सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
The provided image is completely blank and does not contain any text to transcribe.
॥ अद्वैत ज्ञान को अंग ॥ [ २५५
कारज देखि भयौ बिचि विभ्रम,
कारन देखि विभ्रम्म विलावै ।
सुंदर या निश्चै अभिन्नतरि,
द्वैत गये फिरि द्वैत न आव ॥२२॥
मनहर छंद
द्वैत करि देखै जब द्वैत ही दिखाई देत,
एक करि देखै तब उहै एक अंग है ।
सूरज कौ देखै जब सूरज प्रकासि रह्यौ,
किरन की देखै तौ किरन नाना रंग है ॥
भ्रम जब भयौ तब माया ऐसो नाम धर्यो,
भ्रम के गये तै एक ब्रह्म सरवग है ।
सुंदर कहत याकी दृष्टि ही कौ फेर भयौ,
ब्रह्म अरु माया कै तौ माथै नही शृङ्ग है । २३।।
श्रोत्र कछु और नाहि नेत्र कछु और नाहि,
नासा कछु और नाहिं रसना न और है ।
त्वक कछु और नाहि वाक कछु और नाहि,
हाथ कछु और नाहि पावन की दौर है ॥
(२३) सरवग-सर्वव्यापक ।
२५६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
मन कछु और नाहि बुद्धि कछु और नाहि,
चित्त कछु और नाहि अहकार तीर है।
सुदर कहत एक ब्रह्म बिनु और नाहि,
आपु ही मैं आपु व्यापि रह्याँ सब ठौर है ॥२८॥
॥ इति अद्वैत ज्ञान को अग सम्पूर्ण ॥
॥ जगतमिथ्यात्व को अंग ॥ [ २५७
अथ जगत मिथ्यात्व को अंग
॥३३॥
मनहर छंद
कियो न विचार कछु भनक परी है कान,
धार आई मुनि के डरपि त्रिप खायी है ।
जैसे कोऊ अनछतौ ऐसै ही बुलाइयत,
वार बीति गई पर कोऊ नही आगौ है ॥
वेद हु वरनि कै जगत तरु ठाटौ कियौ,
अन्त पुनि वेद जर मूल तें उठायौ है ।
तैसे हि सुन्दर याकौं कोऊ एक पावै भेद,
जगत कौ नाम मुनि जगत भुलायी है ॥१॥
ऐसी ही अज्ञान कोऊ आडकै प्रगट भयी
दिव्य दृष्टि दूर गई देखे चाम दृष्टि कौ ।
जैसे एक आरसी सदा ई हाथ माहि रहे,
साम्हैं ह्वैं न देखे फेरि फेरि देखे पृष्ठि कौ ॥
जैसे एक व्योम पुनि बादर सौ छाइ रह्यौ,
व्योम नहिं देखत देखत बहु वृष्टि कौ ।
तैसे एक ब्रह्म ई विराजमान सुन्दर हैं,
ब्रह्म कौ न देखे कोऊ देखे सब सृष्टि कौ ॥२॥
(१) अनछतो-अनुपस्थित, असत्, सत्तारहित ।
(२) साम्हैं-सीधी तरफ । पृष्ठि-पीछे की तरफ ।
२५८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
अनछतौ जगत अज्ञान तै प्रगट भयौ,
जैसे कोऊ बालक बेताल देखि डर्यौ है ।
जैसे कोऊ सुपनै मैं दाव्यौ है अथारै आइ,
मुख तै न आवै बोल ऐसो दुख पर्यौ है ॥
जैसे अंधियारी रैनि जेवरी न जानै ताहि,
आपु ही तै साप मानि भय अति कर्यौ है ।
तैसे ही सुन्दर एक ज्ञान कै प्रकास बिन,
आपु दुख पाइ पाइ आपु पचि मर्यौ है ॥३॥
मृत्तिका समाइ रही भाजन के रूप माहि,
मृत्तिका कौ नाम मिटि भाजन ई गह्यौ है ।
कनक समाय त्यौ ही होइ रह्यौ आभूषण,
कनक न कहै कोऊ आभूषण कह्यौ है ॥
बीज ऊ समाइ करि बृक्ष होई रह्यौ पुनि,
बृक्ष ई कौ देखियत बीज नही लह्यौ है ।
सुन्दर कहत यह यौही करि जानौ सब,
ब्रह्म ई जगत होइ ब्रह्म पूरि रह्यौ है ॥४॥
(३) अनछतो-अस्तित्वहीन । अथारै-छाती पर ।
(४) मृत्तिका-मिट्टी । भाजन-बर्तन । कनक-सुवर्ण,
सोना ।
॥ जगत्मिथ्यात्व को अंग ॥ [२५६
कहत है देह माहि जीव आइ मिलि रह्यो.
