स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
सूत्र—(साधारण जीवभाव के स्तर पर, जिस प्रकार किसी महान् गौरवशाली और
चित्त की एकाग्रता—सोम-सूर्य १०७
में और दौड़ने की क्रिया के द्वारा सारी बहिरंग कर्मेन्द्रियवृत्तियों का ग्रहण करके कर्मे-
न्द्रियों की व्यापकरूपा जाग्रत्-अवस्था में, समान रूप से स्पन्द-तत्त्व की उपलब्धि की ओर
संकेत किया गया है ॥२२॥
[ चित्त की एकाग्रता—सोम-सूर्य ]
यहाँ तक के प्रकरण में जिस प्रकार का वर्णन किया गया है उस प्रकार की अनुभूति
प्राप्त करवाने में, शिष्य पर सद्गुरु की छत्रच्छाया का होना अनिवार्य है । परन्तु जिस समय
कोई साधक स्पन्दात्मक शाक्तभूमिका में वास्तविक प्रवेश कर लेता है उस समय से सत्-गुरु
का साथ भी छूट जाता है । इसका कारण यह कि तुर्यधाम में प्रविष्ट होने के समय तक
विकल्पों का इतना संस्करण हुआ होता है कि गुरुभाव और शिष्यभाव का विकल्प भी समाप्त
हुआ होता है । फलतः यहाँ से आगे का क्षेत्र पार करने में, साधक की, अपनी उद्-बुद्ध
शक्ति ही पथप्रदर्शिका बन जाती है ।
अगले तीन¹ सूत्रों में, ऐसे ही, शाक्त-भूमिका में प्रविष्ट होने के बिल्कुल अभिमुख योगी
की, मानसिक संकल्प-बद्धता, यौगिक प्रक्रिया और सुषुम्नाधाम में अन्तिम लयीभवन का वर्णन
किया जा रहा है—
यामवस्थां समालम्ब्य यदयं मम वक्ष्यति ।
तदवश्यं करिष्येऽहमिति सङ्कल्प्य तिष्ठति ॥२३॥
तामाश्रित्योर्ध्वमार्गेण सोमसूर्यावुभावपि ।
सौषुम्नेऽध्वन्यस्तमितो हित्वा ब्रह्माण्डगोचरम् ॥२४॥
तदा तस्मिन् महाव्योम्नि प्रलीनशशिभास्करे ।
सौषुप्तपदवन्मूढः प्रबुद्धः स्यादनावृतः ॥२५॥
यां स्पन्दस्वरूपरूपामस्थामवलम्ब्य 'यत्किंचित् अयं मम वक्ष्यति, तत् अवश्यं
करिष्यामि' इत्यध्यवसायेन स्पन्दतत्त्वमधिष्ठाय यो वर्तते ॥२३॥
तस्य, तामवस्थामाश्रित्य पुरुषस्य, सोमसूर्यो द्वावपि सौषुम्ने अध्वनि मध्यनाड्य-
भिधाने, अस्तमयं कुरुतः, ब्रह्माण्डगोचरं शरीरमार्गं परित्यज्य योगिनः ॥२४॥
तस्मिन् महाव्योम्नि प्रत्यस्तमित-शशिभास्करे यस्य स्वस्वभावाभिव्यक्तिः न
सम्यक् वृत्ता, स स्वप्नादिना मुह्यमानोऽप्रबुद्धो निरुद्धः स्यात्, प्रबुद्धः पुनरनावृत एव
भवति ॥२५॥
अनुवाद—(सूत्र २३ दृष्टान्त के रूप में)
सूत्र—(साधारण जीवभाव के स्तर पर, जिस प्रकार किसी महान् गौरवशाली और
सहानुभूति से पूर्ण हृदय वाले स्वामी का परिचारक, उसकी कोई आवश्यक आज्ञा सुनने के
पूर्ववर्ती क्षण में—)
१. इन तीनों सूत्रों में से पहला सूत्र दृष्टान्त और दार्शनिक दोनों रूपों में प्रस्तुत हुआ है।
१०८ स्पन्दकारिका
'यह मेरा स्वामी जो कोई भी (साध्य या दुस्साध्य) कार्य करने की आज्ञा देगा, वह
मैं अवश्य उसी यथावत् रूप में करके ही रहूँगा' इस प्रकार संकल्पबद्ध होकर, जिस प्रकार की
मानसिक अवस्था (वृत्तिप्रत्यस्तमित-अवस्था) का आश्रय लेकर अवस्थित रहता है—
(दार्ष्टान्तिक के रूप में)
(उसी प्रकार साधना के क्षेत्र में कोई भी प्रबुद्ध-भूमिका पर अवस्थित साधक)
'यह स्पन्दात्मिका शक्ति मुझे जिस प्रकार की स्वरूपविमर्शात्मक अनुभूति करायेगी,
