सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
गुरु विन प्रेम नाहि गुरु विन प्रीति नांहि,
गुरु विन शील ह सन्तोष न गहतु है ॥
गुरु विन प्यास नाहि बुधि कौ प्रकाश नाहि,
भ्रम हू कौ नाश नाहि संशय रहतु है ।
गुरु विन वाट नाहि कोटा विन हाट नाहि,
सुन्दर प्रगट लोक वेद याँ कहतु है ॥१५॥
पढ़े के न बैठै पास ग्रन्थिर न वाचि सकै,
विन ही पढ़े तें कैसे आवत है फारसी ।
जौहरी के मिलै विन परख न जानै कोउ,
हाथ नग लिये फिरै मगै नहिं टारसी ॥
वैद हू मिल्यौ न कोऊ बूटी की बताइ देत,
भेद विनु पाये वाकै औषध है क्षारसी ।
सुन्दर कहत मुख रच हू न देख्यो जाइ,
गुरु विन ज्ञान ज्यौ अंधेरे माहि आरसी ॥१६॥
गुरु के प्रसाद बुधि उत्तम दशा कौ ग्रहै,
गुरु के प्रसाद भव दुख बिसराइये ।
गुरु के प्रसाद प्रेम प्रीति हू अधिक बढै,
गुरु के प्रसाद राम नाम गुन गाइये ॥
गुरु के प्रसाद सब जोग की जुगति जानै,
(१५) प्यास आत्मजिज्ञासा । कोडा-धन (१६) वैद-वैद्य,
औषध विशेषज्ञ । क्षार सी-राख के बराबर ।