सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
प्रारंभिक पृष्ठ एवं सन्त सुन्दरदास जीवन-वृत्त
प्रकाशक :
श्री दादू सत् साहित्य मण्डल
स्वामी लक्ष्मीरामचिकित्सालय
जयपुर
सेवार्पण १२ रु०
महाशिवरात्री
स० २०३८
मुद्रक :
अजन्ता प्रिन्टर्स
जयपुर
प्राक्कथन
यह परमपिता परमेश्वर की ही परमानुकम्पा है कि
श्रीदादू-सत्साहित्य मण्डल सन्तसाहित्य प्रेमियो की सेवा मे
यह “सुन्दर विलास” का प्रकाशन प्रस्तुत कर रहा है ।
जैसाकि श्री दादूसहित्य मण्डल का सकल्प है कि वह
यथासम्भव प्रतिवर्ष ही कोई न कोई छोटा-मोटा प्रकाशन
कर सन्तसाहित्य की सेवा करता रहे, गत वर्ष श्री दादू
नित्यपाठरत्नावली का प्रकाशन प्रस्तुत किया था । इस
वर्ष यह दूसरे प्रकाशन का प्रस्तुतीकरण है ।
सुन्दरविलास श्री स्वामी सुन्दरदास जी महाराज की
अनुपम सुन्दर ग्रंथावली का ही एक अमूल्य हीरा है ।
यह ग्रन्थ बहुत समय से दुर्लभ हो रहा था और बराबर
इसकी माग हो रही थी । उसीकी पूर्ति के लिए सत्साहित्य
मण्डल का यह छोटा सा प्रयास है ।
सुन्दरविलास वास्तव मे ही “सत्य शिव सुन्दरम्” का
सुन्दरतम विलास है । यह इतना सर्वाङ्गसुन्दर है कि
इसका एक एक अङ्ग गुलाब के फूल के समान है जिसकी
पखुडी पखुडी मे फडकती हुई मगलकारी कविता का
सुन्दर रग और ज्ञान-भक्ति-वैराग्य की मोहक सुगन्ध
भरी है ।
“सुन्दर सद्गुरु है सही सुन्दर शिक्षा दीन्ह ।
सुन्दर वचन सुनाय के सुन्दर सुन्दर कीन्ह ॥”
स्वयं सुन्दरदास जी के इन भावविभोर उद्गारो के
अनुसार उनकी बाल्यावस्था मे ही उनके परमगुरुदेव
श्री स्वामी दादूदयालजी महाराज ने परमवात्सल्य के साथ
उनको सुन्दर नाम देकर सुन्दरतम जीवन की जो दीक्षा
दी थी उसीकी दिव्य छटा सुन्दरविलास के पद पद मे
छलकती है । सुन्दरविलास का एक एक शब्द एक अज्ञात
सौन्दर्यसागर मे डुबकी लगाने की प्रेरणा देता है । यह
सुन्दरवाणी किसी तडफती मछली को किसी जल की, किमी
चातक को किसी स्वाति वू द की, किसी चकोर को किसी
चन्द्रमा की किसी सर्प को किसी चंदन तरु की दिशा
दिखाने के लिए पर्याप्त है ।
सुन्दरविलास का यह प्रकाशन सुन्दरदास जी
महाराज की ही पावन सेवा मे एक पुष्पार्पण है । इस
सर्वसुन्दर ग्रन्थ के प्रकाशन मे हमारी असावधानी के कारण
जो असुन्दरता आ गयी हो उसके लिए हम श्री सुन्दरदासजी
महाराज से क्षमाप्रार्थी हैं ।
"सुन्दरदास पुकारि के कहत बजावे ढोल ।
चेति सके न चेति ले हरि बोलो हरि बोल ॥
सुन्दर देखा सोधि के सब काहू का ज्ञान ।
कोई मन माने नही विना निरंजन ध्यान ॥"
॥ हरि ओ३म् तत्सत् ॥
कार्यालय मन्त्री
स्वामी लक्ष्मीराम श्रीदादू सत्साहित्य
चिकित्सालय मण्डल
जयपुर जयपुर
विषय सूची
अङ्ग पृष्ठ
१ गुरुदेव का अंग १
२ उपदेश चितावनी का अग १४
