सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ गुरुदेव कौ अंग ॥ [ ७
काहू सौं न रोष तोष काहू सौं न राग दोष,
काहू सौं न वैरभाव काहू की न घात है ।
काहू सो न बकवाद काहू सो नही विवाद
काहू सौं न संग न तौ कोऊ पक्षपात है ॥
काहू सौं न दुष्ट वैन काहू सौं न लैन देन,
ब्रह्म कौ विचार कछू और न मुहात है ।
सुन्दर कहत सोई ईशनि कौ महा ईश,
सोई गुरुदेव जाकै दूसरी न बात है ॥१३॥
लोह कौ ज्यौं पारस पखान हू पलटि लेत,
कंचन छुवत होइ जग मै प्रमानिये ।
द्रुम कौ ज्यौं चंदन हू पलटि लगाइ वास,
आपु कै समान ता मै शीतलता आनिये ॥
कीट को ज्यौं भृङ्ग हू पलटि कै करत भृङ्ग,
सोई उडि जाइ ताकौ अचरिज मानिये ।
सुन्दर कहत यह सगर प्रसिद्ध बात,
सद्य शिष्य पलटै सु सत्यगुरु जानिये ॥१४॥
गुरु बिन ज्ञान नाहि गुरु बिन ध्यान नाहि,
गुरु बिन आतम-बिचार न लहतु है ।
(१४) पारस पख न-पारसमणि । द्रुम-साधारण वृक्ष ।
भृङ्ग-भोरा । सद्य तत्काल । पलटे-जीव से शिव बनादे ।