सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ गुरुदेव कौ अंग ॥ [ २
व्यापक ब्रह्म विचार अखंडित,
द्वैत उपाधि सबै जिन टारी ।
शब्द सुनाइ सदेह मिटावत,
सुन्दर वा गुरु की बलिहारी ॥८॥
पूरण ब्रह्म बताइ दियौ जिन,
एक अखंडित व्यापक सारै ।
राग रु द्वेष करै अब कौन सौं,
जोई है मूल सोई सब डारै ॥
संशय शौक मिट्यौ मन को सब,
तत्व विचार कह्यौ निरधारै ।
सुन्दर शुद्ध किये मल धोइ सु,
है गुरु को उर ध्यान हमारै ॥९॥
ज्यौं कपरा दरजी गहि व्यौंतत,
काष्ठ हि कौं बढई कसि आनै ।
कंचन कौ जु सुनार कसै पुनि,
लोह कौ घाट लुहार ही जानै ॥
पाहन कौं कसि लेत सिलावट,
पात्र कुम्हार कै हाथ निपॉनै ।
तैसे ही शिष्य कसै गुरुदेव जु,
सुन्दरदास तबै मन मानै ॥१०॥
(९) निरधारे-निश्चित । (१०) घाट-घडना । पाहन-
प षाण, पत्थर । झिलावट-मूर्तिका । निपाने-बनता है ।