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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

१८२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
देह हलै देह चलै देह ही सौ देह मिलै,
देह खाद देह पीवै देह ही भरतु है ।
देह ही हिमारै गरै, देह ही पावक जरै,
देह रन माँहि झूझ, देह ही परतु है ॥
देह ही अनेक कर्म करत बिबिध भांति,
चुंबक की सत्ता पाइ लोह ज्यों फिरतु है ।
आतमा चेतनरूप व्यापक साक्षी अनूप,
सुन्दर कहत सौ तौ जन्मै न मरतु है ॥१२॥
देह की न देह कछु देह कौ ममत छाडि,
देह तौ दमामा दीयै देह देह जात है ।
घट तौ घटत घरी बरी घट नाश होत,
घट के गये नै घट की न फेरि बात है ॥
पिंड पिंड माहि पिंड पिंड कौ उपावत है,
पिंड पिंड खात पुनि पिंड ही कौ पात है ।
सुन्दर न होइ जासौ सुन्दर कहत जग,
सुन्दर चेतनरूप सुन्दर विख्यात है ॥१३॥
प्रश्नोत्तर
देहू यह किनको है ? देह पंच भूतन की,
पंच भूत कीन ते है ? तामसाहंकार त ।
अहंकार कीन ते है ? जाकौ महत्तत कहें,
महत्तत कीन ते है ? प्रकृति मझार ते ॥

॥ साख्य ज्ञान को अग ॥ [ १८३
प्रकृति हू कौन तै है ? पुरुष है जाकौ नाम,
पुरुष सु कौन तै है ? ब्रह्म निराधार तै ।
ब्रह्म अब जान्यौ हम, जान्यौ है तौ निश्चै कर,
निश्चै हम कियौ है तौ चुप मुख द्वार तै ॥१४॥
एक घट मांहि तौ सुगध जल भरि राख्यो,
एक घट मांहि तौ दुर्गन्ध जल भर्यौ है ।
एक घट माहि पुनि गंगोदक राख्यो आन, '
एक घट माहि आनि मदिराऊ कर्यौ है ॥
एक घृत एक तेल एक माहि लघुनीति,
सबही मैं सविता कौ प्रतिबिब पर्यौ है ।
तैसे ही सुन्दर 'ऊच नीच मध्य एक ब्रह्म,
देह भेद देखि भिन्न भिन्न नाम धर्यौ है ॥१५॥
भूमि परै अप, अपहू कै परै पावक है,
पावक कै परै पुनि वायु हू बहुत है ।
वायु परै व्योम व्योम हू कै परै इन्द्रिय दस,
इन्द्रिनि कै पर अन्त.करन रहतु है ॥
अन्तहकरन परै तीनौ गुन 'अहकार,
अहकार परै महत्तत कौ लहतु है ।
महत्तत्त परै मूल माया, माया परै ब्रह्म,
ताहि तै परात्पर सुन्दर कहतु है ॥१६॥
(१५) सविता-सूर्य । लघुनीति-पेशाब ।
(१६) परात्पर-सबसे परे, ऊपर ।

१८४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
भूमि तौ विलीन गंध गंध हू विलीन आप,
आप हू विलीन रस रस तेज खातु है ।
तेज रूप रूप वायु वायु हू सपर्श लीन,
सो सपर्श व्योम शब्द तम हि बिलातु है ॥
इन्द्रिय दस रज मन देवता विलीन सत्व,
तीनि गुन अह महतत्त गलि जातु है ।
महतत्त प्रकृति प्रकृति हू पुरुष लीन,
सुन्दर पुरुष जाय ब्रह्म मैं समातु है ॥१७॥
आतमा अचल शुद्ध एक रस रहै सदा,
देह बिवहारनि मैं देह ही सौ जानिये ।
जैसे शशि मंडल अभग नही भग होइ,
कला आवै जाहि घटि बढ़ि सौ बखानिये ॥
जैसे द्रुम सुथिर नदी कै तट देखियत,
नदो के प्रवाह माहि चलतौ सौ मानिये ।
तैसैं आतमा अतीत देह कौ प्रकाशक है,
सुन्दर कहत यौ बिचारि भ्रम भानिये ॥१८॥
आतमा शरीर दोऊ एकमेक देखियत,
जब लग अन्तहकरन मैं अज्ञान है ।
जसै अन्धियारी रैनि घर मैं अन्धेरौ होइ,
आंखिनि कौ तेज ज्यौ कौ त्यौं ही विद्यमान है ।
जदपि अधेरै माहि नैन कौ न सूझै कछु,
तदपि अधेरै तैं सौ अलिप्त बखानि है ।

