सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ आश्चर्य को अंग ॥ [ २६०
गुफा कौ मवारि तह आसन ऊ मारि करि,
प्रान हू की धारि धारि नाक सींटियतु है।
इंद्रिनि कौ घोर करि मन हू कौ फेरि करि,
त्रिकुटि मैं हेरि हेरि हियो छोटियतु है॥
सब छिटकाउ पुनि मुनि भ समाइ तह,
समाधि लगाइ करि आंखि मीटियतु है।
सुन्दर कहत हम और ऊ किये उपाइ,
हाथ न परत तातै हाथ पीटियतु है॥३॥
बोलै ही न मौन धरै बैठै ही न गौन करै,
जागै ही न सोवै मु तौ दूरि हो न नेरी है।
आवै ही न जाइ, न तौ थिर अकुलाइ पुनि,
भूखौं ही न खाइ कछु तातो ही न सीरौ है॥
लेत ही न देत कछु हेत न कुहेत पुनि,
स्याम हो न श्वेत सु तौ रातौ ही न पीरौ है।
दूबरी न मोटी कछु लांबी हू न छोटी तातै,
सुन्दर कहै सु कहा काच ही न हीरौ है॥४॥
भूमि ही न आप न तौ तेज ही न ताप न तौ,
वायु हू न ब्योम न तौ पच कौ पसारौ है।
हाथ ही न पाव न तौ नैन बैन भाव न तौ
रंक ही न राव न तौ बृद्ध ही न बारौ है॥
(४) गौन-गमन। नेरी-नजीक। अकुलाई-चलायमान।