्थ—सुनो सयानी स्त्री तुमने रूठने का व्रत ले लिया है । पावस के दिनों में
कोई ऐसा करता है ? हर दिशा में घटाएं उठती हैं, हे रूठी प्रिय से मिलो, तुम्हारा
हृदय निडर है तनिक भी नही डरता । मेरी प्यारी चलो, मुझे मान देने वाली (राधा)
प्राणों से भी प्रिय (कृष्ण) धैर्य नही धारण करते । सूरदास कहते हैं (सखी कहती है)
कि कृष्ण तुम्हें हित-वित सब देना चाहते हैं। हँस कर तू क्यों नही मिलती, तुम्हारा
नियम टलता जा रहा है ॥१५३॥
बेरस कीजै नाहिं भामिनी, रस मैं रिस की बात ।
हौँ पठई तोहिँ लेन साँवरैं, तोहिं बिनु कछु न सुहात ।
हा हा करि तेरे पाइँ परति हौँ, छिनु छिनु निसि घटि जात ।
सूर स्याम तेरौ मग जोवत, अति आतुर अकुलात ॥१५४॥
अर्थ—हे स्त्री, क्रोध की बातो से प्रेम के प्रसंग को नीरस मत करो। मुझे
कृष्ण ने तुम्हे बुलाने को भेजा है। तुम्हारे बिना (उन्हे) कुछ नही सुहाता है। बिनती
करके मैं तुम्हारे पैरों पर पड़ती हूँ। क्षण-क्षण रात घटती जा रही है । सूरदास कहते
हैं कि (सखी कहती है) कृष्ण तेरा ही रास्ता ताक रहे हैं और (वह) अत्यधिक आतुर
होकर अकुलाते हैं ॥१५४॥