कहां देह कहा जीव वृथा चौंक पर्यो है ।
बूटवे के डरतें तिरन को उपाय करै,
ऐसें नहि जानै यहु मृगजरा भयौ है ॥
जेवरी कौं साप जैसे सीपि विषै रूपौ जानि,
और की और ई देखि यां ही भ्रम पर्यो है ।
सुन्दर कहत यह एक ई अखंड ब्रह्म,
ताहि को पलटि के जगत नाम धर्यो है ॥५॥
॥ इति जगन्मिथ्यात्व को अंग सम्पूर्ण ॥
२६० ] ॥ सुन्दर विलास ॥
अथ आश्चर्य को अङ्ग ॥३४॥
मनहर छन्द
बेद कौ बिचार सोई सुनि कै सतनि मुख,
आपु हू विचार करि सोई धारियतु है।
योग की जुगति जानि जग तें उदास होइ,
सुंनि मैं समाधि लाइ मन मारियतु है॥
ऐसैं ऐसैं करत करत केते दिन बीते,
सुन्दर कहत अज हू बिचारियतु है।
कारौ ही न पीरौ न तौ तातौ ही न सीरौ कछु,
हाथ न परत तातै हाथ झारियतु है ॥१॥
मन कौ अगम अति बचन थकित होत,
बुद्धि हू बिचार करि बहु खींडियतु है।
श्रवन न सुनै जाहि नैन हू न देखै ताहि,
रसना कौ रस सरबस छींडियतु है॥
त्वक कौ सपर्स नाहि घ्रान कौ न बिषै होइ,
पगनि हू करि जित तित हींडियतु है।
सुन्दर कहत अति सूक्षिम स्वरूप कछु,
हाथ न परत तातै हाथ मीडियतु है ॥२॥
(१) कारो-काला। पीरो-पीला। तातो-गर्म। सीरो-
ठढा। (२) खींडियतु है-बिखर जाता है। छींडियतु
है-छिटक जाता है। हींडियतु है-भटकता है। मीडियतु
है-मलता है।
॥ आश्चर्य को अंग ॥ [ २६०
गुफा कौ मवारि तह आसन ऊ मारि करि,
प्रान हू की धारि धारि नाक सींटियतु है।
इंद्रिनि कौ घोर करि मन हू कौ फेरि करि,
त्रिकुटि मैं हेरि हेरि हियो छोटियतु है॥
सब छिटकाउ पुनि मुनि भ समाइ तह,
समाधि लगाइ करि आंखि मीटियतु है।
सुन्दर कहत हम और ऊ किये उपाइ,
हाथ न परत तातै हाथ पीटियतु है॥३॥
बोलै ही न मौन धरै बैठै ही न गौन करै,
जागै ही न सोवै मु तौ दूरि हो न नेरी है।
आवै ही न जाइ, न तौ थिर अकुलाइ पुनि,
भूखौं ही न खाइ कछु तातो ही न सीरौ है॥
लेत ही न देत कछु हेत न कुहेत पुनि,
स्याम हो न श्वेत सु तौ रातौ ही न पीरौ है।
दूबरी न मोटी कछु लांबी हू न छोटी तातै,
सुन्दर कहै सु कहा काच ही न हीरौ है॥४॥
भूमि ही न आप न तौ तेज ही न ताप न तौ,
वायु हू न ब्योम न तौ पच कौ पसारौ है।
हाथ ही न पाव न तौ नैन बैन भाव न तौ
रंक ही न राव न तौ बृद्ध ही न बारौ है॥
(४) गौन-गमन। नेरी-नजीक। अकुलाई-चलायमान।
२६२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
पिंड ही न प्रान नहूँ तौ जान न अजान न तौ,
बध निरबान न तौ हरवौ न भारौ है ।
द्वैत न अद्वैत न तो भीत न अभीत ताते,
सुन्दर कह्यौ न जाइ मिल्यौ ही न न्यारौ है ॥५ ।
इन्दव छन्द
पाप न पुंनि न थूल न शुंनि न,
