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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

योगियों का स्तर और स्वातन्त्र्य १२९
अभ्यर्थना को कभी भी नहीं टालता है । ऐसे योगी के मध्य अर्थात् सुषुम्णाधाम में प्रतिसमय
हृदय अर्थात् चित्-शक्ति की अनुभूति स्फुटतर रूप में विद्यमान रहती है । इस अवस्था
को (पारिभाषिक शब्दों में) 'स्वप्न-स्वातन्त्र्य' कहते हैं । इसका अभिप्राय यह कि 'स्वप्न-
स्वातन्त्र्य' की अवस्था ही इस बात की सूचिका होती है कि योगी के हृदय पर विद्यमान
तामसिक आवरण फट गया है ॥३४॥
इसके विपरीत—
वृत्ति—यदि योगी स्वस्वरूप में पूर्णतया अवस्थित रहने में सावधानी न बरते तो उसके
लिये स्वप्न-अवस्था में ऊल-जलूल भावों की ही सृष्टि स्वतन्त्ररूप में चलती रहती है। इसका
कारण यह है कि स्पन्द-शक्ति प्रसवधर्मा है अर्थात् उत्तरोत्तर भावों की सर्जना करते
रहना उसका स्वभाव है। असावधान योगी को, जाग्रत् और स्वप्न दोनों अवस्थाओं
में, आम लौकिक प्राणियों की तरह, ऊटपटाङ्ग विकल्पों का ही साक्षात्कार होता रहता
है ॥३५॥
विवरण
प्रस्तुत सूत्रों के व्याख्यान में, स्पन्द-सूत्रों के प्राचीन टीकाकारों में मतैक्य नहीं पाया
जाता है। वास्तव में इन सूत्रों की शब्दावलि के प्रयोग का ढंग ही कुछ इस प्रकार का है कि
किसी भी व्याख्याकार के मन में, सूत्रों के अर्थ के विषय में, अनेक शंकायें उत्पन्न हो सकती
हैं। अस्तु इन टीकाकारों के पारस्परिक मतभेद के झमेले में पड़ना प्रस्तुत प्रयास का लक्ष्य
नहीं है। यहाँ पर केवल इतना ही समझना पर्याप्त है कि प्रस्तुत संदर्भ में हमारे वृत्तिकार
भट्टकल्लट का दृष्टिकोण क्या रहा है ?
भट्टकल्लट की वृत्ति का सूक्ष्म अध्ययन और गम्भीर मनन करने के उपरान्त, पाठक
सहज ही में इस निष्कर्ष पर पहुँच सकता है कि मूल सूत्रकार ने प्रस्तुत सूत्रों में, योगियों को,
आध्यात्मिक योग्यता के आधार पर 'अपरिपक्व', 'परिपक्व' और 'असावधान' इन तीन
श्रेणियों में बांट दिया है। इस अभिप्राय को अभिव्यक्त करने के लिये, उसने पहले सूत्र में
'जाग्रतो देहिनः', दूसरे में 'नित्यं स्फुटतरं मध्ये स्थितः' और तीसरे में 'अन्यथा' शब्दों का
प्रयोग किया है। इसके अतिरिक्त इन तीन सूत्रों में, तीनों प्रकार के योगियों की संकल्पशक्ति
की व्यापकता की परिधि भी निश्चित की है। सूत्रकार के इस सारे अभिप्राय को वृत्ति में इस
प्रकार स्पष्ट किया गया है—
१. पहले सूत्र में उल्लिखित 'जाग्रतो देहिनः' शब्दों का अर्थ वृत्ति में 'अनभिव्यक्त-
स्वरूपस्य योगिनः' इस प्रकार लगाया गया है। इसका अभिप्राय यह कि प्रस्तुत प्रकरण में
जाग्रतो देहिनः' इन शब्दों से संसार के सर्वसाधारण देहधारियों का नहीं, अपितु ऐसे योगियों
का अभिप्राय है जो जाग्रत् अर्थात् अभ्यास के विषय में सावधान तो रहते हों परन्तु अभी
'देहाभिमान के पूर्णतया गल न पाने के कारण स्वरूप पर अवस्थित भी न हों। इस स्तर के
योगियों को अपरिपक्व योगियों के वर्ग में रखा जा सकता है।
१. द्रष्टव्य—शिवसूत्र १.१९ की १५७वीं टिप्पणी ।
९

सूत्र १, १८ में थोड़ा-बहुत प्रकाश डाला गया है।

१३० स्पन्दकारिका
२. वृत्तिकार ने, दूसरे सूत्र में उल्लिखित 'नित्यं स्फुटतरं मध्ये स्थितः' इन शब्दों
का अर्थ—'यच्च तन्मध्ये हृदयं स्फुटतरम् अभिव्यक्तं नित्यम्' इस प्रकार लगाया है : इसके
अनुसार उसका अभिप्राय यह कि जिस योगी को पाञ्चभौतिक काया में रहते हुए और जीवन
का प्रत्येक आदान-प्रदान करते हुए भी, प्रतिक्षण, 'मध्य' में अर्थात् सुषुम्णाधाम में 'हृदय' की
अर्थात् स्वरूपभूत शाक्तस्पन्दना की अनुभूति स्फुटतर रूप में होती रहती हो, उसको जाग्रत्,
स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों पदों में समानरूप से, भावमण्डल के सृष्टि एवं संहार की
स्वतन्त्र अधिकारिता प्राप्त हुई होती है। इस कारण से इस स्तर के योगियों को परिपक्व
योगियों का वर्ग कहा जा सकता है।
इस सम्बन्ध में प्राणाभ्यास की दृष्टि से मध्यनाडी के विकास और ज्ञानमार्ग की दृष्टि
से प्रमाणपद और प्रमेयपद के मध्यवर्ती प्रमातृपद पर अवस्थिति इत्यादि बातों पर पहले ही
सूत्र १, १८ में थोड़ा-बहुत प्रकाश डाला गया है।
३. तीसरे सूत्र में 'अन्यथा' शब्द का प्रयोग किया गया है जिसका अर्थ भट्टकल्लट
ने 'स्वरूपस्थित्यभावे' लिखा है। इसका अभिप्राय यह कि किसी योगी को स्वरूप की अनुभूति
तो हुई होती है परन्तु, अभी उस पर स्थिर रहने की क्षमता प्राप्त करने से पहले
ही वह संसार के शब्द आदि विषयों से आकृष्ट होकर अखण्ड आत्म-अनुसंधान की बात
को सर्वथा भूल जाता है। ऐसे योगी और संसार के इतर सर्वसाधारण लोगों में कोई अन्तर
नहीं है।
इस स्तर के योगियों को असावधान योगियों के वर्ग में रखना युक्तियुक्त प्रतीत
होता है।
उल्लिखित योगियों में स्वातन्त्र्य का तारतम्य—इनमें से पहले प्रकार के योगियों को
केवल जाग्रत् अवस्था पर स्वतन्त्र अधिकार होता है अर्थात् वे केवल इसी अवस्था में मनोनीत
भाववर्ग का साक्षात्कार करने में समर्थ होते हैं। इस स्तर के स्वातन्त्र्य को शास्त्रीय शब्दों
में 'जाग्रत्-स्वातन्त्र्य' कहते हैं।
दूसरे प्रकार के योगी जाग्रत् ओर ¹स्वप्न दोनों अवस्थाओं में, समानरूप से, अभि-
लषित भावों का अनुभव करने में स्वतन्त्र होते हैं। स्मरण रहे कि प्रस्तुत सन्दर्भ में 'स्वप्न'
से स्वप्न और सुषुप्ति² इन दोनों अवस्थाओं का ग्रहण किया जाता है। जहाँ तक जाग्रत्
अवस्था का सम्बन्ध है, इन योगियों को उसकी स्वतन्त्र अधिकारिता पहले से ही सिद्ध होती
है। फलतः परिपक्व योगियों की संकल्पशक्ति इतनी दृढ़ और तीव्र होती है कि वे तीनों
पदों में समानरूप से स्वरूप पर अवस्थित रह सकने के कारण, प्रत्येक पद में मनोनीत विषयों
का ही अनुभव करते रहते हैं। इस स्तर के स्वातन्त्र्य को शास्त्रीय शब्दों में 'स्वप्न-स्वातन्त्र्य'
कहते हैं।
१. स्वप्नपद में बाह्य इन्द्रियों का कार्यकलाप बन्द रहने के कारण केवल मन से ही भावों
का ग्रहण होता है। (द्रष्टव्य—स्प० का०, ४. ३-४)
२. स्वप्नेन परात्मप्रपञ्चेक्षितम् । (स्व० त्रि०, ३. १-२)