॥ सांख्य ज्ञान को अंग ॥ [ १८५
सुन्दर कहत तौ जौं एक मेक जांनत है,
जौ लौ नहि प्रगट प्रकाश ज्ञान भानु है ॥१९॥
देह जड देवल मैं आतमा चैतन्य देव,
याही कौ समुझि कर यासौ मन लाइये ।
देवल कौ बिनशत बार नहिं लागै कछु,
देव तौ सदा अभग देवल मैं पाइये ॥
देब की शकति कर देवल की पूजा होइ,
भोजन बिबिध भाति भोग हू लगाइये ।
देवल तें न्यारौ देव देवल मैं देखियत,
सुन्दर बिराजमान और कहा जाइये ॥२०॥
प्रीति सो न पाती कोऊ प्रेम से न फूल और,
चित्त सौ न चदन सनेहू सौ न सेहरा ।
हृदै सौ न आसन सहज सौ न सिंघासन,
भाव सी न सौज और मुनि सौ न गेहरा ॥
शील सौ सनान नाहिं ध्यान सौ न धूप और,
ज्ञान सौ न दीपक अज्ञान तम के हरा ।
मन सी न माला कोऊ सोऽहू सौ न जाप और,
आतमा सौ देव नाहिं देह सौ न देहुरा ॥२१॥
(२०) देवल-देवालय, मन्दिर ।
(२१) देहुरा-देवालय, मन्दिर ।

१८६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
श्वासै श्वास राति दिन सोह सोह होइ जाप,
याहि माला बार बार दिढकै धरतु है ।
देह परै इन्द्रिय परै अतहकरन परै,
एक ही अखंड जाप ताप कौ हरतु है ॥
काठ की रुद्राक्ष की रु सूतहू की माला और,
इनकै फिरायै कान कारिज सरतु है ।
सुन्दर कहत ताते आतमा चेतनि रूप,
आपुकौ भजन सु तौ आपु ही करतु है ॥२२॥
क्षीर नीर मिलि दोऊ एकठे ई होइ रहे,
नीर छाडि हस जैसे क्षीर कौ गहतु है ।
कचन मैं ओर धात मिलि कर बान पर्यौ,
शुद्ध कर कचन सुनार ज्यौ लहतु है ।
पावक हू दारु मधि दारु ही सौ होइ रह्यौ,
मथि कर काढै सोई दारु कौ दहतु है ।
तैसे ही सुन्दर मिल्यौ आत्मा अनात्मा जू,
भिन्न भिन्न करिये सु साख्य यौ कहतु है ॥२३॥
अन्नमय कोश सु तौ पिंड है प्रगट यह,
प्रानमय कोश पच वायु हू बखानिये ।
मनोमय कोश पच कर्म इन्द्रिय प्रसिद्ध,
पच ज्ञान इन्द्रिय विज्ञान कोश जानिये ॥
जाग्रत सुपन विषै कहि चत्वार कोश,
सुषुपति माहि कोश आनदमय मानिये ।

॥ साख्य ज्ञान को अंग ॥ [ १८७
पच कोश आतमा कौ जीव नाम कहियत,
सुन्दर शंकर भाष्य साख्य यह आनिये ॥२४॥
जाग्रत अवस्था जैसे सदन मै बैठियत,
तहा कछु होइ ताहि भली भाति देखिये ।
स्वपन अवस्था जैसे ओवरे मै बैठे जाइ,
रहै रहै उहा हू की वस्तु सब लेखिये ॥
सुषुपति भौंहरे मै बैठे तै न सूझि परै,
महा अंध घोर तहा कछू हू न पेखिये ।
व्यौम अनुसूत घर आवरे भौंहरे मै,
सुन्दर साक्षी स्वरूप तुरिया विसेखिये ॥२५॥
जाग्रत कै विषै जीव नैननि मैं देखियत,
विविध व्योहार सब इन्द्रिन गहतु है ।
स्वपने हूं मांहि पुनि वैसे ही व्यौहार होत,
नैननि तै आइ कर कठ मैं रहतु है ॥
सुषुपति हृदै मै बिलोन होइ जात जब,
जाग्रत स्वपन की तौ सुधि न लहतु है ।
तीनि हू अवस्था कौ साक्षी जब जाने आपु,
तुरिया स्वरूप यह सुन्दर कहतु है ।२६।
(२५) अनुसूत-अनुस्यूत, प्रविष्ट । तुरिया-तुरीय,
चतुर्थ ।

