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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 18

॥ गुरुदेव को अग ॥ [ ९
गुरु के प्रसाद शून्य मैं समाधि लागे ।
सुन्दर कहत गुरुदेव जो कृपालु होहि,
तिनके प्रसाद तत्व ज्ञान पुनि पाइये ॥१७॥
बूडत भी सागर मैं आडके बंधावै धीर,
पारऊ लगाइ देत नाय कों ज्या खेवसी ।
पर उपकारी सब जीवनि के सारै काज,
कबहू न आवै जाके गुननि कौ छेव सौ ॥
बचन सुनाइ भय भ्रम सब दूरि करै,
सुन्दर दिखाइ देत अनप अभेव सौ ।
और हू सनेही हम नीके करि देखे सोधि,
जग में न कोऊ हितकारी गुरुदेव सौ ॥१८॥
गुरु तात गुरु मात गुरु बंधु निज गात,
गुरुदेव सब सिष्य सकल सवाऱ्यो है ।
गुरु दिये दिव्य नैन गुरु दिये मुख वैन,
गुरुदेव श्रवन दे सब्द हू उचाऱ्यो है ॥
गुरु दिये हाथ पाव गुरु दियो सीस भाव,
(१७) प्रसाद-कृपा । उत्तम दशा-शुद्ध अवस्था ।
भवदुख-संसार के दुख । शून्य मे-निरंजन निराकार
ब्रह्म मे । (१८) बूडत-डूबते हुओ को । भी-भव । खेव
सौ-खेने वाला । छेवै-पार । सोधि-परीक्षा करके ।