वौल न मौन न सोवै न जागै ।
एक न दोइ पुरुष न जोइ,
कहै कहा कोइ न पीछै न आगै ॥
बृद्ध न बाल न कर्म न काल न,
ह्रस्व बिशाल न जूझै न भागै ।
बंध न मोक्ष, अप्रोक्ष न प्रोक्ष,
न सुदर है न असुदर लागै ॥६॥
तत्व अतत्व कह्यौ नहिं जात जु,
शुंनि अश्रुंनि उरै न परै है ।
जोति अजोति न जान सकै कोउ,
आदि न अति जिवै न मरै है ॥
रूप अरूप कछू नहिं दीसत,
भेद अभेद करै न हरै है ।
शुद्ध अशुद्ध कहै पुनि कौन जु,
सुदर बोलै न मौन धरै है ॥७॥
(६) प्रोक्ष-अप्रोक्ष-परोक्ष, अपरोक्ष ।
॥ आश्चर्य को अग ॥ [ २६३
खोजत खोजत खोजि रहे अरु,
खोजत हैं पुनि खोजि हैं आने ।
गावत गावत गाइ गये बहु,
गावत हैं अरु गाइ हैं गाने ॥
देखत देखत देखि थके सब,
दीसै नही कहुं ठौर ठिकाने ।
बूझत बूझत बूझि कै सुंदर,
हेरत हेरत हेरि हिराने ॥८॥
पिंड मैं है परि पिंड लिपै नहिं,
पिंड परै पुनि त्या हि रहावै ।
श्रोत्र मैं है परि श्रोत्र सुनै नहिं,
दृष्टि मैं है परि दृष्टि न आवै ॥
बुद्धि मैं है परि बुद्धि न जानत,
चित्त मैं है परि चित्त न पावै ।
शब्द मैं है परि शब्द थदयी कहि,
शब्द हू सुंदर दूरि बतावै ॥६॥
भूमि हु तैसे हि आपु हु तैसे हि,
तेज हु तैसे हि तैसे हि पौना ।
व्योमहू तैसे हि आहि अखंडित,
तैसे हि ब्रह्म रह्यौ भरि भौना ॥
देह सजीग विजोग भयौ जब,
आयौ सु कौन गयौ कहि कौना ।
२६४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
जो कहिये तौ कहै न बनै कछु,
सु दर जांनि गही मुख मौना ॥१०॥
एक ही ब्रह्म रह्यौ भरपूर तो,
दूसरी कौन बतावनहारी ।
जो कोउ जीव करै जु प्रमान,
तौ जीव कहा कछु ब्रह्म तें न्यारौ ॥
जो कहै जीव भयौ जगदीश तें,
तौ रवि माहि कहा कौ अधारौ ।
सु दर मौन गही यह जांनि कै,
कौन हु भांति न व्है निरवारौ ॥११॥
जो हम खोज करैं अभ्यन्तरि,
तौ वह खोज उरै हि बिलावै ।
जो हम बाहिर कौ उठि दौरत,
तौ कुछु बाहिर हाथि न आवै ॥
जो हम काहु कौ पूजत है पुनि,
सोउ अगाध अगाध बतावै ।
ताहि तै कोउन जानि सकै तिहि,
सु दर कोनसी ठौर रहावै ॥१२॥
नैन न बेन न सैन न आस न,
वास न श्वास न प्यास न यातैं ।
॥ आश्चर्य को अंग ॥ [ २६५
शीत न घाम न ठौर न ठाम न,
पुंस न वाम न वाप न मातै ॥
रूप न रेख न मेख अमेख न,
श्वेत न पीत न स्याम न तातै ।
सुंदर माँन गही सिध साधक,
कौन कहै उसको मुख वातै ॥१३॥
वेद थके कहि तंत्र थके कहि,
ग्रंथ थके निशवासरि गातैं ।
शेख थके शिव इंद्र थके पुनि,
खोजि कियौ बहु भाति विधातै ॥
पीर थके अरु मीर थके पुनि,
धीर थके बहु बोल गिरातै ।
सुंदर मौंन गही सिध साधक,