१८८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
इन्द्वव छन्द
जाग्रत रूप लिये सब तत्त्वनि,
इन्द्रिय द्वार करै व्यवहारी।
स्वप्न शरीर भ्रमै नव तत्त्व कौ,
मानत है सुख दुख अपारौ ॥
लीन सबै गुन होत सुषूप्ति,
जानै नही कछु घोर अंधारी।
तीनौ कौ साक्षी रहे तुरियातत,
सुन्दर सोई स्वरूप हमारौ ॥२७॥
भूमि तै सूक्षिम आप कौ जानहु,
आप तैं सूक्षिम तेज कौ अंगा।
तेज तैं सूक्ष्म वायु बहै नित,
वायु तैं सूक्ष्म व्योम उतगा ॥
व्योम तैं सूक्षिम है गुन तीनि,
तिन्हू तैं अह महत्तत्त्व प्रसंगा।
ताहु तै सूक्षिम मूल प्रकृति जू,
मूलतैं सुन्दर ब्रह्म अभंगा ॥२८॥
ब्रह्म निरंतर व्यापक अग्नि,
अरूप अखंडित है सब माही।
ईश्वर पावक रासि प्रचंड जू,
सग उपाधि लिये वर ताही।

॥ सांख्य ज्ञान को अंग ॥ [ १८६
जीव अनंत मसाल चिराग सु,
दीप पतंग अनेक दिखाँही ।
सुन्दर द्वैत उपाधि मिटै जब,
ईश्वर जीव जुदै कछु नाही ॥२६॥
ज्यों नर पावक लौह तपावत,
पावक लौह मिले सु दिखाही ।
चोट अनेक परै घन की सिर,
लोह वधै कछु पावक नाही ॥
पावक लीन भयौ अपनै घर,
शीतल लौह भयौ तब ताही ।
त्यौं यह आतम देह निरंतर,
सुन्दर भिन्न रहै मिलि माही ॥३०॥
आतम चेतनि शुद्ध निरंतर,
भिन्न रहै कहुं लिप्त न होई ।
है जड़ चेतनि अन्त करन जु,
शुद्ध अशुद्ध लिये गुन दोई ॥
देह अशुद्ध मलीन महा जड़,
हालि न चालि सकै पुनि वोई ।
सुन्दर तीनि विभाग किये बिन,
भूलि परै भ्रमतै सब कोई ॥३१॥

१६० ] ॥ सुन्दर विलास ॥
सवैया छंद
ब्रह्म अरूप अरूपी पावक,
व्यापक जुगल न दीसत रग ।
देह दारु तै प्रगट देखियत,
अन्त'करन अग्नि द्वय अग ॥
तेज प्रकाश कल्पना तौ लग,
जौ लग रहै उपाधि प्रसग ।
जह के तहा लोन पुनि होई,
सुन्दर दोऊ सदा अभग ॥३२।
देह शराव तेल पुनि मारुत,
वाती अन्त करन विचार ।
प्रगट जोति यह चेतनि दीसै,
जातै भयौ सकल उजियार ॥
व्यापक अग्नि मथन कर जोये,
दीपक बहुत भाति बिस्तार ।
सुन्दर अद्भुत रचना तेरी,
तूं ही एक अनेक प्रकार ॥३३॥
तिल मैं तेल दूध मैं घृत है,
: दारु मांहि पावक पहिचानि ।
पुहुप मांहि ज्यौ प्रगट बासना,
इक्षु मांहि रस कहत बखानि ॥
।(३३) शराव-शकोरा, मिट्टी का दीया ।

॥ सांख्य ज्ञान को अंग ॥ [ १६१
पोसत मांहि अफीम निरंतर,
बनस्पती मैं सहत प्रवानि ।
सुन्दर भिन्न मिल्यौ पुनि दीसत,
देह मांहि यौं आतम जानि ॥३४॥
जाग्रत स्वप्न सुषूपति तीनों,
अन्त करन अवस्था पावैं ।
प्रान चलै जाग्रत अरु सुप्ने,
सुषुपति मैं पुनि अहर्निसि धावै ॥
प्रांन गये तै रहै न कोऊ,
सकल देखता थाट बिलावै ।
सुन्दर आतम तत्त्व निरंतर,
सौ तौ कतहू जाड न आवै ॥३५॥
पन्द्रह तत्व स्थूल कुम्भ मैं,
सुक्षिम लिंग भर्यौ ज्यौ तोय ।
वहा जीव यहा आभा दीसै,
ब्रह्म इन्दु प्रतिबिंबे दोय ॥
घट फूटै जल गयौ विलय व्है,
अन्तहकरन कहै नहि कोय ।
तब प्रतिबिंब मिलै'शशि बिंबहि,
सुन्दर जीव ब्रह्ममय होय ॥३६॥

