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सर्वकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 206

॥ बिचार को अंग ॥ [ १६७
रूप परा कौ न जानि परै कछु,
ऊठत है जिहिं मूल तें छानी ।
नाभि विषै मिलि सप्त स्वर हु,
पुरुष सजौग पश्यति बखानी ।।
नाद सजौग हृदै पुनि कठ जु,
मद्धिमा याही बिचारतै जानीं ।
अक्षर भेद लिये मुख द्वार मु,
बोलत सुन्दर बैखरी बानीं ॥८॥
ज्यों कोऊ रोग भयौ नर कै घट,
वैद कहै यह वायु विकारा ।
कोऊ कहै ग्रह आइ लगे सब,
पुत्ति किये कछु होइ ऊबारा ।।
कोऊ कहै इहिं चूक परी कछु,
देवनि दोष कियौ निरधारा ।
तैसे ही सुन्दर तत्रन के मत,
भिन्न ही भिन्न कहै जु विचारा ॥६॥
जे विषया तम पूरि रहे,
तिनकौ रजनी महिं बादर छायौ ।
कोऊ मुमुक्षु किये गुरुदेव,
तिन्है भय युक्त जु शब्द सुनायौ ॥