सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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२६४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
जो कहिये तौ कहै न बनै कछु,
सु दर जांनि गही मुख मौना ॥१०॥
एक ही ब्रह्म रह्यौ भरपूर तो,
दूसरी कौन बतावनहारी ।
जो कोउ जीव करै जु प्रमान,
तौ जीव कहा कछु ब्रह्म तें न्यारौ ॥
जो कहै जीव भयौ जगदीश तें,
तौ रवि माहि कहा कौ अधारौ ।
सु दर मौन गही यह जांनि कै,
कौन हु भांति न व्है निरवारौ ॥११॥
जो हम खोज करैं अभ्यन्तरि,
तौ वह खोज उरै हि बिलावै ।
जो हम बाहिर कौ उठि दौरत,
तौ कुछु बाहिर हाथि न आवै ॥
जो हम काहु कौ पूजत है पुनि,
सोउ अगाध अगाध बतावै ।
ताहि तै कोउन जानि सकै तिहि,
सु दर कोनसी ठौर रहावै ॥१२॥
नैन न बेन न सैन न आस न,
वास न श्वास न प्यास न यातैं ।