सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
पृष्ठ 278, कुल 284 में से
संदर्भ में पढ़ेंजल मे हुती बहुत बेहाल-ससार सागर मे जीव का दुखी
होना । पगु चल्यो पर्वतके ऊपर-निष्काम होकर मन
को विजय करना । मृतक हि देखि डरानो काल-जीवत-
मृतक (जीवन्मुक्त) होकर काल या मृत्यु को जीतना ।
(४) बू द हि माहि समुद्र समानो-आत्मा मे परमात्म-
भाव का भर जाना । राई माहि समानो मेर-बीज मे वृक्ष
की तरह आत्मा या ब्रह्म मे सबका लीन हो जाना । पानी
माहि तुम्बिका वूडी-सासारिक वासनाओ के सरोवर मे
आत्मा का डूब जाना । पाहन तिरत न लागी वार-पत्थर
जैसे अज्ञानी जीव का भी ज्ञान द्वारा ससार जगत को
पार कर जाना । सूरज कियो सकल अधेर-ज्ञान द्वारा
सासारिक भेद ज्ञान का लोप हो जाना । मूरख होई सु
अर्थहि पावै-सासारिक दृष्टि से पागल होकर ही परमानन्द
या परमज्ञान प्राप्त करना ।
(५) मछली-विवेक बुद्धि । वगुला-दभ, पाखड ।
मूसा-यथार्थ ज्ञान । साप-सशय ज्ञान । सूवा-ज्ञान या ज्ञानी ।
विलैया-अविद्या । वेटी-ब्रह्मविद्या । मा-माया । वेटा-
आत्मज्ञान । वाप ससार या शरीर ।
(६) देव-परब्रह्म, परमात्मा । देवल-विश्व या शरीर ।
शिष्य-मन । गुरु-आत्मा । राजा-स्वामी, आत्मा । रक-
शरीर । वन्ध्या-निष्काम बुद्धि । पगुपुत्र-निश्चल तत्त्व
ज्ञान । घर-देहाध्यास ।