सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

पृष्ठ 277, कुल 284 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 277

२६८
करके आन्तरिक ध्वनिया का सुनना या अनासक्त
उदासीन भाव से सब सुनना या सब व्यवहार करना ।
नकटा वास कमल की लेवे-लोकसज्जा छोड कर भगवत्
प्रेम का आनन्द लेना । गूगा करे बहुत सवाद-सासारिक
चर्चाओ मे मौन रहकर ब्रह्मचर्चा मे लीन रहना । टू टा
पकरि उठावै पर्वत-सब व्यवहार करता हुआ भी निष्क्रिय
होना, कर्तृत्वाभिमान से दूर रहना । पगुल करे नृत्य
आल्हाद-निष्काम होकर सतोष का आनन्द लेना ।
अथवा परमेश्वर हमारी तरह चर्मचक्षु न होने पर
भी तीनो लोको का द्रष्टा है । चर्म श्रोत्रेन्द्रिय न होने पर
भी सब सुन रहा है । चर्मनासिका न होने पर भी हमारे
हृदयकमल के पवित्रभावो की सुगध ले रहा है । चर्म
जिव्हा न होने पर भी हमारे हृदय मे बोल रहा है
या हमें बुलवा रहा है । निष्क्रिय होकर भी सारे विश्व के
पालन पोषण का भार उठा रहा है निष्काम होकर भी सब
लीला कर रहा है । यथा—'पश्यत्यक्षु स शृणोत्यकर्ण.’
इत्यादि ।
(३) कु जरको कीरी गिल बैठी-सूक्ष्म विवेक विचार
बुद्धि से कामादि वासनाओ को जीतना । सिंघ हि पाइ
अघानो श्याल-सियार जैसे अल्पप्राण जीव का भी आत्म-
ज्ञान के बल पर अज्ञान को जीतना । मछरी अग्नि माहि
सुख पायो-जीव का ब्रह्मज्ञान की अग्नि मे सुख पाना ।