संवित् स्पर्श से सर्वज्ञता १३१
तीसरे प्रकार के योगी नित्ययुक्त होकर स्वरूप का अखण्ड अनुसन्धान करने में
आनाकानी बरतने के कारण किसी भी अवस्था के साथ सम्बन्धित स्वतन्त्र अधिकारिता से
हाथ धो बैठते हैं। वे तो संसार के सर्वसाधारण प्राणियों की तरह, अपनी इच्छा के प्रतिकूल
उन्हीं ऊटपटांग विषयों का प्रति समय अनुभव करते हैं जिनका अनुभव त्रिगुणात्मिका प्रकृति
उनको हठात् करवाती है।
अपरिपक्व और परिपक्व योगियों की इच्छा का रूप—अपरिपक्व योगियों की आन्तरिक
इच्छा का रूप 'दिदृक्षारूपा अभ्यर्थना' अर्थात् मनचाहे विषयों को ही देखने की इच्छारूपा
अभ्यर्थना बतलाया गया है। इस सम्बन्ध में स्वभावतः मन में यह प्रश्न उठता है कि क्या
योगी की आत्मा और सूत्र में निर्दिष्ट 'धाता' दो भिन्न सत्तायें हैं जिनमें एक प्रार्थी और
दूसरी प्रार्थना का आलम्बन है? इस शङ्का का समाधान प्राप्त करने के लिये यह समझना
आवश्यक है कि प्रस्तुत प्रकरण में न तो योगी की आत्मा और धाता दो भिन्न सत्तायें हैं
और न 'अभ्यर्थना' शब्द का; किसी के द्वारा किसी को प्रार्थना किये जाने का ही
अभिप्राय है। यहाँ पर 'अभ्यर्थना' शब्द का अभिप्राय केवल तीव्र संवेदनात्मक एकाकारता
है। इसका भाव यह कि योगी की आत्मा अपनी तीव्र संकल्पशक्ति के द्वारा अभिलषित पदार्थों
के साथ इस प्रकार एकाकार हो जाती है कि उसकी ज्ञानेन्द्रियां दूसरे अनन्त पदार्थों के सामने
होते हुये भी केवल उन्हीं पदार्थों का ग्रहण कर लेती हैं। फलतः प्रस्तुत संदर्भ में योगी की
आत्मा स्वयं ही प्रार्थी और प्रार्थना का आलम्बन भी है।
परिपक्व योगियों की इच्छा का रूप 'तादात्म्य-प्रतिपत्तिरूप-प्रणय' बतलाया गया है।
'तादात्म्यप्रतिपत्तिः' शब्द विशुद्ध संवेदन की उस उच्चतर अवस्था का द्योतक है जिस पर पहुँचे
हुये योगी को प्रतिसमय संसार के अनन्त भावमण्डल में केवल अपने ही रूपविस्तार की अखण्ड
अनुभूति होती रहती है। ऐसे योगी के स्वातन्त्र्य की व्यापकता अपरिमित होती है। उसकी
इच्छा साधारण इच्छामात्र नहीं अपितु स्वतन्त्र इच्छाशक्ति होने के कारण कभी अन्यथा हो
ही नहीं सकती है। यही कारण है कि सूत्रकार ने ऐसे तीव्रतर योगिसंकल्प को प्रणय का नाम
दिया है। अभ्यर्थना का पूरा होना कभी कभी संदेहास्पद हो सकता है परन्तु 'प्रणय' में टाल-
मटोल के लिये स्थान ही नहीं है ।। ३३-३५ ।।
[ संवित् स्पर्श से सर्वज्ञता ]
अगले दो सूत्रों में इस तथ्य को प्रस्तुत किया जा रहा है कि शाक्त-बल का अनुभव हो
जाने से योगी में सर्वज्ञता का विकास हो जाता है। उसको २अतीत, व्यवहित और विप्रकृष्ट
१. संवेदनात्मक एकाकारता को शास्त्रीय शब्दों में 'यथाभिमतशरीरोत्पत्तिः' कहते हैं।
इसका अभिप्राय यह है कि आत्मा निजी संवेदन के द्वारा जिन विषयों की ओर उन्मुख
हो जाती है उनको तावत्कालपर्यन्त अपना शरीर ही बना लेती है।
२. 'अतीत'—बीता हुआ।
'व्यवहित'—भविष्य में होने वाला; किसी आड़ के पीछे छिपा हुआ।
'विप्रकृष्ट'—बहुत दूर होने के कारण साधारण इन्द्रियबोध से ओझल।

सूत्र—जिस प्रकार, किसी व्यक्ति को कोई दूरस्थित पदार्थ, चित्त के सावधान होने

१३२ स्पन्दकारिका
विषयों या घटनाओं का ऐसा स्वतःसिद्ध ज्ञान हो जाता है कि मानो वह उनका प्रत्यक्ष
साक्षात्कार कर रहा हो। इन दो सूत्रों में से पहला दृष्टान्त और दूसरा दाष्टान्तिक हैः—
यथा ह्यर्थोऽस्फुटो दृष्टः सावधानेऽपि चेतसि ।
भूयः स्फुटतरो भाति स्वबलोद्योगभावितः ॥३६॥
यथा किल दूरस्थितः कश्चिदर्थः पुरुषेण पूर्वं सावधानेनापि न लक्ष्यते स एव
स्फुटतरो भवति, प्रयत्नविशेषेण निरूप्यमाणस्तत्रैव स्थितस्य ॥३६॥
तथा यत्परमार्थेन यदा यत्र यथा स्थितम् ।
तत्तथा बलमाक्रम्य न चिरात् संप्रवर्तते ॥३७॥
तथा तेनैव प्रयत्नविशेषेण यत् वस्तु येन रूपेण यदा यस्मिन् काले, यत्र देशे,
यथा येनाकारेण संस्थितं, तद् वस्तु तथा स्वबलं स्वस्वरूपमाश्रितस्याचिरेणैव
कालेन प्रतिभाति निरावरणस्वरूपत्वात् तेनातीतानागतं ज्ञानं परिमितविषयं न
किञ्चिदाश्चर्यम् ॥३७॥
अनुवाद
सूत्र—जिस प्रकार, किसी व्यक्ति को कोई दूरस्थित पदार्थ, चित्त के सावधान होने
पर भी, पहली नज़र में स्पष्टरूप में दिखाई नहीं देता है, परन्तु तत्काल ही आत्मबल का
प्रयोग करके देखे जाने पर, उसको, वही पदार्थ स्पष्टतर रूप में दिखने लगता है ॥३६॥
उसी प्रकार योगी को, स्पन्दात्मक आत्मबल पर आरूढ़ होने की दशा में, थोड़े समय
में ही वे सारे पदार्थ, जो जिस समय, जिस देश और जिस आकार-प्रकार में वर्तमान हों, ठीक
उसी अवस्था में बोध का विषय बन जाते हैं ॥३७॥
वृत्ति—जिस प्रकार, किसी व्यक्ति को कोई दूरस्थित पदार्थ, सावधानता से देखे जाने
पर भी, पहले स्पष्टरूप मे परिलक्षित नहीं होता है, परन्तु अनन्तर उसी स्थान पर खड़ा रहते
हुये ही, विशेष प्रयत्न के द्वारा देखे जाने पर उसको, वही पदार्थ बिलकुल स्पष्टरूप में दिखाई
देता है उसी प्रकार स्पन्दात्मक स्वरूप में अवस्थित योगी को, वैसा ही विशेष प्रकार का
प्रयत्न काम में लाने पर, थोड़े समय में, सारे पदार्थों के ठीक उसी रूप का बोध हो जाता
है जिस रूप में वे जिस किसी देश, जिस किसी काल और जिस किसी आकार-प्रकार में
वर्तमान हों। इसका कारण केवल यही है कि उस योगी के स्वरूप पर से तामसिक आवरण
हटा हुआ होता है फलतः योगियों के लिये अतीत एवं अनागत पदार्थों का सही रूप में
बोध होना एक छोटी सी बात है। इसको कोई महान् आश्चर्य समझने की आवश्यकता
नहीं है ॥३६-३७॥
विवरण
शैवशास्त्रियों का विचार है कि साधारण जीवन व्यवहार में भी जिस समय किसी प्राणी
को, अपने नेत्रों और इसलिये ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा स्पष्टतर रूप में ग्रहण किये जाने के

संवित् स्पर्श से सर्वकर्तृता १३३
अयोग्य, शब्द आदि विषयों को, स्पष्टतर रूप में अपने इन्द्रिय बोध का विषय बनाने के प्रति
तीव्र उन्मुखता हो जाती है, उस समय उसकी बहिर्मुखीन रूप में प्रवहमान स्पन्द-धारा
सहसा अन्तर्मुख होकर अपने मूल उद्गमस्थान सामान्य स्पन्द-सागर में डुबकी लगा लेती है
और पलकभर में फिर वहर्मुख हो जाती है। सामान्य स्पन्द सागर तो चतुर्दिक्-बोध-सागर
ही है अतः उसके स्पर्शमात्र से ही केवल चित्त में ही नहीं, अपितु समूची ज्ञानेन्द्रियों में भी
ऐसे आन्तरिक बोधबल का संचार हो जाता है कि वे उन्हीं अस्पष्ट विषयों को स्पष्ट और
यथावत् रूप में ग्रहण कर लेती हैं। पहले¹ बताया जा चुका है कि स्पन्द-शक्ति की इस आक-
स्मिक, अपरलक्ष्य और विद्युत्सम अन्तःबहिः गतिशीलता को शास्त्रीय शब्दों में 'आत्मवल
का स्पर्श' कहते हैं।
यद्यपि स्पन्द-शक्ति की यह गतिशीलता प्रतिक्षण आंतरिक रूप में चलती रहती है
तथापि साधारण प्राणियों को इसकी चेतना नहीं होती है। इसके प्रतिकूल योगियों को सद्-
गुरुओं के अनुग्रह से इसका अनुभव हुआ होता है। वे तीव्रतर विमर्शात्मक अनुसन्धान और
विशेष प्रकार के साधनात्मक प्रयत्नों के द्वारा इन अन्तरालवर्ती संवित् स्पर्शों को पकड़ कर
उन पर स्थिर रह सकने की क्षमता प्राप्त कर लेते हैं। फलतः उनकी संकल्प-शक्ति में इस
मात्रा तक तीव्रता का उदय हो जाता है कि वे आवश्यकता पड़ने पर थोड़ी सी संवेदनात्मक
एकाग्रता के द्वारा अतीत, अनागत और विप्रकृष्ट विषयों को यथावत् रूप में जान
सकते हैं ॥३६-३७॥
[ संवित् स्पर्श से सर्वकर्तृता ]
अगले दो सूत्रों में, शाक्त-बल पर अधिष्ठित रहने वाले योगी में उदित होने वाली
सर्वकर्तृता पर प्रकाश डाला जा रहा है। दोनों सूत्रों में अलग-अलग दृष्टान्तिक बातों को
दृष्टान्तों के द्वारा समझाया जा रहा है:—
दुर्बलोऽपि तदाक्रम्य यतः कार्ये प्रवर्तते ।
आच्छादयेद् बुभुक्षां च तथा योऽतिबुभुक्षितः ॥३८॥
क्षीणधातुरपि तद्बलमुत्साहलक्षणमाक्रम्य यतः कार्ये प्रवर्तते, यथा च कश्चिद्
अशक्तोऽपि व्यायामाभ्यासेन महतीं शक्तिं प्राप्नोति उद्योगबलेन, तथानेन स्वभावा-
नुशीलनेन बुभुक्षामपि आच्छादयति योऽतिबुभुक्षितः स्यात्, यतः सर्वत्रैवात्मस्यरूपस्य
कार्यकारणसंपादनसामर्थ्यमविलम्बम् ॥३८॥
अनेनाधिष्ठिते देहे यथा सर्वज्ञतादयः ।
तथा स्वात्मन्यधिष्ठानात् सर्वत्रैवं भविष्यति ॥ ३९ ॥
अनेनात्मस्वभावेन अधिष्ठिते व्याप्ते शरीरे सर्वज्ञतादयो यस्मात्, तत्र स्वल्प-
यूकाभक्षणमपि क्षिप्रेमेव जानाति, तथा स्वात्मन्यवहितस्य सर्वत्र सर्वज्ञता
भविष्यति ॥३९॥
१. विवरण : १.८ सूत्र ।