४. अंग १६-२०: भक्ति-माहात्म्य, वैराग्य-निरूपण व समाधि-दशा

१६२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
मनहर छंद
जैसे व्योम कुम्भ कै बाहिर अरु भीतरहू,
कोऊ नर कुम्भ कौ हजार कोस लै गयौ ।
ज्यौ ही व्योम इहा त्यौही उहा पुनि है अखड,
इहां न बिछौह न तौ उहा मिलाप है भयौ ॥
कुम्भ तौ नयौ पुरानौ होइ कै बिनशि जाइ,
व्योम तौ न व्है पुरानौ न तौ कछु व्है नयौ ।
तैसे ही सुन्दर देह आवै रहै नाश होइ,
आतमा अचल अविनाशी है अनामयौ ॥३७॥
देह कै सजौग ही तै शीत लगै घाम लगै,
देह कै सजौग ही तै क्षुधा तृषा पौन कौं ।
देह कै सजौग ही तै कटुक मधुर स्वाद,
देह कै सजौग कहै खाटौ खारौ लौन कौ ॥
देह कै सजौग कहै मुख तै अनेक बात,
देह कै सजौग ही पकरि रहै मौन कौ ।
सुन्दर देह कै सग सुख मानै दुख मानै,
देह कौ सजौग गयौ सुख दुख कौन कौं ॥३८।
श्रापु की प्रशसा सुनि आपु ही खुशाल होइ,
आपु ही की निंदा सुनि श्राप मुरझाइ है ।
श्रापु ही कौं सुख मानि आपु सुख पावत है,
श्रापु ही कौं दुख मानि आपु दुख पाइ है ॥
(३७) अनामयो-निर्विकार ।

!। सांख्य ज्ञान को अंग ।। [ १६३
आपु ही की रक्षा करै आपु ही की घात करै,
आपु ही हत्यारो होइ गंगा जाउ न्हाइ है ।
सुन्दर कहत ऐसे देह ही को आपु मानि,
निज रूप भूलि कै करत हाइ हाइ है ॥३६॥
॥ इति सांख्य ज्ञान को अंग सम्पूर्णं ॥

१६४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
अथ बिचार को अंग ॥२६॥
'मनहर छंद
प्रथम श्रवन कर चित्त एकाग्रग्र धरि,
गुरु सत आगम कहै सु उर धारिये ।
दुतीय मनन बारबार -ही बिचार देखै,
जोई कछु सुनै ताहि फेरि कै सभारिये ॥
त्रितिय ताही प्रकार निदिध्यास नीकै करि,
निहसग बिचरत आपुनपौ टारिये ।
सो साक्षातकार याही साधन करत होइ,
सुन्दर कहत द्वैत बुद्धि कौ निवारिये ॥१॥
देखै तौ बिचार कर सुनै तौ बिचार कर,
बोलै तौ बिचार कर करै तौ बिचार है ।
खाइ तौ विचार कर पीवै तौ बिचार कर,
सोवै तौ बिचार कर तौ ही तौ ऊबार है ॥
बैठै तौ बिचार कर उठै तौ बिचार कर,
चलै तौ बिचार कर सोई मत सार है ।
देइ तो बिचार कर लेइ तौ विचार कर,
सुन्दर विचार कर याही निरधार है ॥२॥
(१) द्वैतबुद्धि-भेदभाव ।