कौन कहै उसकी मुख वातै ॥१४॥
योगि थके कहि जैन थके,
रिषि तापस थाकि रहे फल खातै
न्यासि थके वनवासि थके जु,
उदासि थके बहु फेर फिरातै ॥
२६६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
सेख मसाइक और हु लाइक,
थाकि रहे मन मै मुसकातै।
सु दर मौन गही सिध साधक,
कौन कहै उसकी मुख बातै ॥२५॥
॥ इति आश्चर्य को अंग सम्पूर्ण ॥
॥ इति सुन्दरविलास-सवैयाग्रन्थ सम्पूर्ण ॥
॥ हरि. ॐ तत् सत् ॥
परिशिष्ट
भावार्थ टिप्पणी
विपर्यय का अङ्ग
(१) श्रवणहु देखि-शास्त्र द्वारा देखना या श्रवण करना
यथा-'आत्मा का अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो निदिध्यासितव्य ।'
सुनै पुनि नैनहु - अन्तर्दृष्टि से समझना या मनन । जिव्हा
सू घि-वाणीपर ओम्, राम या ररकार रटन ध्वनि का आनद
लेना । नासिका बोल-श्वास प्रश्वास के साथ 'सोऽहम्' भाव
का अनुसधान करना । गुदा खाई-मूलाधारचक्र से योगाभ्यास
प्रारभ करना । इन्द्रिय जल पीवै-इन्द्रियों का प्रत्याहार
करना । विनही हाथ सुमेरुहि तोल-ममता छोडकर अहकार
को उतार फेंकना । ऊचे पइ-उच्चतम परमपद ब्रह्म को
पाना, अह ब्रह्मास्मि ऐसी ऊची दृष्टि रखना, अपने जीवन
का लक्ष्य ऊचा बनाये रखना, उच्च विचार रखना । मूण्ड
नीचे कूं-अहभाव को तोडना या ईश्वर गुरु सन्तो को
नमस्कार करना । तीनलोक मे विचरत डोल-तीनो अव-
स्थाओ का साक्षी बन कर रहना ।
(२) अधा तीन लोक को देखे-ससार से आख
मू दकर आत्मदृष्ट से या ब्रह्मदृष्टि से सबको
देखना । यथा-यो मा पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि
पश्यति । बहरा सुने बहुत विधि वाद-कर्णावरोध
२६८
करके आन्तरिक ध्वनिया का सुनना या अनासक्त
उदासीन भाव से सब सुनना या सब व्यवहार करना ।
नकटा वास कमल की लेवे-लोकसज्जा छोड कर भगवत्
प्रेम का आनन्द लेना । गूगा करे बहुत सवाद-सासारिक
चर्चाओ मे मौन रहकर ब्रह्मचर्चा मे लीन रहना । टू टा
पकरि उठावै पर्वत-सब व्यवहार करता हुआ भी निष्क्रिय
होना, कर्तृत्वाभिमान से दूर रहना । पगुल करे नृत्य
आल्हाद-निष्काम होकर सतोष का आनन्द लेना ।
अथवा परमेश्वर हमारी तरह चर्मचक्षु न होने पर
भी तीनो लोको का द्रष्टा है । चर्म श्रोत्रेन्द्रिय न होने पर
भी सब सुन रहा है । चर्मनासिका न होने पर भी हमारे
हृदयकमल के पवित्रभावो की सुगध ले रहा है । चर्म
जिव्हा न होने पर भी हमारे हृदय मे बोल रहा है
या हमें बुलवा रहा है । निष्क्रिय होकर भी सारे विश्व के
पालन पोषण का भार उठा रहा है निष्काम होकर भी सब
लीला कर रहा है । यथा—'पश्यत्यक्षु स शृणोत्यकर्ण.’