सूत्र—(जिस प्रकार) दुर्बल शरीर वाला व्यक्ति भी, किसी अशक्य कार्य को (आवेश

१३४ स्पन्दकारिका
अनुवाद
सूत्र—(जिस प्रकार) दुर्बल शरीर वाला व्यक्ति भी, किसी अशक्य कार्य को (आवेश
के द्वारा कर डालने की परिस्थिति में) अलक्ष्य आत्मबल की प्रेरणा से निष्पन्न कर लेता है,
साथ ही अत्यन्त क्षुधित होने पर (परिस्थिति वश) अपनी क्षुधा को दबा भी लेता है। (उसी
प्रकार) परिपक्व योगी शरीर के अत्यन्त निबंल होने पर भी, स्पन्दात्मक आत्मबल पर आरूढ़
होकर बड़े बड़े दुष्कर काम सहज ही में कर लेता है और अत्यन्त भूखा होने पर अपनी
१क्षुधा को (अभिलषित अवधि तक) नियन्त्रण में भी रख लेता है ॥३८॥
वृत्ति—जिस प्रकार कोई निर्बल व्यक्ति अपने उद्योग-बल का आश्रय लेकर लगातार
व्यायाम करने से महान् शारीरिक बल को (दुबले पतले शरीर के द्वारा भी भारी कामों को
करने की शक्ति) प्राप्त कर लेता है ।
उसी प्रकार योगी २क्षीणधातु होने पर भी, उत्साह के रूप में अभिव्यक्त होने वाले
आत्मबल को वश में लाकर, दुष्कर कामों को करने की ओर प्रवृत्त हो जाता है। इसके
अतिरिक्त वह इसी स्वभाव का निरन्तर अनुशीलन करने से, अत्यन्त क्षुधित होने की अवस्था
में, अपनी क्षुधा को (स्वतन्त्रता से) दबा भी लेता है। इन सारी बातों का मात्र कारण यही
है कि स्वरूप में सर्वत्र कार्यों और उनके कारणों को सत्ता प्रदान करने का सामर्थ्य प्रकट
होने में देर नहीं लगती है ॥३८॥
सूत्र—जहाँ यह एक तथ्य है कि जिस किसी भी सर्वसाधारण शरीर में (जड़ पाञ्च-
भौतिक काया में) यह चेतयिता स्पन्दतत्त्व अधिष्ठित हो, उसमें (तदनुकूल देश, काल और
आकार की परिधि में) सर्वज्ञता इत्यादि धर्म अभिव्यक्त होते हैं, वहाँ यह बात भी
३सुनिश्चित है कि (देहाभिमान से हटकर) सीधा उस आत्म-तत्त्व को ही अहंरूप में अनुभव
करने वाले योगी में, सार्वत्रिक सर्वज्ञता इत्यादि धर्म अवश्य अभिव्यक्त हो जाते हैं ॥३९॥
वृत्ति—जहाँ यह एक तथ्य है कि इस चेतयिता स्वभाव के द्वारा अधिष्ठित सर्व-
साधारण जड़ शरीर में भी (तदनुकूल देश, काल और आकार की सीमा में) सर्वज्ञता इत्यादि
धर्म विद्यमान होते हैं जिनसे वह (जड़ शरीर) एक छोटी सी जूँ के दंश को भी तत्काल ही
अनुभव कर लेता है, वहां यह भी निश्चित है कि उस स्वरूप में ही अवहित अर्थात् पूर्णतया
अधिष्ठित रहने वाले योगी में सार्वत्रिक (सारे भुवनों में समान रूप से कार्यक्षम) सर्वज्ञता
अवश्य अभिव्यक्त हो जाती है ॥३९॥
१. यहाँ पर 'क्षुधा' शब्द सारे देहधर्मों का प्रतीक है अतः सूत्र का तात्पर्य यह है कि योगी
को क्षुधा, निद्रा, स्त्रीचिन्ता इत्यादि देहधर्म विचलित नहीं कर सकते हैं ।
२. बुढ़ापा अथवा रोग जैसे कारणों से जिसके शरीर में धातुओं की कमी हो गई हो ।
३. सूत्र में उल्लिखित 'भविष्यति' क्रिया में प्रयुक्त लुट् लकार निश्चय को ध्वनित
करता है ।

CC-0. Pगलानि और उसका निवारण by eGangotri १३५
विवरण
बहुधा ऐसा देखने में आता है कि किन्हीं विशेष परिस्थितियों में अत्यन्त निर्बल शरीर
वाले व्यक्ति भी अल्पकालावस्थायी आवेशों के बल से ऐसे दुष्कर काम कर डालते हैं जो
सर्वथा उनकी शक्ति से बाहर होते हैं । उदाहरण के तोर पर जहाजों पर काम करनेवाले
और साधारण मानव शरीरों को ही धारण करनेवाले नाविक अकस्मात् उठनेवाले प्रलयंकर
सामुद्रिक तूफानों में, अथवा रणभूमि में लड़नेवाले साधारण सिपाही प्रबल शत्रुओं के प्रचण्ड
एवं आकस्मिक आक्रमणों में, कभी कभी ऐसे अभूतपूर्व कार्य कर डालते हैं कि बुद्धि चक्कर
में पड़ जाती है । आमतौर पर ऐसी अवस्थाओं को 'आवेश' का नाम देकर ही संतोष किया
जाता है परन्तु यह देखना है कि 'आवेश' क्या वस्तु है ? आवेश, किसी भी जीवित प्राणी
में, किसी विशेष क्षण पर अकस्मात् प्रकट होने वाली एक ऐसी दुर्दान्त और प्रवलवेगी वृत्ति
होती है जिससे कि उसके मानसिक क्षेत्र में और उसके द्वारा शरीर के प्रत्येक
भाग में भी किसी अलक्ष्य शाक्त-प्रेरणा का तीव्र संचार हो जाता है । शाक्त-प्रेरणा कहीं
बाहर से नहीं आती है अपितु यह प्रत्येक प्राणी के अन्तर्हृदय में विद्यमान असाम आत्मशक्ति
के स्पर्शमात्र का परिणाम होती है। इस सम्बन्ध में यह बात बिल्कुल अनुभव सिद्ध है कि
आवेशात्मक क्षणों पर प्रत्येक प्राणी तत्काल पर्यन्त अपने देहाभिमान को पूर्णतया भूल कर
विशुद्ध शाक्त-स्वरूप पर अवस्थित होता है। यही कारण है कि वह शरीर के क्षीण होने
पर भी दुष्कर कार्यों को झोंक में निष्पन्न कर लेता है।
साधारण प्राणिवर्ग में पाया जाने वाला आवेश पूर्ण-आवेश नहीं कहा जा सकता क्योंकि
यह मौलिक आत्मबल का नगण्य स्पर्शमात्र होता है। यही कारण है कि साधारण जीवभाव
में ऐसी आवेशात्मक अवस्थायें क्षणपर्यवसायी होती हैं ।
योगियों के विषय में बात कुछ भिन्न होती है। उनका 'अहं' अभिमान शरीर,
प्राण इत्यादि पर नहीं प्रत्युत सीधा आत्मा पर ही होता है। अतः उनको शाक्त-बल का
स्पर्शमात्र ही नहीं अपितु पूर्ण-समावेश ही हुआ होता है। ऐसी परिस्थिति में यदि उनकी
सर्वज्ञता और सर्वकर्तृता इत्यादि सार्वत्रिक और सार्वकालिक हो तो इसमें आश्चर्य की कोई
बात नहीं है । भगवान् रामचन्द्र के प्रिय दूत मारुति का समुद्रलंघन भी तो एक ऐसा ही
शाक्त-समावेश था ।
फलतः साधारण प्राणियों में विद्यमान ज्ञान-क्रियात्मक स्पन्दना उनके शरीरों के
अनुकूल देश, काल एवं आकार की परिधि तक ही सीमित रहती है जबकि परिपक्व योगियों
की स्पन्दना देश, काल आदि के प्राचीरों को तोड़कर विश्वव्यापिनी हुआ करती है ॥३८-३९॥
[ ग्लानि और उसका निवारण ]
अगले दो सूत्रों में यह बात समझाई जा रही है कि ग्लानि अर्थात् मानसिक शिथिलता
या उदासीनता ही आधि-व्याधियों की जन्मदात्री है । वह स्वयं अज्ञान से उत्पन्न हो जाती
है । उन्मेष से अर्थात् अज्ञान का समूल उच्छेद हो जाने से वह और तज्जन्य आधि-व्याधियाँ
Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