॥ विचार को अंग ॥ [ १६५
एक ही बिचार कर सुख दुख सम जानै,
एक ही विचार कर मल सब धोइ है।
एक ही विचार कर ससार समुद्र तिरै,
एक हो विचार कर पारगत होइ है ॥
एक ही बिचार कर बुद्धि नाना भाव तजै,
एक ही बिचार कर दूसरी न कोइ है।
एक ही बिचार कर सुन्दर सन्देह मिट,
एक ही बिचार कर एक ब्रह्म जोड है ॥२०॥
इन्दव छंद
रूप कौ नाश भयौ कछु देखिये,
रूप तौ रूप ही माहिं समावै ।
रूप कै मद्धि अरूप अखंडित,
सौ तौ कहू कछु जाइ न आवै ॥
बीच अज्ञान भयौ नव तत्त्व कौ,
वेद पुरान सबै कोऊ गावै ।
सोऊ बिचार करै जब सुन्दर,
सोधत ताहि 'कहू नहिं पावै ॥४॥
भूमि सु तौ नही गंध कौ छाडत,
नीर सु तौ रसते नहि न्यारौ ।
तेज सु तौ मिलि रूप रह्यौ पुनि,
वायु सपर्श सदा सु पियारी ॥

१६६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
व्योम रु शब्द जुदे नहिं होत सु,
ऐसे ही अंत करन बिचारौ ।
ये नव तत्त्व मिले इन तत्त्वनि,
सुन्दर भिन्न स्वरूप हमारौ ॥५॥
क्षीण रु पुष्ट शरीर कौ धर्म जु,
शीत हू ऊष्ण जरा मृतु ठानै ।
भूख तृषा गुन प्रान कौ व्यापत,
शोक रु मोह उभै मन आनै ॥
बुद्धि बिचार करै निशि बासरि,
चित्त चितै सु अह्र अभिमानै ।
सर्व कौ प्रेरक सर्व कौ साक्षी हु,
सुन्दर आपुकौ न्यारौ ही जानै ॥६॥
एक ही कूप कै नीर तै सीचत,
ईख अफीम ही अब अनारा ।
होत ऊहै जल स्वाद अनेकनि,
मिष्ट कटुक्क खटा अरु खारा ॥
त्यों ही उपाधि सजोग तें आतम,
दीसत आइ मिल्यौ सु बिकारा ।
काढि लियें जु विचार बिवस्वत,
सुन्दर शुद्ध स्वरूप है न्यारा ॥७॥

॥ बिचार को अंग ॥ [ १६७
रूप परा कौ न जानि परै कछु,
ऊठत है जिहिं मूल तें छानी ।
नाभि विषै मिलि सप्त स्वर हु,
पुरुष सजौग पश्यति बखानी ।।
नाद सजौग हृदै पुनि कठ जु,
मद्धिमा याही बिचारतै जानीं ।
अक्षर भेद लिये मुख द्वार मु,
बोलत सुन्दर बैखरी बानीं ॥८॥
ज्यों कोऊ रोग भयौ नर कै घट,
वैद कहै यह वायु विकारा ।
कोऊ कहै ग्रह आइ लगे सब,
पुत्ति किये कछु होइ ऊबारा ।।
कोऊ कहै इहिं चूक परी कछु,
देवनि दोष कियौ निरधारा ।
तैसे ही सुन्दर तत्रन के मत,
भिन्न ही भिन्न कहै जु विचारा ॥६॥
जे विषया तम पूरि रहे,
तिनकौ रजनी महिं बादर छायौ ।
कोऊ मुमुक्षु किये गुरुदेव,
तिन्है भय युक्त जु शब्द सुनायौ ॥

१६८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
बादर दूरि भये उनके पुनि,
तारनि सौ रजु सर्प दिखायौ ।
सुन्दर सूर प्रकाशत हो भ्रम,
दूरि भयौ रजु कौ रजु पायौ ॥१०॥
कर्म शुभाशुभ की रजनी पुनि,
अर्ध तमोमय अर्ध उजारी ।
भक्ति सु तौ यह है अरुणोदय,
अन्त निशा दिन संधि बिचारी ॥
ज्ञान सु भानु सदोदित बासुरि,
वेद पुरान कहैं जु पुकारी ।
सुन्दर तीन प्रभाव बखानत;
यौ निहचै समुझै विधि सारी ॥११॥
मनहर छंद
देह ई कौ आपु मानि देह ई सौ होइ रह्यौ,
जडता अज्ञान तम शूद्र सोई जानिये ।
इंद्रिनि के व्यौपारनि अत्यन्त निपुन बुद्धि,
तमो रज दुहू करि वैश्य हू प्रमानिये ॥
अ्रतहकरन माहि अहकार बुद्धि जाकै,
रजोगुन बर्धमान छत्री पहिचानिये ।
सत्त्वगुन बुद्धि एक आतमा बिचार जाकै,
सुन्दर कहत वह ब्राह्मन बखानिये । १२॥

