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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 203

१६४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
अथ बिचार को अंग ॥२६॥
'मनहर छंद
प्रथम श्रवन कर चित्त एकाग्रग्र धरि,
गुरु सत आगम कहै सु उर धारिये ।
दुतीय मनन बारबार -ही बिचार देखै,
जोई कछु सुनै ताहि फेरि कै सभारिये ॥
त्रितिय ताही प्रकार निदिध्यास नीकै करि,
निहसग बिचरत आपुनपौ टारिये ।
सो साक्षातकार याही साधन करत होइ,
सुन्दर कहत द्वैत बुद्धि कौ निवारिये ॥१॥
देखै तौ बिचार कर सुनै तौ बिचार कर,
बोलै तौ बिचार कर करै तौ बिचार है ।
खाइ तौ विचार कर पीवै तौ बिचार कर,
सोवै तौ बिचार कर तौ ही तौ ऊबार है ॥
बैठै तौ बिचार कर उठै तौ बिचार कर,
चलै तौ बिचार कर सोई मत सार है ।
देइ तो बिचार कर लेइ तौ विचार कर,
सुन्दर विचार कर याही निरधार है ॥२॥
(१) द्वैतबुद्धि-भेदभाव ।