उन्मेषेणात्मस्वभावेन यदि नित्योञ्झितं तदा सा कुतः, कारणरहिता भवेत् ? अनेनैव

१३६ स्पन्दकारिका
स्वयं नष्ट हो जाती हैं । यही कारण है कि योगियों के शरीर १वलीपलितादि से रहित,
तेजस्वी और स्वस्थ हुआ करते हैं :—
ग्लानिर्विलुम्पिका देहे तस्याश्चाज्ञानतः सृतिः ।
तदुन्मेषविलुप्तं चेत् कुतः सा स्यादहेतुका ॥४०॥
ग्लानिः किल शरीरस्य विनाशिनी । सा च ग्लानिरज्ञानादुत्पद्यते । तदज्ञानम्
उन्मेषेणात्मस्वभावेन यदि नित्योञ्झितं तदा सा कुतः, कारणरहिता भवेत् ? अनेनैव
कारणेन वलीपलिताभावः शरीरदार्ढ्यं च योगिनाम् ॥४०॥
एकचिन्ताप्रसक्तस्य यतः स्यादपरोदयः ।
उन्मेषः स तु विज्ञेयः स्वयं तमुपलक्षयेत् ॥४१॥
एकत्र विषये व्यापृतचित्तस्य यतो यस्मात् स्वभावात् झगित्‍यन्या चिन्तोत्पद्यते,
स चिन्तायाः कारणम् उन्मेषो ज्ञातव्यः । स तु स्वयमेव योगिना लक्षणीयः, चिन्ता-
द्वयान्तर्व्यापकतयानुभूयमानः ॥४१॥
अनुवाद
सूत्र—मानसिक उदासीनता, शरीर में ( धातु, सामर्थ्य, उत्साह, तेज इत्यादि )
सब कुछ चौपट कर देने वाली होती है वह स्वयं अज्ञान से ही प्रसार में आती है । यदि
उन्मेष के द्वारा अज्ञान का समूल उच्छेद किया जाये तो वह, कारण के न रहने पर, कहां
से उत्पन्न हो सकती है ? ॥ ४० ॥
वृत्ति—ग्लानि अर्थात् मानसिक शिथिलता या उदासीनता निश्चयपूर्वक शरीर अर्थात्
शरीर के धातु, बल, तेज इत्यादि का नाश करने वाली होती है । वह स्वयं केवल अज्ञान
से ही उत्पन्न हो जाती है । यदि उन्मेष अर्थात् चित्-चमत्कारमय स्वरूप विकास के उपाय
से उस अज्ञान का सदा के लिये उच्छेद किया जाये तो वह कहाँ से पैदा हो सकती है ? क्योंकि
उसके पैदा होने का कोई कारण ही नहीं रहता है । यही कारण है कि योगियों के शरीर
दृढ़ होते हैं । उनमें न कभी झुर्रियां ही पड़ पाती हैं और न कभी उनके बाल ही पक
पाते हैं ॥ ४० ॥
सूत्र—किसी व्यक्ति का चित्त कभी किसी एक प्रकार की चिन्ता में डूबा हुआ होता
है और तत्काल ही उसमें जिस अलक्षित आत्मबल से सहसा दूसरी चिन्ता उभर आती है
उसको (आत्म-बल के आकस्मिक विकास को) उन्मेष समझना चाहिये । उस तत्त्व की, निजी
अनुसन्धान के द्वारा, स्वयं टोह लगानी चाहिये ॥४१॥
वृत्ति—यदि किसी चिन्तक का चित्त किसी एक विषय के साथ सम्बन्ध रखने वाली
चिन्ता में एकाग्रभाव से डूबा हुआ हो, तो उसमें जिस स्वभाव के द्वारा सहसा कोई दूसरी
चिन्ता उभर आती है, उस दूसरी चिन्ता के उत्पन्न होने का कारण उन्मेष समझना चाहिये ।
१. बुढ़ापा या अन्य कारणों से मुख में झुर्रियां पड़ना और बालों का सफेद हो जाना ॥

उन्मेष का उदय हो जाता है ॥”

म्लानता और उसका निवारण १३७
योगी को अपने अनुसंधान से स्वयं उसकी टोह लगानी चाहिये । वह तत्त्व दोनों चिन्ताओं के
अन्तरालवर्ती सन्धिक्षण में (सावधान योगियों को), व्यापक रूप में अनुभव में आता
रहता है ॥४१॥
विवरण
प्रस्तुत सूत्रों का भाव समझने में कोई विशेष कठिनता नहीं आती है । केवल उन्मेष
के सम्बन्ध में निम्नलिखित बात ध्यान में रखने के योग्य है ।
सूत्र ४१ में उल्लिखित 'एक-चिन्ता-प्रसक्तस्य' शब्द की व्याख्या करने में टीकाकारों का
दृष्टिकोण भिन्न भिन्न रहा है । कई टीकाकारों के विचारानुसार इसका अर्थ यह है कि
“१जब योगी दैनिक जीवन के सारे आवश्यक कृत्यों को तिलाञ्जलि देकर और अलग-अलग
किसी एक आलम्बन विशेष को अपनी धारणा का विषय बनाकर, अनुसन्धान करते करते
मानसिक एकाग्रता की चरम सीमा पर पहुँच जाता है तब उसमें स्वयं ही चित्-चमत्कारमय
उन्मेष का उदय हो जाता है ॥”
ऐसी व्याख्या के अनुसार उन्मेष-तत्त्व की अनुभूति का पूर्ण स्वाधिकार केवल जंगल
में जाकर आसन जमाने वाले और संसार के प्रति सर्वथा निरपेक्ष व्यक्तियों के लिये ही
आरक्षित बन जाता है । ऐसी परिस्थिति में आज के भौतिकयुगीन आघातप्रतिघातों में फँसे
हुये व्यक्ति के लिये इसके प्रति कोई भी आकर्षण अवशिष्ट नहीं रहने पाता है । इस सम्बन्ध
में यह बात अतीव विचारणीय है कि शैवदर्शन कभी भी पलायनवादी वृत्ति में विश्वास नहीं
रखता है । संसार और उसके आघात-प्रतिघात दोनों के प्रति निरपेक्ष कैसे रहा जा सकता है
क्योंकि दोनों शिवत्व का ही विकास हैं, अतः सत्य हैं । सत्य को नकारा कैसे जा सकता है ?
उन्मेषतत्त्व की उपलब्धि संसार को अलग रखकर नहीं, प्रत्युत उसके कण कण में इसकी व्याप-
कता को अनुभव करने से ही हो सकती है । हाँ उसके लिये महान् साहस और तीव्र आन्तर
अनुसन्धान की आवश्यकता है ।
शायद भट्टकल्लट ने इसी विचार की पृष्ठभूमि पर उपरिनिर्दिष्ट शब्द की सीधी
व्याख्या करके यह तथ्य समझाया है कि प्रतिक्षण मन में उदित और अस्त होने वाली असंख्य
चिन्ताओं के अन्तरालवर्ती संधिक्षणों में नित्योदित उन्मेषतत्त्व की व्यापकता अनुभव में आ
सकती है । उसके लिये उत्सुक व्यक्ति को संसार छोड़कर जंगल में जाने की नहीं, अपितु
संसार का सारा कार्यकलाप करते हुये भी आन्तर विमर्श के द्वारा उस तत्त्व के साथ
नित्ययुक्त रहने की आवश्यकता है ॥४०-४१॥
यहाँ तक योगियों में अभिव्यक्त होने वाली अमित सिद्धियों का वर्णन किया गया ।
अब अगले सूत्र में अवरकोटि की अपरसिद्धियों का संकेतरूप में उल्लेख करके यह समझाया
जा रहा है कि इस प्रकार की सिद्धियाँ असावधान योगियों को क्षोभ में डालकर वास्तविक
लक्ष्य से च्युत कर देती हैं—
१. द्रष्टव्य—स्प० नि०, ३. ८ की व्याख्या ।
Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

सूत्र—उन्मेष का अनुशीलन करने से, थोड़े ही समय में, बिन्दु, नाद, रूप और रस

१३८ स्पन्दकारिका
अतो बिन्दुरतो नादो रूपमस्मादतो रसः।
प्रवर्तन्तेऽचिरेणैव क्षोभकत्वेन देहिनः ॥४२॥
अतः अस्माद् उन्मेषाद् अनुशीलयमानात् 'बिन्दुः' तेजोरूपः, 'नादः' प्रणवाख्यः
शब्दः, 'रूपम्' अन्धकारे दर्शनम्, रसः अमृतास्वादो मुखे, एते क्षोभकत्वेन प्रवर्तन्ते
अचिरेण कालेन ॥४२॥
अनुवाद
सूत्र—उन्मेष का अनुशीलन करने से, थोड़े ही समय में, बिन्दु, नाद, रूप और रस
नामवाली अमित सिद्धियां अभिव्यक्त हो जाती हैं, परन्तु जिस योगी का देहाभिमान पूर्णतया
गला हुआ न हो, उसको ये क्षोभ में डाल देती हैं ॥४२॥
वृत्ति—लगातार अनुशीलन किये जाने वाले उन्मेष के द्वारा, योगी में अति अल्प
समय में ही, बिन्दु अर्थात् एक प्रकार का विशेष तेज, नाद अर्थात् प्रणव नामवाला अनाहत
शब्द, रूप अर्थात् प्रगाढ़ अन्धकार में भी पदार्थों को देख सकने की शक्ति और रस अर्थात्
मुख में अमृत का जैसा आस्वाद, इस प्रकार की सिद्धियां अभिव्यक्त हो जाती हैं परन्तु
(देहाभिमान में ही अवस्थित योगियों को) ये क्षोभ में डाल देती हैं ॥४२॥
विवरण
सूत्र में चार प्रकार की अपरसिद्धियों के पारिभाषिक नामों का उल्लेख किया गया है।
स्पन्दशास्त्र के आचार्यों ने इनका स्वरूप वर्णन इस प्रकार किया है—
१. बिन्दु—१पृथिवीतत्त्व की धारणा देनेवाले योगियों को, एकाग्र ध्यान करने की
प्रखरता से भ्रूमध्य-स्थान पर एक प्रकार का विशेष और उत्तरोत्तर बढ़ता हुआ तेज प्रकट हो
जाता है। इसको बिन्दु कहते हैं। इस धारणा का पारिभाषिक नाम 'बिन्दुभेद' है।
२. नाद—२आकाशतत्त्व की धारणा का अभ्यास करने वाले योगी एक विशिष्ट प्रकार
के स्वयं उच्चरित ध्वनि को सुनते हैं। यह ध्वनि पहले, प्रखर वेग में बहने वाली नदी की
घरघराहट के समान सुनाई देती है और अनन्तर धीरे-धीरे सूक्ष्म होती हुई, मकरन्द पीने से
मस्त बने हुये भौंरे की गुनगुनाहट जैसी प्रतीत होती है।
३. रूप—३तेजस्-तत्त्व की धारणा का अभ्यास करने वाले योगियों को प्रगाढ़ अन्धकार
में भी द्रष्टव्य वस्तु स्पष्टतर रूप में दिखाई देती है।
१. 'बिन्दुः'—भ्रूमध्यादौ प्रदेशे ध्यानाभ्यासप्रकर्षप्रवर्धमानोत्तरोत्तरप्रसादस्तेजोविशेषो, यो
बिन्दुभेदाभ्यासाद् धरातत्त्वध्यायिनामभिव्यज्यते। (स्प० का० वि०, ४. १२)
२. 'नादो'—वेगवन्नद्योधनिर्घोषघनोपक्रमः क्रमसूक्ष्मीभावाभिव्यज्यमानमधुमत्तमधुकर-
ध्वनितानुकारी स्वोच्चरितो ध्वनिविशेषो, यं व्योमतत्त्वाभ्यासिनः शृण्वन्ति।
(स्प० का० वि०, ४. १२)
३. 'रूपं'—सन्तमसाद्यावरणेऽपि सति तत्तद् दृश्यवस्वाकारदर्शनं, यत् तेजस्तत्त्वन्यक्षनिक्षिप्त-
मतयो निरीक्षन्ते। (तत्रैव)