इत्यादि ।
(३) कु जरको कीरी गिल बैठी-सूक्ष्म विवेक विचार
बुद्धि से कामादि वासनाओ को जीतना । सिंघ हि पाइ
अघानो श्याल-सियार जैसे अल्पप्राण जीव का भी आत्म-
ज्ञान के बल पर अज्ञान को जीतना । मछरी अग्नि माहि
सुख पायो-जीव का ब्रह्मज्ञान की अग्नि मे सुख पाना ।
जल मे हुती बहुत बेहाल-ससार सागर मे जीव का दुखी
होना । पगु चल्यो पर्वतके ऊपर-निष्काम होकर मन
को विजय करना । मृतक हि देखि डरानो काल-जीवत-
मृतक (जीवन्मुक्त) होकर काल या मृत्यु को जीतना ।
(४) बू द हि माहि समुद्र समानो-आत्मा मे परमात्म-
भाव का भर जाना । राई माहि समानो मेर-बीज मे वृक्ष
की तरह आत्मा या ब्रह्म मे सबका लीन हो जाना । पानी
माहि तुम्बिका वूडी-सासारिक वासनाओ के सरोवर मे
आत्मा का डूब जाना । पाहन तिरत न लागी वार-पत्थर
जैसे अज्ञानी जीव का भी ज्ञान द्वारा ससार जगत को
पार कर जाना । सूरज कियो सकल अधेर-ज्ञान द्वारा
सासारिक भेद ज्ञान का लोप हो जाना । मूरख होई सु
अर्थहि पावै-सासारिक दृष्टि से पागल होकर ही परमानन्द
या परमज्ञान प्राप्त करना ।
(५) मछली-विवेक बुद्धि । वगुला-दभ, पाखड ।
मूसा-यथार्थ ज्ञान । साप-सशय ज्ञान । सूवा-ज्ञान या ज्ञानी ।
विलैया-अविद्या । वेटी-ब्रह्मविद्या । मा-माया । वेटा-
आत्मज्ञान । वाप ससार या शरीर ।
(६) देव-परब्रह्म, परमात्मा । देवल-विश्व या शरीर ।
शिष्य-मन । गुरु-आत्मा । राजा-स्वामी, आत्मा । रक-
शरीर । वन्ध्या-निष्काम बुद्धि । पगुपुत्र-निश्चल तत्त्व
ज्ञान । घर-देहाध्यास ।
२७०
(७) कमल-हृदय, मन। पानी-भगवत्प्रेम। सूर-
ब्रह्मज्ञान। शीतलता-शान्ति।
(८) हस-सत्वगुण। ब्रह्मा-रजोगुण। गरुड-रजोगुण।
हरि-सत्त्वगुण। बैल-शरीर। शिव-आत्मा। देव-आत्मज्ञान।
पाती-देहासक्ति। जरख-मन। डायन-विषयासक्ति। पानी-
राग। अ गीठी-सुख दुख।
(६) कपडा-शरीर । धोवी-मन । माटी-तृष्णा ।
कुम्हार-जीवात्मा। सूई-स्वरूप स्मृति । दरजी-जीवात्मा।
सीवे-ब्रह्म से मिलावे । सोना-प्रभुस्मरण । सुनार-मन ।
लकरी-ध्यान । बढई-जीव । छीले-कर्मका क्षय करे ।
खाल-प्राणायामकी-धोकनी । लुहार-प्राणी ।
(१०) घर-शरीर । मिठाई-विषयानन्द । लोन-
ब्रह्मानन्द। पर्वत-अज्ञान का । धौन-पवन ज्ञान का ।
(११) रजनी-प्रवृत्ति । दिवस-निवृत्ति । तेल-ब्रह्म
चिंतन । दीपक-ज्ञान । बाति-बत्ती, पचभूत । पानी-उपासना
निगुरा-निर्गुण ।
(१२) मेघ-भगवत्प्रेम । धार-भनकी धारा । मेरु-
अहकार । नदी-सासारिक आसक्ति । बीजली-रजोगुणी
तमोगुणी बुद्धि । कासा-सत्वगुण । कुटुम्ब-शुभाशुभ सस्कार ।
२७१
(१३) वाडी-कर्म । माली-जीव । हाली-मन ।
खेत-शरीर । हस-जीवात्मा । श्यामरग-प्रभु
प्रेम । भ्रमर-मन । शशिहरि-चन्द्रमा, मन । राहु-रजोगुण
तमोगुण । सूर-ज्ञान का सूर्य । केतु-अज्ञान । सगुरा-सगुण
ससार । निगुरा-निर्गुण ब्रह्म ।
(१४) अग्नि-विरहाग्नि । लकडी-प्रभु प्राप्ति की
लालसा ! पानी-ध्यान । घीव-प्रभुदर्शन ।