॥ विचार को अंग ॥ [ २६६
आतमा के विषै देह आइ करि नाश होइ,
आतमा अखंड सदा एकई रहतु है ।
जैसे साप कचुको कौं लिय रहै कोऊ दिन,
जीरन उतारि करि नूतन गहतु है ।
जैसे द्रुम हू के पत्र फूल फल आइ होत,
तिनकै गये ते द्रुम और हू लहतु है ।
जैसे व्योम माहि अभ्र होइ कै बिलाइ जात,
एसौ सौ बिचार कछु सुन्दर कहतु है ॥१३॥
खरी की डरी सौ अंक लिखिकै विचारियत,
लिखिन लिखित वह डरी घसि जात है ।
लेखौ समुझ्यौ है जब समुझि परी है तब,
जोई कछु सही भयौ सोई रहतु है ।
दारु ही सौं दारु मथि पावक प्रगट भयौ,
वह दारु जारि पुनि पावक मैं समात है ।
तैसे ही सुन्दर बुद्धि ब्रह्म कौ बिचार कर,
करत करत वह बुद्धि हू बिलात है ॥१४॥
आपु कौ समुझि देखि आपु ही सकल मांहि,
आपु ही मैं सकल जगत देखियतु है ।
जैसे व्योम व्यापक अखंड परिपूरन है,
बादर अनेक नाना रूप लेखियतु है ॥
(१३) अभ्र-बादल । द्रुम वृक्ष । कचुकी-कंचली ।

२०० ] ॥ सुन्दर विलास ॥
जैसै भूमि घट जल तरग पावक दीप,
वायु मैं बघूरा जैसे विश्व रेखियतु है।
ऐसै ही विचारत विचार हू विलीन होइ,
सुन्दर ही सुन्दर रहत पेखियतु है ॥१५॥
देह कौ सजौंग पाइ जीव ऐसौ नाम भयौ,
घट कै सजौग घटाकाश ज्यौं कहायौ है।
ईश्वर हू सकल विराट मैं विराजमान,
मठ कै सजौग मठाकाश नाम पायौ है ॥
महाकाश मांहि सब घट मठ देखियत,
बाहिर भीतर एक गगन समायौ है।
तैसे ही सुन्दर ब्रह्म ईश्वर अनेक जीव,
त्रिविध उपाधि भेद ग्रन्थन मैं गायौ है ॥१६॥
देह दुख पावै किधौं इंद्री दुख पावै किधौं,
प्रान दुख पावै जब लहै न अहार की।
मन दुख पावै किधौ बुद्धि दुख पावै किधौं,
चित्त दुख पावै किधौ दुख अहंकार की ॥
गुन दुख पावै किधौं भूत दुख पावै किधौं,
प्रकृति दुख पावै कि पुरुष आधार की।
सुन्दर पूछत कछु जानि न परत ताते,
कौन दुख पावै गुरु कहौ या विचार की ॥१७॥

॥ विचार को अंग ॥ [ २०१
देह कौ तौ दुख नाहि देह पच भूतनि की,
इंद्रीनि कौ दुख नाहि दुख नाहि प्रान की ।
मन हू कौ दुख नाहि बुद्धि हू कौ दुख नाहि,
चित्त हू कौ दुख नाहि, नाहि अभिमान कौ ॥
गुननि कौ दुख नाहिं सून हू कौ दुख नाहि,
प्रकृति कौ दुख नाहि दुख न पुमान की ।
सुन्दर विचार ऐसा सिष्य सां कहत गुरु,
दुख एक देखियत बोध के अज्ञान की ॥१८८।
पृथ्वी भाजन अंग कनक कटक पुनि,
जल हू तरंग दोऊ देखिके वखानिये ।
कारन कारज ये तौ प्रगट ही स्थूल रूप,
ताहि नै नजर मांहि देखि करि आनिये ॥
पावक पवन व्योम ये तौ नहि देखियत,
दीपक बधूरा अभ्र प्रत्यक्ष प्रमानिये ।
आतमा अरूप अति सूक्ष्म तें सूक्ष्म है,
सुन्दर कारन तातैं देह मैं न जानिये ॥१९॥
जैन मत उहै जिनराज कौं न भूलि जाइ,
दान तप शील साची भावना तैं तरिये ।
मन वच काय शुद्ध सबमी दयालु रहै,
दोप बुद्धि दूर करि दया उर धरिये ॥