सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०६ सूरसागर सार सटीक
माधौ तहाँ बुलाई राधे, जमुना निकट सुसीतल छहियाँ ।
आछी नीकी कुसुँभी सारी, गोरैं तन चलि हरि पिय पहियाँ ।
दूती एक गई मोहिनि पै, जाइ कह्यौ यह प्यारी कहियाँ ।
सूरदास सुनि चतुर राधिका, स्याम रैनि वृन्दावन महियाँ ॥१५५॥
अर्थ—कृष्ण ने राधा को यमुना के किनारे वहीं बुलाया जहाँ शीतल छाया
थी । तुम अच्छी, कुसुंभी रंग की साड़ी पहनकर कृष्ण के पास चलो । एक दूती ने
राधा के पास जाकर यही बात कही । सूरदास कहते हैं कि चतुर राधिका ने सुनकर
(जान लिया) कृष्ण रात मे वृन्दावन मे हैं ॥१५५॥
झूँमक सारी तन गोरैं हो ।
जगमग रह्यौ जराइ कौ टीकौ, छवि की उठतिँ झकोरैं हो ।
रत्न जटिल कै सुभग तरचौना, मनहुँ जात रवि भोरैं हो ।
दुलरी कंठ निरखि पिय इक टक, दृग भए रहैं चकोरैं हो ।
सूरदास प्रभु तुम्हरे मिलन कौं, रीझि-रीझि तृन तोरैं हो ॥१५६॥
अर्थ—झब्बेदार साड़ी गोरे शरीर पर (शोभित) है । जड़े हुए टीके जगमगा
रहे है, छवि का झकोरा उठ रहा है । रत्न से जड़ा हुआ सुन्दर तरौना मानो प्रातः
काल का सूर्य हो । दो-लड़ी की माला कंठ पर देखकर कृष्ण की आंखे चकोर की तरह
हो गयी हैं । सूरदास कहते है कि तुम्हारे (राधा के) मिलन के लिए कृष्ण रीझ-रीझकर
(मगल कामना से कि कही नजर न लग जाय) तृण तोड़ते है ॥१५६॥
राधिका बस्य करि स्याम पाए ।
विरह गयौ दूरि, जिय हरष हरि कै भयौ, सहस मुख निगम
जिहिं नेति गाए ।
मान तजि मानिनी मैन कौ वल हरच्यौ, करत तनु कंत जो
त्रास भारी ।
कोक विद्या निपुन, स्याम स्यामा बिपुल, कुंज-गृह द्वार ठाढे
मुरारी ।
भक्त-हित-हेत अवतारि लीला करत, रहत प्रभु तहाँ निजु
ध्यान जाकैं ।
प्रगट प्रभु सूर ब्रजनारि कैं हित बँधे, देत मन-काम-फल सग
ताकैं ॥१५७॥
अर्थ—कृष्ण ने राधा को वश मे कर लिया । विरह दूर चला गया मन में हर्ष
हुआ । ये वे ही कृष्ण हैं जिन्हे सहस्रों मुख से निगम नेति-नेति कहकर गाते हैं । मान
त्यागकर मानिनी (राधा) ने कामदेव के बल को हर लिया जो कृष्ण के शरीर को
त्रसित कर रहा था । काम-कला मे निपुण कृष्ण और राधा बार-बार (मिलते हैं) । कृष्ण
कुंज-गृह के द्वार पर खड़े है। भक्तो के हित के लिए जो अवतार लेकर लीला करते हैं,