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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 20

॥ गुरुदेव कौ अंग ॥ [ ११
गोविंद के कीये जीव जात है रसताल कौ,
गुरु उपदेशे सो तो छूटै जम फद त ।
गोविंद के कीये जीव बस परे कर्मन के,
गुरु के निवाजे सो फिरत है स्वच्छंद तै ॥
गोविंद के कीये जीव बूडत भौसागर मे,
सुन्दर कहत गुरु काढै दुख द्वंद तै ।
और हू कहा लौ कछु मुख तै कहै बनाइ,
गुरु की तौ महिमा अधिक है गोविंद तै ॥२२॥
चिंतामनि पारस कलपतरु कामधेनु,
और हू अनेक निधि वारि वारि नाषिये ।
जोई कछु देखिये सो सकल विनाशवत,
बुद्धि मै विचार करि बहु अभिलाषिये ॥
तातै अव मन वच क्रम करि कर जोरि,
सुन्दर कहत सीस मेलि दीन भापिये ।
बहुत प्रकार तीनो लोक सब मोधे हम,
ऐसी कौन भेट गुरुदेव आगे राखिए ॥२३॥
महादेव वामदेव रिषभ कपिलदेव,
व्यासदेव शुकदेव जयदेव नामदेव जू ।
रामानन्द मुग्धानंद कट्टिय अनतानंद,
(२२) रसातल-पाताललोक । जमफंद-यम की फाँसी ।
(२३) मन वच क्रम-मन वाणी कर्म । मोधे-खोज लिये ।