३ काल चितावनी का अग ३१
४ देहात्म विछोह का अग ४३
५ तृष्णा का अग ४६
६ अधैर्य उलाहने का अग ५६
७ विश्वास का अग ६२
८ देह मलिनता का अग ६८
९ नारी का अग ७१
१० दुष्ट का अग ७४
११ मन का अग ७७
१२. चाणक का अग ८६
१३ विपरीत ज्ञानी का अग ९६
१४ वचन विवेक का अग १०२
१५ निर्गुण उपासना का अग १०८
१६ पतिव्रता का अग ११२
१७ विरहनी उलाहने का अग ११६
१८ शब्द सार का अग ११९
१९ शूरातन का अग १२४
२० साधु का अग १३०
२१. भक्ति ज्ञान मिश्रित का अग १४५
२२. विपर्यय का अग १४८
२३. अपने भाव का अग १६१
२४. स्वरूप विस्मरण का अग १६६
२५. साक्ष्य का अग १७७
२६ विचार का अग १९४
२७ ब्रह्मनिष्कलक का अग २०६
२८ आत्मानुभव का अग २०६
२९. ज्ञानी का अग २२५
३० नि संशय ज्ञान का अग २४१
३१. प्रेमपरायण ज्ञान का अग २४३
३२ अद्वैत ज्ञान का अग २४६
३३. जगत मिथ्यात्व का अग २५७
३४. आश्चर्य का अग २६०
३५ भावार्थ टिप्पणी विपर्यय अग २६७
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निर्द्वन्द्वो निरहङ्कारः निर्वैरः सर्वजन्तुषु ।
ब्रह्मनिष्ठो महात्मा श्रीदादूविजयतेतराम् ॥
वीतरागभयक्रोधलोभमोहमदभ्रम ।
सत्यधर्मपर श्रीमान् दादूविजयतेतराम् ॥
स्वामी सुन्दरदासों जयचित्तरा ज्ञानिना श्रेष्ठ
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॥ श्री परमात्मने नम ॥
अथ श्री स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत
सवैया ग्रंथ
श्री सुंदर विलास
प्रारम्भ
'। अथ गुरुदेव को अग ॥१॥
इन्दव छन्द ।
मौज करी गुरुदेव दया करि,
शब्द सुनाइ कह्यो हरि नेरो ।
ज्याँ रवि के प्रगटे निशि जातसु,
दूरि कियो भ्रम भांन अधेरो ॥
कायिक वाचिक मानस हू करि,
है गुरुदेव हि वदन मेरो ।
सुन्दरदास कहै कर जोरि जु,
दादूदयालु को हू नित चेरो ॥१॥
(१) मौज करी-आनन्द कर दिया । शब्द सुनाइ-
नोपदेश देकर । कह्यो हरि नेरो-हृदय मे ही भगवान के
र्शन करा दिये । भ्रमभान अधेरो-भ्रमज्ञान का अधेरा ।
यिक-शरीर से । वाचिक-वाणी से । मानस-मन से ।
र जोरि-हाथ जोड़कर । चेरो-सेवक ।
२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
पूरन ब्रह्म विचार निरतर,
काम न क्रोध न लोभ न मोहै।
श्रोत्र त्वचा रसना अरु घ्राण सु,
देखि कछू कहु नैन न मोहै॥
ज्ञान स्वरूप अरूप निरुपम,
जासु गिरा सुनि मोहन मोहै।
सुन्दरदास कहै कर जोरि जु,
दादूदयालु हि मोर नमो है ॥२।
धीरजवत अडिग्ग जितेन्द्रिय,
निर्मेल ज्ञांन गह्यो दृढ आदू।
शील संतोष क्षमा जिनके घट,
लागि रह्यो सु अनाहद नादू॥
भेष न पक्ष निरतर लक्ष्यजु,
और नही कछु वाद विवादू।
(२) पूरण-पूर्ण, सर्वव्यापक। निरतर-सदा, अ
या अव्यवहित, यथा (दादू निरतर पीव पाइया)। ग
वाणी, उपदेश।
(३) निर्मेल-निर्दोष, भ्रमसंशयादि दोषरहि