लब्धि और उसका निग्रह १३९
४. रस—जल १तत्त्व की धारणा देने वाले योगी, अपने जिह्वाग्र या उसके निकटवर्ती
लंबिका (गले के अन्दर की घंटी) पर धारणा का अभ्यास करके हैं । धारणा की सिद्धि हो जाने
पर उनको कोई स्वादिष्ट पदार्थ खाने के बिना ही मुख में अमृत के जैसे आस्वाद की अनुभूति
होती रहती है ।
इसके अतिरिक्त योगियों में दिव्य २स्पर्श और गन्ध की अभिव्यक्ति भी हो जाती है
परन्तु उनके विषय में पूरी जानकारी प्राप्त करते के लिए तन्त्रालोक में वर्णित भगवान्
अभिनवगुप्त का दृष्टिकोण समझना आवश्यक है । प्रस्तुत सूत्र में इन दो सिद्धियों का
उल्लेख नहीं किया गया है । अतः यहां पर इस विषय को छेड़ना प्रसङ्गानुकूल नहीं है ।
यद्यपि मालिनीविजय एवं विज्ञानभैरव जैसे रहस्यशास्त्रों में भिन्न-भिन्न धारणाओं
का अभ्यास करने वाले योगियों में अभिव्यक्त होने वाली शतशः सिद्धियों के वर्णन मिलते हैं
तथापि प्रस्तुत सूत्र में ग्रन्थकार ने केवल चार ही सिद्धियों का मात्र नाम-निर्देश किया है ।
शायद उसको ऐसा करने का विशेष अभिप्राय यह रहा होगा कि अवर-सिद्धियों के अतिरंजित
वर्णन से कहीं शिष्यों के मन प्रलोभन में न पड़ जायें । स्पन्द-गुरुओं के विचारानुसार
स्पन्दात्मक शाक्तभूमिका की अनुभूति प्राप्त करना ही सारी साधनाओं का मात्र लक्ष्य होना
चाहिये । इससे इतर अन्य सारी तथाकथित ३योगसिद्धियाँ मायीय उपरागों से रंजित होने के
कारण अवरकोटि की और सर्वथा हेय हैं । इनका स्वरूप सर्वसाधारण मनुष्यों में पाई जाने
वाली अल्पज्ञतारूप अशुद्ध विद्या से तनिक भी बढ़कर नहीं है । ये तो थोड़े समय तक ही
अभ्यास करने से प्रकट हो जाती हैं परन्तु अपरिपक्व योगी कभी इनके भ्रमजाल में पड़कर
घमंड में इतराता हुआ मदारी जैसा बन जाता है । लोग उनके मदारी-खेलों को बड़ी योग-
सिद्धियाँ समझकर उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए, अपने को चेला या चेलिन मुँडवाने के
लिये हमेशा उसके पीछे पड़े रहते हैं । परन्तु अनुभवी सिद्धों ने डंके की चोट कहा है कि ४मित-
सिद्धियों की सौदाबाजी, योगी को स्वरूप-समाधि से बहुत दूर भटका कर अन्धगर्त में गिरा
देती है ।
इस विषय में भगवान् आशुतोष का आदेश यह है कि मितसिद्धियां विनायक५ अर्थात्
१. 'रसो'—रसवद्वस्तुविरहेऽपि अमृतास्वादो मुखे लोलाग्रलम्बिकादिधारणानिरतैर् अप्त्तव-
ध्यायिभिर्य उपलभ्यते । (तत्रैव)
२. 'स्पर्श'—के विषय में विशेषरूप से द्रष्टव्य तन्त्रालोक का ग्यारहवां आह्निक ।
३. गर्भः अख्यातिर्महामाया तत्र तदात्मके मितसिद्धिप्रपञ्चे यश्चित्तस्य विकासः तावन्मात्रे
प्रपञ्चे संतोषः, असावेव·············'किञ्चिज्ज्ञत्वरूपा अशुद्धविद्या'·············'विकल्पात्मा
भ्रमः । (शिवसूत्रवि०, २.४
४. ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः । (पा० यो० द०, ३. ३७)
५. वासनामात्रलाभेऽपि योऽप्रमत्तो न जायते ।
तमनित्येषु भोगेषु योजयन्ति विनायकाः ।।
तस्मान्न तेषु संसक्तिं कुर्वीतोत्तमवाञ्छया । (मा० वि०, शिवसूत्र २.१० में उदाहृत)

१४० स्पन्दकारिका
दिव्य योगभूमिकाओं की अध्यक्षा दिव्यशक्तियाँ होती हैं। ये गम्भीर साधना में निरत योगियों
को पथभ्रष्ट करने के लिये प्रतिक्षण उद्यत रहती हैं।
भगवान् पतञ्जलि का मत भी बिल्कुल यही है। उनका कथन है कि ये दिव्यशक्तियां
ऋतम्भरा प्रज्ञा से युक्त योगी की सत्त्वशुद्धि को देखकर उसको शतशः सांसारिक सुखभोगों
के प्रलोभनों में फँसाने का प्रयत्न करने लगती हैं। वे उसको बार-बार प्रेरणा देती
रहती हैं :—
“हे आयुष्मन्, आपने अपने सद्गुणों से अमुक दिव्य भोगों का अर्जन किया है। ये
सुन्दरता और सौरभ-संभार को बिखेरने वाली सुरबालायें आपके दर्शन को तरस रही हैं।
आपके अंग दिव्य आभा से झलक रहे हैं। ये जरा और जीर्णता को दूर रखने वाले अमृत-
रसायन आपके सामने प्रस्तुत हैं। कृपया इनको स्वीकार कीजिये। १अष्ट-सिद्धियां, नव-२
निधियां, कल्पवृक्ष, मन्दाकिनी, नंदनवन, दिव्ययान इत्यादि दिव्यरत्नों के संभार आपके कृपा
कटाक्ष की प्रतीक्षा कर रहे है, इत्यादि।”
साधक कहीं असावधान बनकर एक बार इन प्रलोभनों की मृगमरीचिका में भटक गया
कि उसकी आत्मा का ३घात हो गया। अतः सिद्ध गुरुओं ने स्वरूप-लाभ को प्राप्त करने के
इच्छुक व्यक्तियों को सचेत करने के अभिप्राय से बार बार इस उपदेश को दोहराया है कि
जिस महान् धैर्यशाली व्यक्ति के स्थिर मन में अपने ४ज्ञेयविषय अर्थात् स्पन्दात्मक-स्वभाव को
छोड़कर किसी दूसरे कनक-कामिनी जैसे अस्थायी प्रलोभन का विचार टिकने नहीं पाता है,
वह चाहे किसी भी अवस्था में ही क्यों न पड़ा हो, अपने लक्ष्य से विचलित नहीं
होता है ॥४२॥
[ प्रथमाभास ]
अगले सूत्र में स्पष्ट शब्दों में यह उद्घोषणा की जा रही है कि जो योगी स्वयं सामने
आती हुई मितसिद्धियों के प्रलोभनों को ठुकरा कर केवल विश्वात्मभाव को प्राप्त करने
के लिये तत्पर रहते हों, उनके लिये महान् रहस्य के अवरुद्ध कपाट स्वयं ही खुल
जाते हैं:—
दिदृक्षयेव सर्वार्थान् यदा व्याप्यावतिष्ठते ।
तदा किं बहुनोक्तेन स्वयमेवावभोत्स्यते५ ॥४३॥
१. आठ सिद्धियां—अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व ।
२. नव निधियां—पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील, खर्व ।
३. प्रसह्य चञ्चलीत्येव योगिनामपि यन्मनः । (स्व० तं०, ४.३११)
४. यस्य ज्ञेयमयो भावः स्थिरः पूर्णः समन्ततः ।
मनो न चलते तस्य सर्वावस्थागतस्य तु ॥ (तत्रैव, ४.३१२)
५. लुट् लकार का प्रथम भविष्यत् काल को द्योतित करता है।