(१५) पात्र-शुद्ध हृदय । झोली-सात्विक विचार ।
योगी-जिज्ञासु । भिक्षा-ब्रह्मानुभव । जगत-ससारी जन ।
जागे-प्रवृत्ति मे रहे । गोरख-सतजन । सोवे-समाधि लगावे ।
भिक्षा-ब्रह्मानुभूति ।
(१६) निदंयी-निर्मोही । पशुघातक-इन्द्रियसयमी ।
दयावत-इन्द्रियासक्त । लोभी-जिज्ञासु । निर्लोभी-ईश्वर
विमुख । मिथ्यावादी-जगत को मिथ्या मानने वाला ।
सत्य कहे-जगत को सत्य समझने वाला । धूप-आत्म
ज्ञान । शीतलता-शान्ति ।
(१७) माई-मोहमाया । वाप-देहाध्यास । उमदानी-
उमगती हुई । धी-बुद्धि । खसम-पति, परमेश्वर । बहू
विचारी-विचारशील बुद्धि । बखतावर-शिक्षक । सास-
मनोवृत्ति । भाई-ब्रह्मज्ञान । कुटुम्ब-वासना, ससार ।
२७२
(१८) परधन-श्रात्मानुभव । परनिन्दा अनात्म निवृत्ति ।
परधी-ईश्वर विश्वास । मास-ब्रह्मानन्द । मदिरा-श्रात्म
चितन । अकर्म-निष्काम कर्म । कर्म-सकाम कर्म ।
(१६) बढई-गुरुदेव । चरखा-चित्त । बहू-ब्रह्मबुद्धि ।
सास-स्मृति । नैंन्हू तार-सहज समाधि । पूनी-स्वानुभूति ।
जुलाहा-जीवात्मा । ऊ ची जाति-ब्रह्म से एकता ।
(२०) कुमारी कन्या-गुरुज्ञानरहित बुद्धि । घर-घर
फिरे-भटकती है । वेश्या-विषयासक्त । पतिव्रता-परमात्म
परायण । एक पुरुष-परमात्मा । पापी-जितेन्द्रिय । धर्म-
इन्द्रियासक्ति ।
(२१) विप्र-ज्ञानी संत । रसोई-भजनभाव । चौका-
शम, यम, उपरति, तितिक्षा । लकड़ी-ध्यानवृत्ति ।
चूल्हा-चित्त । रोटी-नामरटन, जप । लकड़ी-ध्यान । तवा-
मन । खिचरी-ब्रह्मबुद्धि । हुण्डिया-माया । आक धतूरा-
कामक्रोधादि मनोविकार ।
(२२) बैल-कर्तृत्वाभिमानी जीव । उलटि-कर्तृत्वाभि
मान छोडकर । नायक-मन बुद्धि को । लांद्यो-कर्तव्य सौंप
दिया । सत्य-परमात्मा । सौदा-ब्रह्मप्राप्ति का । दिसतर-
परदेश । नायकनी-बुद्धि ।
२७३
(२३) वनिक-व्यापारी, जीव । बनजी-व्यापार ईश्वर
भक्ति का । तावडा-सुखदु;ख का । भली वस्तु-ईश्वर भजन,
सत्कर्म । गठरिया बाधी-पुण्य की कमाई की । लेखा-जीवन
का हिसाब । बरी-ब्रह्मरूपी वटवृक्ष । बैल अहकार । पूंजी-
तत्त्वज्ञान की कमाई ।
(२४) पहरायत-पहरेदार व्यवहार बुद्धि । शाह-जीव ।
चोर-वैराग्य बुद्धि या रामनाम । कोतवाल-मन । राजा-
अहकार या जीव । गाव-हृदय या ससार । शोर-प्रशंसा ।
प्रजा-दैवीगुण या मन, प्राण, इन्द्रिय । नगरी-शरीर ।
(२५) राजा-जीवात्मा । विपत्ति-सासारिक तृष्णाएं ।
घर घर-नाना योनि या इन्द्रिया । पाव-शुभाशुभ कर्म
या सकल्प । घोडा-शरीर । बीख-मन की चाल । आक-
इरड-संसार के विषय । सुख-रस । रसभरे ईख-ईश्वर
भक्ति ।
(२६) पानी-ईश्वर प्रेम ; अग्नि-ब्रह्मज्ञान या विरह ।
(२७) खसम-जीव । जोरू-विषयलालसा या
ब्राह्म वृत्ति ।
(२८) पथी-मुमुक्षुजीव, संत पुरुष । पंथ-ज्ञान भक्ति
का मार्ग । निर्भय देश-अद्वैत ब्रह्मस्वरूप । दुष्काल-जन्म-
मरण का चक्कर । सुभिक्ष-अखण्ड ब्रह्मानन्द ।
(२९) अहेरी-मुमुक्षु संत । वन-ससार या शरीर ।
शिकार-मन पर विजय या ब्रह्मप्राप्ति । सिंह व्याघ्र मृग-