दृढ-अविचल-निश्चयात्मक। निरतर-निष्पक्षभाव।
हृदय मे। अनाहदनादू-अनाहत नाद, स्वत उद्
सोऽहम् ध्वनि।
॥ गुरुदेव कौ अंग ॥ [ ३
ये सब लक्षण हैं जिन माहि सो,
' सुन्दर के उर है गुरु दादू ॥३॥
भौजल में बहि जातहुते जिन,
काढ़ि लिये अपने करि आदू ।
और सदेह मिटाइ दिये सब,
काननि टेर सुनाइ कै नादू ॥
पूरण ब्रह्म प्रकास कियौ पुनि,
छूटि गये सब वाद विवादू ।
ऐसी कृपा जु करी हम ऊपरि
सुन्दर के उर है गुरु दादू ॥४॥
कोउक गोरख कौ गुरु थापत,
कोउक दत्त दिगंबर आदू ।
कोउक कथर कोउ भरत्थर,
कोउ कबीर कौ राषत नादू ॥
कोउ कहै हरदास हमारे जु,
यौँ करि ठानत वाद विवादू ।
और तो सत सबै सिर ऊपरि,
सुन्दर के उर है गुरु दादू ॥५॥
(४) भौजल-भवजल, ससारसागर। काननि टेर
सुनाई-गुरुमंत्र देकर। (५) दत्त--दत्तात्रेय । भरत्थर-
भर्तृहरि ।
४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
कोउ बिभूति जटा नष धारि,
कहै यह भेष हमारी ही आदू ।
कोउक कान फराइ फिरै पुनि,
कोउक सींगि बजावत नादू ॥
कोउक केश लुचाई करै ब्रत,
कोउक जगम कै शिव वादू ।
ये सब भूलि परै जित ही तित,
सुन्दर के उर है गुरु दादू ॥६॥
जोगी कहैं गुरु जैन कहैं गुरु,
बौध कहैं गुरु जगम मानै ।
'भक्त कहैं गुरु न्यासी कहै,
बनवासी कहै गुरु और बषानै ॥
सेख कहै गुरु सोफी कहै गुरु,
याही तें सुन्दर होत हैगनै ।
वाहु कहैं गुरु वाहु कहैं गुरु,
है गुरु सोई सबै भ्रम भानै ॥७॥
सो गुरुदेव लिपै न छिपै कछु,
सत्व रजो तम ताप निवारी ।
इन्द्रिय देह मृषा करि जानत,
शीतलता समता उर धारी ॥
(७) मृषा-असत्य, क्षणिक विनाशी । शीतलता-शांति ।
द्वैत उपाधि-भेदभाव ।
॥ गुरुदेव कौ अंग ॥ [ २
व्यापक ब्रह्म विचार अखंडित,
द्वैत उपाधि सबै जिन टारी ।
शब्द सुनाइ सदेह मिटावत,
सुन्दर वा गुरु की बलिहारी ॥८॥
पूरण ब्रह्म बताइ दियौ जिन,
एक अखंडित व्यापक सारै ।
राग रु द्वेष करै अब कौन सौं,
जोई है मूल सोई सब डारै ॥
संशय शौक मिट्यौ मन को सब,
तत्व विचार कह्यौ निरधारै ।
सुन्दर शुद्ध किये मल धोइ सु,
है गुरु को उर ध्यान हमारै ॥९॥
ज्यौं कपरा दरजी गहि व्यौंतत,
काष्ठ हि कौं बढई कसि आनै ।
कंचन कौ जु सुनार कसै पुनि,
लोह कौ घाट लुहार ही जानै ॥
पाहन कौं कसि लेत सिलावट,
पात्र कुम्हार कै हाथ निपॉनै ।
तैसे ही शिष्य कसै गुरुदेव जु,
सुन्दरदास तबै मन मानै ॥१०॥
(९) निरधारे-निश्चित । (१०) घाट-घडना । पाहन-
प षाण, पत्थर । झिलावट-मूर्तिका । निपाने-बनता है ।
६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
मनहर छंद ।
ॅशत्रु है न मित्र कोऊ जाकै सब है समांन,
देह कौ ममत्व छाडि आतमा ही राम है ।
और हू उपाधि जाकै कब हूँ न देषियत,
सुख के समुद्र मे रहत आठो जाम है ॥
रिद्धि अरु सिद्धि जाकै हाथ जोरि आगै खरी,