सूत्र—जब योगी प्रत्येक भाव में केवल और केवल स्पन्दात्मक स्वरूप को निभालने का

प्रथमाभास १४१
दिदृक्षा द्रष्टुमिच्छा, तदवस्थास्थ इव सर्वान् भावान् यदा व्याप्यावतिष्ठते, तदा
किं बहुना उक्तेन, स्वयमेव तत्त्वस्वभावम् अवभोत्स्यते ज्ञास्यति ॥४३॥
अनुवाद
सूत्र—जब योगी प्रत्येक भाव में केवल और केवल स्पन्दात्मक स्वरूप को निभालने का
अटल संकल्प धारण करके, उनमें स्वरूपतः व्याप्त होकर अवस्थित रहता है तब वह स्वयं ही
उस तत्त्व का साक्षात्कार करने में अवश्य सफल हो जाता है। इसमें बात-बढ़ाव करना
बेकार है ॥४३॥
वृत्ति—देखने की तीव्र इच्छा को ‘दिदृक्षा’ कहते हैं। दिदृक्षा की अवस्था में वर्तमान
होकर, जब योगी सारे भावों में स्वरूपतः व्याप्त होकर अवस्थित रहता है तब स्वयं ही उस
स्वभावभूत स्पन्द तत्त्व की अनुभूति प्राप्त कर लेता है इसमें अधिक बतियाने का कोई प्रयोजन
नहीं है ॥४३॥
विवरण
१किसी भी भाव का साक्षात्कार करने के समय दो प्रकार के आभास कार्यनिरत होते
हैं। एक वह जो कि इन्द्रिय और भाव का संयोग होने के प्राथमिक क्षण का ‘विकल्पहीन
आभास’ होता है और दूसरा वह जो कि दूसरे क्षण पर उसी भाव के साथ सम्बन्धित विशेष-
ताओं को स्पष्टरूप में परिलक्षित कराने वाला ‘सविकल्प-आभास’ होता है। इनमें से पहला
आभास इतना स्वरूप संकुचित होता है कि इसकी बिजली की जैसी तीव्रतम कौंध में, उस भाव
में सामान्यरूप में परिनिष्ठित स्वरूपसत्ता के अतिरिक्त कोई भी अन्य जाति, गुण, क्रिया और
यदृच्छात्मक विशेषता परिलक्षित नहीं होती है। इस आभास को शास्त्रीय शब्दों में ‘प्रथमाभास’,
‘स्वरूपाभास’, ‘निर्विकल्पाभास’ अथवा ‘स्वलक्षणाभास’ इत्यादि कहते हैं। दूसरा आभास
अनेक आभासों के मिश्रण के रूप वाला और स्थूल अभिलाप के द्वारा वाच्य होता है। उदा-
हरणार्थ प्रथमाभास पर ‘घट’ नामक भाव का साक्षात्कार, ‘घट’ इस शब्द के द्वारा वाच्य
और गोलाई, ललाई इत्यादि अनेक विकल्पों से युक्त घट के रूप में नहीं, अपितु सामान्य-
प्रकाशात्मकता के रूप में होता है। दूसरे क्षण पर अर्थात् प्रथमाभास के ठीक अनन्तरवर्ती
सविकल्पाभास पर ही इन सारे आभासों की मिश्रणा से, उसका साक्षात्कार, विशिष्ट नाम-
रूपात्मक ‘घट’ के रूप में होता है। ऐसी ही संवेदनात्मक आभास प्रक्रिया के द्वारा
घटाभास, पटाभास, सुखाभास, दुःखाभास इत्यादि अनन्त प्रकार के विकल्परूप (इसीलिये
भेदपूर्ण) आभासों के वैचित्र्य की सर्जना हो जाती है; इन्हीं को प्रमेय जगत् कहते हैं।
संक्षेप में इस प्रकार कहना ठीक है कि प्रथमाभास की भूमिका पर सारे भाव सामान्य
स्पन्दरूप अथवा चित्-रूप ही हैं। अतः उनकी संवेदना भी विशुद्ध अहं-रूप है। सविकल्प
आभास की भूमिका पर सारे भाव एक दूसरे से स्वरूपतः, देशतः, कालतः और आकारतः
भिन्न होने के कारण विकल्परूप हैं। अतः उनका संवेदन भी ‘इदं-रूप’ है।
१. यहाँ पर शैव दर्शन की प्रसिद्ध आभास प्रक्रिया का संकेतमात्र दिया जा रहा है। विशेष
जानकारी के लिये ‘ईश्वरप्रत्यभिज्ञा’ का ज्ञानाधिकार द्रष्टव्य है।

१४२ स्पन्दकारिका
संसार की प्रत्येक अर्थक्रिया सविकल्प-आभास पर ही चल सकती है क्योंकि इसके लिये
भावों में भिन्नता का होना आवश्यक है। प्रस्तुत प्रकरण के साथ सम्बन्धित मितसिद्धियों का
प्रदर्शन भी बाह्य-अर्थक्रिया होने के कारण सविकल्पक-आभास ही है अतः यह संसारभाव ही है,
शिभाव नहीं।
प्रथमाभास पर यद्यपि संसार के अणु-अणु में भी स्वरूप की अभिव्यक्ति प्रति समय
होती रहती है तथापि वह साधारण इन्द्रियबोध के द्वारा गम्य नहीं है। योगियों में अदृश्य
प्रेरणा से अतीन्द्रियबोध अथवा प्रातिभ-ज्ञान विकसित हुआ होता है। अतः वे भावों के प्रथमा-
भास पर ही स्वरूप का साक्षात्कार करने में सक्षम होते हैं। फलतः वे प्रतिसमय प्रथमाभास
पर ही अवस्थित रहने के कारण स्वरूप की चतुर्दिक् व्यापकता का अनुभव करते रहते हैं।
प्रथमाभास पर अवस्थित रहकर प्रत्येक भाव में व्याप्त स्वरूप का साक्षात्कार करने की तीव्र
इच्छा को ही सूत्र में 'दिदृक्षा' का नाम दिया गया है। यही वह पूर्वोक्त संकल्प-शक्ति है
जो साधक को स्वयं ही शाक्त-भूमिका पर पहुँचा देती है।
इस सम्बन्ध में कई मित्रों को यह आपत्ति है कि यदि योगी सदा निर्विकल्प आभास
पर ही अवस्थित रहते हैं तो वे संसार का आदान-प्रदान किस प्रकार कर सकते हैं ? संसार
में दिखाई देनेवाले भाववैचित्र्य की अनुभूति उनमें रहती ही नहीं होगी। अतः वे संवेदनाहीन
ठूंठ जैसे पड़े रहते होंगे।
इस शंका का समाधान पाने के लिये यह समझना आवश्यक है कि प्रथमाभास पर
अवस्थित रहने का कदापि यह अर्थ नहीं कि योगियों को व्यक्त नामरूपात्मक जगत् का भाव-
वैचित्र्य दिखता ही नहीं है। वे अपने प्रातिभ-ज्ञान के द्वारा बाह्य प्रकृति के भाववैचित्र्य का
इतना सूक्ष्म और गम्भीर पर्यवेक्षण कर सकते हैं जितना कि साधारण रूप में कुशाग्रबुद्धि
समझा जानेवाला पुरुष भी नहीं कर सकता है। बात केवल इतनी है कि वे लोग भाववैचित्र्य
के जिस जिस पक्ष का साक्षात्कार करते हैं वह उन्हें आत्मरूप का विकासमात्र ही प्रतीत होता
है। फलतः वे किसी भी अवस्था में अखण्ड स्वरूपभावना से गिरकर भेदभावना के पचड़े का
शिकार नहीं बन पाते हैं। प्रथमाभास पर अवस्थित रहने का यही अभिप्राय है ॥४३॥
[ अनुभूति का उपाय ]
अगले सूत्र में प्रबुद्ध योगियों को प्रत्येक भाव में स्वरूप की व्यापकता की अनुभूति
प्राप्त कर सकने का उपाय समझाया जा रहा है :-
प्रबुद्धः सर्वदा तिष्ठेज्ज्ञानेनालोच्य गोचरम् ।
एकत्रारोपयेत् सर्वं ततोऽन्येन न पीड्यते ॥४४॥
प्रबुद्धोऽसंकुचितशक्तिः सर्वकालं तिष्ठेत्, ज्ञानेनालोच्य गोचरम्-ज्ञेयं परिच्छिद्य ।
एवमेकत्र तत्त्वसद्भावे विद्यात्मके आरोपयेत् सर्वम् । ततोऽन्येन वक्ष्यमाणेन कलासमूहेन
नपीड्यते ॥४४॥

अनुभात का उपाय · १४३
अनुवाद
सूत्र—(योगी को) प्रत्येक अनुभवदशा में अपने संवेदन के द्वारा प्रत्येक ज्ञेय-विषय का
विश्लेषण करते-करते (उसमें अनुस्यूत) स्पन्दतत्त्व का निभालन करते रहना चाहिये । इस
विधि से सारे प्रमेयवर्ग को एक ही तत्त्व में लय करना चाहिये । ऐसा करने से दूसरे के द्वारा
पीड़ा नहीं पहुँचाई जा सकती है ॥४४॥
वृत्ति—(योगी) विशुद्ध संवेदन के द्वारा प्रत्येक ज्ञेय विषय का विश्लेषण करके,
१प्रतिसमय प्रबुद्ध अर्थात् स्वरूपविकास की अवस्था में अवस्थित रहे। इस प्रकार (भावना के
बल से) प्रत्येक विषय को एक ही तत्त्व के सद्भाव पर अर्थात् शुद्ध-विद्यात्मक स्पन्दसत्ता पर
चढ़ाये अर्थात् दोनों को अभिन्न बनाये। ऐसा करने से उसको दूसरे अर्थात् आगे कहे जानेवाले
कलासमूह के द्वारा पीड़ा नहीं पहुँचाई जा सकती है ॥४४॥
विवरण
प्रस्तुत सूत्र में 'प्रबुद्धः' और 'सर्वदा' इन दो शब्दों की पृष्ठभूमि में विशेष अभिप्राय
है । उनको समझना अतीव आवश्यक है, क्योंकि तभी सूत्र का अर्थ अच्छी प्रकार हृदयङ्गम
हो सकता है ।
'प्रबुद्धः' शब्द से यहाँ पर ऐसे सावधान और जागरूक योगी का अभिप्राय है जिसकी
दिव्यदृष्टि किसी भी ज्ञेय विषय का साक्षात्कार करने के समय, उसके वास्तविक स्वरूपभूत
स्पन्दतत्त्व को पहचानने में २पटु हो । साथ ही वह ऐसा प्रमाता हो जिसको अपने स्वातन्त्र्य
की असीमता का अनुभव ३हुआ हो ।
'सर्वदा' शब्द से किसी भी ज्ञेयविषय की साक्षात्कारकालीन तीन कोटियों का अभि-
प्राय है : किसी भी ज्ञेयविषय के साक्षात्कार को तीन कोटियां होती हैं जिनको पारिभाषिक
शब्दों में आदिकोटि, मध्यकोटि और अन्तकोटि कहते हैं । इनको दूसरे शब्दों में 'बाह्य
इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण किये जाने से पहले का तद्विषयक इच्छाकाल', 'इन्द्रियों के द्वारा बाह्य
स्थूल रूप में ग्रहण काल' और ग्रहण किये जाने के उपरान्त फिर भी संवेदन में 'विश्रान्तिकाल'
कहते हैं। आदिकोटि और अन्तकोटि पर प्रत्येक ज्ञेयविषय अहंविमर्शात्मक प्रमातृभाव के साथ
तादात्म्यरूप में अवस्थित रहता है । मध्यकोटि अर्थात् बाह्य इन्द्रियों के द्वारा स्थूलरूप में
ग्रहण किये जाने के समय पर ही वह, मायाशक्ति रूप स्वातन्त्र्य के द्वारा, अहंरूपता से अलग
होकर 'इदं' के द्वारा वाच्य, स्थूल पाञ्चभौतिक रूप में स्थिति प्राप्त कर लेता है। शब्द,
स्पर्श आदि विषयों के इसी रूप को 'संसार-भाव' कहा जाता है क्योंकि यही रूप परिवर्तन-
शील होता है ।
१. यहाँ पर 'प्रतिसमय' शब्द से ज्ञेयविषय की आदिकोटि, मध्यकोटि और अन्तकोटि—
इन तीन अनुभवदशाओं का अभिप्राय है ।
२. अनिमीलितसम्यग्ज्ञानदृष्टिः जाग्रदेव । (स्प० का० वि०, ४. १४)
३. असंकुचितस्वातन्त्र्यशक्तिः । (शिवसूत्र, २. ९ की ६५वीं टिप्पणी)

