सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
कोउ बिभूति जटा नष धारि,
कहै यह भेष हमारी ही आदू ।
कोउक कान फराइ फिरै पुनि,
कोउक सींगि बजावत नादू ॥
कोउक केश लुचाई करै ब्रत,
कोउक जगम कै शिव वादू ।
ये सब भूलि परै जित ही तित,
सुन्दर के उर है गुरु दादू ॥६॥
जोगी कहैं गुरु जैन कहैं गुरु,
बौध कहैं गुरु जगम मानै ।
'भक्त कहैं गुरु न्यासी कहै,
बनवासी कहै गुरु और बषानै ॥
सेख कहै गुरु सोफी कहै गुरु,
याही तें सुन्दर होत हैगनै ।
वाहु कहैं गुरु वाहु कहैं गुरु,
है गुरु सोई सबै भ्रम भानै ॥७॥
सो गुरुदेव लिपै न छिपै कछु,
सत्व रजो तम ताप निवारी ।
इन्द्रिय देह मृषा करि जानत,
शीतलता समता उर धारी ॥
(७) मृषा-असत्य, क्षणिक विनाशी । शीतलता-शांति ।
द्वैत उपाधि-भेदभाव ।