सुन्दर कहत ताकै सब ही गुलाम हैं ।
अधिक प्रशंसा हम कसै करि कहि सकै,
ऐसै गुरुदेवकौ हमारी जु प्रणांम है ॥११॥
झांन कौ प्रकास जाकै अन्धकार भयौ नास,
देह अभिमान जिन तज्यौ जानि सारधी ।
सोई सखसागर उजागर बैरागर ज्यौ,
जाकै बैन सुनत बिलात है बिकारधी ॥
अगम अगाध अति कोऊ नहि जानै गति,
आतमा कौ अनुभव अधिक अपारधी ।
ऐसौ गुरुदेव वदनीक तिहुँ लोक माहि,
सुन्दर विराजमान शोभत उदारधी ॥१२॥
(११) ममत्व-ममता, आसक्ति । उपाधि-लागलपेट ।
आठों जाम-आठो पहर । (१२) सारधी-सारतत्व । बैन-
वचन उपदेश । विकार धी-विकृत विचार । बिलात है-नष्ट
हो जाते हैं । वदनीक-वदनीय । वैरागर-हीरा
॥ गुरुदेव कौ अंग ॥ [ ७
काहू सौं न रोष तोष काहू सौं न राग दोष,
काहू सौं न वैरभाव काहू की न घात है ।
काहू सो न बकवाद काहू सो नही विवाद
काहू सौं न संग न तौ कोऊ पक्षपात है ॥
काहू सौं न दुष्ट वैन काहू सौं न लैन देन,
ब्रह्म कौ विचार कछू और न मुहात है ।
सुन्दर कहत सोई ईशनि कौ महा ईश,
सोई गुरुदेव जाकै दूसरी न बात है ॥१३॥
लोह कौ ज्यौं पारस पखान हू पलटि लेत,
कंचन छुवत होइ जग मै प्रमानिये ।
द्रुम कौ ज्यौं चंदन हू पलटि लगाइ वास,
आपु कै समान ता मै शीतलता आनिये ॥
कीट को ज्यौं भृङ्ग हू पलटि कै करत भृङ्ग,
सोई उडि जाइ ताकौ अचरिज मानिये ।
सुन्दर कहत यह सगर प्रसिद्ध बात,
सद्य शिष्य पलटै सु सत्यगुरु जानिये ॥१४॥
गुरु बिन ज्ञान नाहि गुरु बिन ध्यान नाहि,
गुरु बिन आतम-बिचार न लहतु है ।
(१४) पारस पख न-पारसमणि । द्रुम-साधारण वृक्ष ।
भृङ्ग-भोरा । सद्य तत्काल । पलटे-जीव से शिव बनादे ।
८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
गुरु विन प्रेम नाहि गुरु विन प्रीति नांहि,
गुरु विन शील ह सन्तोष न गहतु है ॥
गुरु विन प्यास नाहि बुधि कौ प्रकाश नाहि,
भ्रम हू कौ नाश नाहि संशय रहतु है ।
गुरु विन वाट नाहि कोटा विन हाट नाहि,
सुन्दर प्रगट लोक वेद याँ कहतु है ॥१५॥
पढ़े के न बैठै पास ग्रन्थिर न वाचि सकै,
विन ही पढ़े तें कैसे आवत है फारसी ।
जौहरी के मिलै विन परख न जानै कोउ,
हाथ नग लिये फिरै मगै नहिं टारसी ॥
वैद हू मिल्यौ न कोऊ बूटी की बताइ देत,
भेद विनु पाये वाकै औषध है क्षारसी ।
सुन्दर कहत मुख रच हू न देख्यो जाइ,
गुरु विन ज्ञान ज्यौ अंधेरे माहि आरसी ॥१६॥
गुरु के प्रसाद बुधि उत्तम दशा कौ ग्रहै,
गुरु के प्रसाद भव दुख बिसराइये ।
गुरु के प्रसाद प्रेम प्रीति हू अधिक बढै,
गुरु के प्रसाद राम नाम गुन गाइये ॥
गुरु के प्रसाद सब जोग की जुगति जानै,
(१५) प्यास आत्मजिज्ञासा । कोडा-धन (१६) वैद-वैद्य,
औषध विशेषज्ञ । क्षार सी-राख के बराबर ।
॥ गुरुदेव को अग ॥ [ ९
गुरु के प्रसाद शून्य मैं समाधि लागे ।