१४४ स्पन्दकारिका
साधारण रूप में संसारी 'पशु' ज्ञेयविषयों के १ दकोटि और अन्तकोटिवाले रूप से
परिचित नहीं होते हैं, क्योंकि उनको स्वरूप-परिचय ही नहीं होता है। ऊपर से वे उनके
मध्यकोटिवाले स्थूल एवं परिवर्तनशील रूप को ही उनका वास्तविक रूप समझ कर प्रमाद
में पड़े रहते हैं। यही एक महती विडम्बना है। अतः सूत्रकार ने उपरिनिर्दिष्ट 'प्रबुद्धः'
और 'सर्वदा' शब्दों का प्रयोग करके सम्यक् ज्ञानदृष्टि से युक्त योगियों को, साक्षात्कार
की तीनों कोटियों पर ज्ञेयविषयों के वास्तविक स्वरूप को ही दृष्टि में रखने का उपदेश
दिया है।
इसके अतिरिक्त सूत्र में उस उपाय को भी समझाया गया है जिसको अपनाने से
योगीजन प्रत्येक प्रकार की अनुभवदशा में केवल स्वरूपाभास पर ही अवस्थित रहने की
क्षमता प्राप्त कर लेते हैं। वह उपाय है—'अपने सद्दिमर्श के द्वारा प्रत्येक ज्ञेयविषय का
स्वरूपविश्लेषण करके उसके वास्तविक रूप को पहचानना'। उदाहरण के तौर पर यदि 'घट'
का स्वरूपविश्लेषण किया जाये, तो यह समझने में देर नहीं लगती कि स्थूल आकार, ऊँचाई,
गोलाई, ललाई इत्यादि इसका वास्तविक स्वरूप नहीं बन सकते हैं, क्योंकि ये सारे कल्पित,
परिवर्तनशील और नश्वर हैं। फलतः इन सबों को काटकर शेष जो कुछ बचता है, वह
इसका संवेदनात्मक रूप है जो कि 'चित्कला की अहंविमर्शमयी स्पन्दना के अतिरिक्त और
कुछ नहीं है। इसी प्रकार, स्वरूप-विश्लेषणात्मक पद्धति का अभ्यास करनेवाले योगी को
किसी समय स्वयं ही यह अनुभूति हो जाती है कि सारा विश्व वास्तव में स्वरूपस्पन्दना
ही है।
भगवान् २आशुतोष ने इसी सिद्धान्त को अपनी सूत्रात्मक भाषा में इस प्रकार
समझाया है—
"सावधान योगी, प्रत्येक अनुभवदशा में अन्यथा उपपत्तिरूप अज्ञानात्मक ज्ञान का
अन्न खाते रहते हैं।" इसका भाव यह कि योगी लोग प्रत्येक भाव पर चढ़ी हुई, तथाकथित
प्रमेयता की कालिमा को, स्वरूप-विश्लेषणात्मक अनुसन्धान की मसकली से घिस-घिस कर,
उसके वास्तविक निर्मल स्वरूप का साक्षात्कार करके ही दम लेते हैं। फिर उनके लिये
तथाकथित जन्म-मरण अथवा सांसारिक द्वन्द्वात्मकता का कोई भी बखेड़ा ३अवशिष्ट नहीं
रहता है ॥४४॥
१. चिता सिद्धं यत्तु न तदचिदिति वक्तुं समुचितम् ।
तयासिद्धं नाचिन्नचिदपि कदाचित् क्वचिदपि ॥
चितो द्वारैः सिद्धं यदपि च समस्तं तदपि चित् । (भा० प्रथम भाग, ४१२ पृष्ठ)
२. ज्ञानमन्नम् । (शिवसूत्र, २.९)
३. मृत्युञ्च कालञ्च कलाकलापं विकारजालं प्रतिपत्तिसात्म्यम् ।
ऐकात्म्यनानात्म्यवितर्कजातं तदा स सर्वं कवलीकरोति ॥
(अर्धशिखा शिवमन्त्र, १.६ में उदाहृत)

सूत्र—(ज्ञानी लोगों ने) शब्दराशि से उद्भूत शक्तिवर्ग की वश्यता में पड़े हुए

ब्राह्मी आदि शक्तियाँ १४५
[ ब्राह्मी आदि शक्तियाँ ]
पूर्वसूत्र में कहा गया कि जागरूक योगियों को 'दूसरा' पीड़ा नहीं पहुँचा सकता है।
अतः अगले सूत्र में इसी रहस्य का उद्घाटन किया जा रहा है कि पीड़ा पहुँचानेवाला वह
दूसरा कौन है और वह किस प्रकार पीड़ा पहुँचाता है ? :-
शब्दराशिसमुत्थस्य शक्तिवर्गस्य भोग्यताम् ।
कलाविलुप्तविभवो गतः सन् स पशुः स्मृतः ॥४५॥
शब्दराशिरकारादिक्षकारान्तः तत्समुद्भूतस्य कादिवर्गात्मकस्य ब्राह्म्यादि-
शक्तिसमूहस्य; भोग्यतां गतः पुरुषो, ब्राह्म्यादीनां कलाभिः ककाराद्यक्षरैर्विलुप्तविभवः
स्वस्वभावात् प्रच्यवितः पशुरुच्यते ॥४५॥
अनुवाद
सूत्र—(ज्ञानी लोगों ने) शब्दराशि से उद्भूत शक्तिवर्ग की वश्यता में पड़े हुए
(स्वतन्त्र) पतिप्रमाता को ही पशुप्रमाता का नाम दिया है। (उसके वश्यता में पड़ने का
कारण यह है कि) कला समूह ने उसके असीम वैभव (स्वातन्त्र्य) को पूर्णतया नष्ट-भ्रष्ट कर
दिया है ॥४५॥
वृत्ति—'अकार' से लेकर 'क्षकार' तक के वर्णसमुदाय को शब्दराशि कहते हैं।
पुरुष (स्वतन्त्र पतिप्रमाता) उसी शब्दराशि से उद्भूत और 'कवर्ग' इत्यादि वर्गों का रूप
धारण करनेवाली ब्राह्मी इत्यादि (पशु) शक्तियों के समुदाय का वशवर्ती बना है। इस
अवस्था में उसको 'पशु' कहते हैं, क्योंकि इन्हीं ब्राह्मी इत्यादि शक्तियों के साथ सम्बन्धित
कलाओं ने अर्थात् 'ककार' इत्यादि स्थूल अक्षर समुदाय ने उसके विभव को नष्ट-भ्रष्ट किया
है अर्थात् उसको स्वभाव से च्युत किया है ॥४५॥
विवरण
तांत्रिक शैवदर्शन का यह एक प्रसिद्ध सिद्धान्त है कि पतिप्रमाता की अभिन्न एवं
स्पन्दमयी विमर्शशक्ति (सर्वस्वतन्त्र संवित् शक्ति) ही भेदरूप बहिर्विमर्श की अवस्था में,
वैखरी वाणी के द्वारा उच्चार्यमाण स्थूल वर्णसमुदाय के रूप में प्रसृत होती है। यह वर्ण-
समुदाय वस्तुतः शक्तिरूप होने के कारण पदों, वाक्यों, बड़े-बड़े ग्रन्थों या संसार के सारे
आदान-प्रदानों की बातों का रूप धारण करके विकल्प कल्पनाओं का एक ऐसा अंडबंड जंजाल
उत्पन्न कर देता है कि स्वयं स्वतन्त्र पतिप्रमाता हो उसमें उलझ-पुलझ कर अस्वतन्त्र
पशुप्रमाता बन जाता है। वर्ण चूं कि शक्तिरूप ही हैं, अतः हलचल को जन्म देना उनका
स्वभाव है। वे अच्छी या बुरी जैसी भी हलचल उत्पन्न करें, पशु तदनुसार कार्य करने के
लिये मजबूर होता है। प्रतिक्षण बातों के बतंगड़ बनते रहते हैं, विकल्पों की श्रृंखलायें
उलझती रहती हैं और संसारभाव में पड़ा हुआ पशुवर्ग अशान्ति की भट्ठी में घुसता जा
रहा है।
१ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

सूत्र में इसी सिद्धान्त का उल्लेख सूत्रात्मक शब्दों में किया गया है कि—'कलासमूह

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सूत्र में इसी सिद्धान्त का उल्लेख सूत्रात्मक शब्दों में किया गया है कि—'कलासमूह
ने स्वतन्त्र की स्वतन्त्रता को मटियामेट कर रखा है।' शास्त्रीय शब्दों में 'क' से लेकर 'ह'
तक के सारे सस्वर व्यञ्जनसमुदाय को कलासमूह कहते हैं । फलतः कलासमूह ही वह 'दूसरा'
है जो असावधान पशुप्रमाता को पग-पग पर शतशः बाधाओं में डाल देता है ।
इस सम्बन्ध में, स्थूल शब्दराशि के रूप में, विमर्शशक्ति की बहिर्मुखीन प्रसारप्रक्रिया
की अतीव गम्भीर और दुरूह सैद्धान्तिक विवेचना आगम-शास्त्रों में प्रस्तुत की गई है।
उसका विस्तृत एवं सर्वाङ्गीण वर्णन करना यहाँ पर संभव नहीं है, क्योंकि ऐसा करने से प्रस्तुत
विषय के दुरूह और अरुचिकर बन जाने की आशंका है। अतः पाठकों का ध्यान इस ओर
आकर्षित करने के लिए निम्नलिखित पंक्तियों में कई प्रमुख बातों का आंशिक रूप में उल्लेख
किया जा रहा है ।
'अकार' से लेकर 'क्षकार' तक के वर्णसमुदाय को 'शब्दराशि' कहते हैं । इसका
शास्त्रीय नाम१ 'मातृका' है । वास्तव में मातृकाशक्ति, सारी भेदपूर्ण वाचक और वाच्यरूप
स्थूल शब्दराशि को अपने गर्भ में, अभेदरूप में अर्थात् केवल स्पन्दनामय २विमर्श रूप में,
धारण करनेवाली पराशक्ति ही है। इसका रूप पूर्ण३ अहन्तारूप स्वातन्त्र्य के अतिरिक्त और
कुछ नहीं है । स्वतन्त्र चेतनारूप होने के कारण यह स्वयं 'अ' से 'क्ष' तक के ४स्थूल एवं सूक्ष्म
वर्णसमुदाय के रूप में प्रसृत होकर, अनन्त प्रकार के वाचकों और वाच्यों के विश्व को अव-
भासित कर लेती है । फलतः यह सारे विश्व की माता तो है, परन्तु ऐसी माता है जिसका
परिचय सिद्ध पुरुषों के अतिरिक्त और किसी को नहीं है । न जानी ५हुई माता को ही
'मातृका' कहते हैं ।
दूसरी ओर कई आचार्यों ने इस शब्द को मातृकावाचक के स्थान पर परिवारवाचक
मानकर, इसकी दूसरी प्रकार की व्याख्या भी प्रस्तुत की है—
'अ' से 'क्ष' तक की स्थूल शब्दराशि सर्वस्वतन्त्र चित्शक्ति का ही बहिर्मुखीन प्रसार
है। भेद-पदवी पर उतरते ही यह शब्दराशि आठ वर्गों में बँट जाती है और शक्ति स्वयं भी
१. मालिनीविजयोत्तर तन्त्र में शब्दराशि का 'न' से लेकर 'फ' तक का दूसरा क्रम भी
प्रस्तुत किया गया है। इसको 'मालिनी' कहते हैं। भट्टकल्लट को शायद वर्णमाला का
यह क्रम मान्य नहीं रहा होगा, क्योंकि उसने अपनी वृत्ति में मातृका-क्रम (अ से क्ष तक)
का ही उल्लेख किया है।
२. सा हि भगवती अशेषवाच्यवाचकात्मकजगदभेदचमत्कारात्मकशब्दराशिविमर्शपरमार्था....
........॥ (स्व० तं०, ११.१९९)
३. स्वातन्त्र्यशक्तिरेवास्य सनातनी पूर्णाहन्तारूपा । (स्प० नि०, ३.१३)
४. 'स्थूल' से व्यक्त ध्वनिरूप और 'सूक्ष्म' से अव्यक्त ध्वनिरूप अर्थात् क्रमशः मुख से बोले
जानेवाले और मन में चिन्त्यमान वर्णों का अभिप्राय है। वैखरीरूप और मध्यमारूप होने
के कारण दोनों व्यक्त पदवी पर ही अवस्थित हैं ।
५. अज्ञाता माता मातृका विश्वजननी । (शिवसूत्रविमर्शिनी, १.४)

प्रकाशरूप शिव और विमर्शरूपा शक्ति की सामरस्य अवस्था ही सारे विश्व की

ब्राह्मी आदि शक्तियाँ १४७
ब्राह्मी इत्यादि आठ प्रकार के विकल्परूप शक्ति-परिवार का रूप धारण करके, प्रत्येक वर्ग की
एक एक अधिष्ठात्री देवी के रूप में अवस्थित रहती है। इन शक्तियों का प्रधान काम यह है
कि ये अपने वास्तविक चित्-रूप को चारों ओर से घेरकर उसको आड़ में रखती हैं। परिवार
वही होता है जो अपने जन्मदाता को चारों ओर से घेरकर बैठता हो। १ब्राह्मी इत्यादि
शक्तियों का परिवार भी पशुभूमिका पर अपनी ही जन्मदात्री चित्-शक्ति को घेरकर इस
प्रकार बैठा रहता है कि सर्वसाधारण जीवों को उसका (चित्-शक्ति का) आभास भी नहीं
मिलता है। फलतः आठ शक्तियों के परिवार को 'मातृका' कहते हैं।
मातृका शक्ति के उपर्निर्दिष्ट बहिर्मुखीन प्रसार की प्रक्रिया का लेखा-जोखा भगवान्
शङ्कर ने स्वयं प्रस्तुत किया है।
प्रकाशरूप शिव और विमर्शरूपा शक्ति की सामरस्य अवस्था ही सारे विश्व की
आत्मभूत और आधारभूत सत्ता है। इस सत्ता का स्वरूप केवल महामन्त्ररूप 'अहं-विमर्श' ही
है। 'अ' २अर्थात् अनुत्तर-तत्त्व और 'ह' अर्थात् अनाहत-शक्तितत्त्व की संपुट-दशा अर्थात्
प्रत्याहार-दशा ही 'अहंता' है। उसके गर्भ में सारी शब्दराशि, मोर के अण्डरस के न्याय से,
भेदरहित अहंवरूप में ही अवस्थित है। पारिभाषिक शब्दों में इसी को 'परा वाणी' कहते हैं।
स्थूल वाच्यवाचकमय विश्व का अवभासन करने की ओर उन्मुख होने की दशा में यह अहंवरूपा
विमर्शशक्ति 'इच्छाशक्ति' का रूप धारण कर लेती है। अनन्तर ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति—
इन दो रूपों में अङ्कुरित हो जाती है। इन दो रूपों में अङ्कुरित होते ही वह मायापदवी
पर उतरकर स्वयं उत्पादित अनन्त उपाधियों के रंगों से, अपने को ही रंगकर, न जाने कितने
अतर्क्य रूपों में प्रसूत होती है। इसी बहिर्मुखीन प्रसार प्रक्रिया में वह मातृका का रूप धारण
करके दो ३प्रकार, नव प्रकार और पचास प्रकार के भेदों में विभक्त हो जाती है। इन भेदों
का लेखा-जोखा इस प्रकार है।
दो प्रकार के भेद ४बीज और योनि—'अ' से 'अः' तक के सारे स्वरसमुदाय को 'बीज'
और 'क' से 'क्ष' तक के सारे व्यंजन-समुदाय को 'योनि' कहते हैं। ५बीज से शिवभाग और
१. एतदेव च ब्राह्म्यादिमातृणां मातृत्वं यत्तस्य परिवारभावेन तिष्ठन्ति, विकल्पा हि
चिद्रूपस्य जीवस्य परितो वारणात् परिवार एव, मातृशब्दो ह्यत्र परिवारवाच्येव न
जननीवाचकः। (ई० प्र० भा०, २.१.१)
२. अत एव प्रत्याहारयुक्त्या अनुत्तरानाहताभ्यामेव शिवशक्तिभ्यां गर्भीकृतम्, एतदात्मकमेव
विश्वम्, इति महामन्त्रवीर्यात्मनोऽहंविमर्शस्य तत्त्वम् । (शिवसूत्रवि०, २.७)
३. तत्र तावत्समापन्ना मातृभावं विभिद्यते ।
द्विधा च नवधा चैव पञ्चाशद्धा च मालिनी ॥ (मा० वि०, ३. ९-१०)
४. बीजयोन्यात्मकाद् भेदाद् द्विधा बीजं स्वरा मताः ।
कादिभिश्च स्मृता योनिः........................... ॥ (मा० वि० ३. १०-११)
५. यद् बीजं तत्र शिवः शक्तियोंनिरित्यभिधीयते ॥ (तत्रैव, ३. १२)

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योनि से शक्तिभाग का अभिप्राय है। व्याकरण में वर्णित संस्थानता के नियम से दोनों एक
दूसरे में अन्तर्निहित हैं।
नव¹ प्रकार के भेद
१. अवर्ग 'अ' से 'अः' तक (अमा)
२. कवर्ग 'क' से 'ङ' तक (कामा)
३. चवर्ग 'च' से 'ञ' तक (चार्वङ्गी)
४. टवर्ग 'ट' से 'ण' तक (टङ्कधारिणी)
५. तवर्ग 'त' से 'न' तक (तारा)
६. पवर्ग 'प' से 'म' तक (पार्वती)
७. यवर्ग 'य' से 'व' तक (यक्षिणी)
८. शवर्ग 'श' से 'ह' तक (शारिका)
९. क्षवर्ग 'क्ष' (अनुत्तर एवं अनाहत के संघट्ट को
अभिव्यक्त करनेवाला कूटबीज)
वर्गभेद के विषय में यह बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि वास्तव में वर्णसमाम्नाय
के १ से ८ तक के ही वर्ग मुख्य हैं। 'क्ष' को मात्र औपचारिकता से ही एक पृथक् वर्ग में
रखा गया है, क्योंकि इसका अन्तर्भाव 'क' और 'स' के रूप में पहले ही आठ वर्गों में हो
जाता है। इन दो वर्णों का संयुक्त-रूप होने के कारण यह स्वयं कोई स्वतन्त्र वर्ण नहीं है।
इसको अलग वर्गरूप में रखने का कारण केवल इतना है कि यह अनुत्तर वाचक 'ककार' और
विसर्गवाचक 'सकार' का संयुक्तरूप एक ²कूटबीज है जो कि इस बात को अभिव्यक्त करता
है कि मातृका का प्रत्येक वर्ण, शिवभाग और शक्तिभाग का संघट्टरूप है। यही कारण है कि
इसको शब्दराशि के अन्त में रखा गया है।
पचास प्रकार के भेद—शब्दराशि के ³प्रत्येक अक्षर को अलग-अलग शक्तिरूप मानकर
सोलह स्वरों और चौंतीस व्यंजनों के रूप में पचास भेदों की कल्पना की गई है।
वर्णसमाम्नाय के आठ वर्ग वास्तव में भेदभूमिका पर अवतीर्ण विमर्शशक्ति के ही आठ⁴
रूप हैं। इनके नाम इस प्रकार हैं—'माहेशी, ब्राह्मी, कौमारी, वैष्णवी, ऐन्द्री, याम्या,
चामुण्डा और योगेशी'।
इन आठ शक्तियों को पारिभाषिक शब्दों में 'पीठेश्वरियाँ' कहते हैं। इनकी क्रिया
द्विमुखी है। साधारण पशुओं के लिए ये प्रतिक्षण अधिकाधिक विकल्प-परम्पराओं को जन्म
१. नवधा वर्गभेदतः ॥ (तत्रैव)
२. तदियत्पर्यन्तं यन्मातृकायास्तत्त्वं तदेव ककार-सकारप्रत्याहारेण, अनुत्तरविसर्गसंघट्टसारेण
कूटबीजेन प्रदर्शितमन्ते। (शिवसूत्रवि०, २.७)
३. प्रतिवर्णविभेदेन शतार्धकिरणोज्ज्वला। रणोज्ज्वला। (मा० वि०, ३. ११)
४. तदेव शक्तिभेदेन माहेश्वर्यादि चाष्टकम्। (मा० वि०, ३. १२)