सुन्दर कहत गुरुदेव जो कृपालु होहि,
तिनके प्रसाद तत्व ज्ञान पुनि पाइये ॥१७॥
बूडत भी सागर मैं आडके बंधावै धीर,
पारऊ लगाइ देत नाय कों ज्या खेवसी ।
पर उपकारी सब जीवनि के सारै काज,
कबहू न आवै जाके गुननि कौ छेव सौ ॥
बचन सुनाइ भय भ्रम सब दूरि करै,
सुन्दर दिखाइ देत अनप अभेव सौ ।
और हू सनेही हम नीके करि देखे सोधि,
जग में न कोऊ हितकारी गुरुदेव सौ ॥१८॥
गुरु तात गुरु मात गुरु बंधु निज गात,
गुरुदेव सब सिष्य सकल सवाऱ्यो है ।
गुरु दिये दिव्य नैन गुरु दिये मुख वैन,
गुरुदेव श्रवन दे सब्द हू उचाऱ्यो है ॥
गुरु दिये हाथ पाव गुरु दियो सीस भाव,
(१७) प्रसाद-कृपा । उत्तम दशा-शुद्ध अवस्था ।
भवदुख-संसार के दुख । शून्य मे-निरंजन निराकार
ब्रह्म मे । (१८) बूडत-डूबते हुओ को । भी-भव । खेव
सौ-खेने वाला । छेवै-पार । सोधि-परीक्षा करके ।
१० ] ॥ सुन्दर विलास ॥
गुरुदेव पिंड माहि प्राण आइ डार्यो है ।
सुन्दर कहत गुरुदेव जू कृपालु होइ,
फेरि घाट घरि करि मोहि निसतार्यो है ॥१९॥
कोऊ देत पुत्र धन कोऊ दल बल धन,
कोऊ देत राज साज देव रिषि मुन्यौ है ।
कोऊ देत जस मान कोऊ देत रस आन,
कोऊ देत विद्या ज्ञान जगत मे गुन्यो है ॥
कोऊ देत रिधि सिधि कोऊ देत नव निधि,
कोऊ देत और कछु तातै सीस धुन्यौ है ।
सुन्दर कहत एक दियौ जिन राम नाम,
गुरु सौ उदार कोऊ देख्यो है न सुन्यौ है ॥२०॥
भूमि हू की रेणु की तौ स ख्या कोऊ कहत है,
भार हू अठारा द्रुम तिनके जो पात है ।
मेघन की स ख्या सोऊ रिषिन कही विचार,
बू दन की स ख्या तेऊ आइकै बिलात है ॥
तारन की स ख्या सोऊ कही है पुरान माहि,
रोमन की स ख्या पुनि जितनेक गात है ।
सुन्दर जहा लौ जत सबही को आवै अंत,
गुरु के अनत गुन कापै कहे जात है ॥२१॥
(१६) गात-शरीर । (२१) रेणु-धल के कण ।
जन्त-जन्तु, जीव ।
॥ गुरुदेव कौ अंग ॥ [ ११
गोविंद के कीये जीव जात है रसताल कौ,
गुरु उपदेशे सो तो छूटै जम फद त ।
गोविंद के कीये जीव बस परे कर्मन के,
गुरु के निवाजे सो फिरत है स्वच्छंद तै ॥
गोविंद के कीये जीव बूडत भौसागर मे,
सुन्दर कहत गुरु काढै दुख द्वंद तै ।
और हू कहा लौ कछु मुख तै कहै बनाइ,
गुरु की तौ महिमा अधिक है गोविंद तै ॥२२॥
चिंतामनि पारस कलपतरु कामधेनु,
और हू अनेक निधि वारि वारि नाषिये ।
जोई कछु देखिये सो सकल विनाशवत,
बुद्धि मै विचार करि बहु अभिलाषिये ॥
तातै अव मन वच क्रम करि कर जोरि,
सुन्दर कहत सीस मेलि दीन भापिये ।
बहुत प्रकार तीनो लोक सब मोधे हम,
ऐसी कौन भेट गुरुदेव आगे राखिए ॥२३॥
महादेव वामदेव रिषभ कपिलदेव,
व्यासदेव शुकदेव जयदेव नामदेव जू ।
रामानन्द मुग्धानंद कट्टिय अनतानंद,
(२२) रसातल-पाताललोक । जमफंद-यम की फाँसी ।
(२३) मन वच क्रम-मन वाणी कर्म । मोधे-खोज लिये ।