मैं उस पर आरूढ होकर रहूँगा'—इस प्रकार संकल्पबद्ध होकर जिस प्रकार की मानसिक
अवस्था (वृत्तित्रत्यस्तमित-अवस्था) का आश्रय लेकर अवस्थित रहता है ॥२३॥
उस योगी की उसी अवस्था का आश्रय लेकर, उसके चन्द्रमा और सूर्य (मनस् एवं
प्राण अथवा प्राण एवं अपान) शरीर व्याप्ति को छोड़कर, ऊर्ध्व-मार्ग से सुषुम्नाधाम में पहुँचकर,
उसी में लय हो जाते हैं ॥२४॥
जहाँ पहुँचकर चन्द्रमा और सूर्य दोनों ही लीन हो जाते हैं उस महान् आकाश में
(तुर्यरूप शाक्तभूमिका के अनन्त आकाश में) प्रबुद्ध योगी की चिन्मात्ररूप अनुभूति पर कोई भी
आवरण नहीं रहता है । इसके प्रतिकूल मूढ अर्थात् सम्यक्-अनुभूति से हीन योगी, उस
अवस्था में भी, सुषुप्ति१-पद की जैसी प्रगाढ़ अन्धतमस् की दशा में अचेत पड़ा रहता
है ॥२५॥
वृत्ति—(तुर्यरूप शाक्तभूमिका में प्रविष्ट होने के अभिमुखीभाव के अवसर पर) जो
योगी—'यह मेरी स्वभावभूत स्पन्द-शक्ति 'मुझे जो कुछ भी कहेगी अर्थात् तुर्या भूमिका में
प्रविष्ट होने के लिए जैसा भी पथप्रदर्शन करेगी, मैं अवश्य उसी का अनुसरण करूँगा' इस
प्रकार का अटल संकल्प धारण करके, स्पन्दतत्त्व का स्वरूप ही बनी हुई अवस्था का आश्रय
लेकर, स्पन्दतत्त्व पर अधिष्ठित होकर रहता है—
उस योगी की उसी अवस्था के आधार पर, उसके चन्द्रमा और सूर्य दोनों, शरीर
व्याप्ति को छोड़कर अर्थात् पाञ्चभौतिक काया में अपने बहिर्मुखोन प्रसार को छोड़कर, 'मध्य-
नाड़ी' नामवाले सुषुम्नामार्ग में लय हो जाते हैं । जिसमें चन्द्रमा और सूर्य दोनों का अस्तमन
हो जाता है उस महान् आकाश में अर्थात् विशुद्ध चिन्मात्ररूप तुर्या भूमिका के असीम आकाश
में, ऐसा योगी जिसको पूर्णरूप से स्वभाव की अभिव्यक्ति न हुई हो, साधारण स्वप्न इत्यादि
(लौकिक स्वप्न और सुषुप्ति) के द्वारा मूढभाव (तामसिक मोह) में डाला जाने के कारण,
अप्रबुद्ध बनकर२ निरुद्ध अवस्था में पड़ा रहता है । इसके प्रतिकूल प्रबुद्ध योगी की आत्मचेतना
निरावृत रूप में प्रकाशमान रहती है ॥२३-२५॥
१. यहाँ पर सुषुप्ति-पद से योगी की उस अवस्था का अभिप्राय है जिसमें उसको आत्म-
साक्षात्कार हो जाने पर भी उसकी चेतना नहीं रहती है ।
२. चित्त की ऐसी अवस्था जिसमें वह अपनी मौलिक चितिरूपता का साक्षात्कार करने के
क्षण पर मूढता (मोहग्रस्तता अथवा तमोऽभिभव) के कारण,
चित्तवृत्ति एकाग्रता—सोमसूर्य १०९
विवरण
प्रस्तुत सूत्र (सूत्र २३) में विशेषस्पन्द कही जाने वाली बहिर्मुखीन चित्तवृत्तियों की
निरोधात्मक प्रक्रिया का वर्णन किया गया है। बहिर्मुखीन चित्तवृत्तियों को, अलंग्रासयुक्ति के
द्वारा दिशा बदलकर, अन्तर्मुखीन बनाना ही 'चित्तनिरोध' है और यही शाक्त-उपाय का
आधार-स्तम्भ है। इस विषय में पहले भी पर्याप्त उल्लेख हो चुका है अतः उन बातों को फिर
दोहराने की आवश्यकता नहीं है। यहां पर केवल इस बात को ध्यान में रखने की आवश्यकता
है कि इस सूत्र में, एक कर्मचारी (जो अन्य सारे कर्त्तव्यों को भूलकर प्राणपन से अपने हितैषी
स्वामी की आज्ञा को पूर्ण करने पर उद्यत हो) की क्षणपर्यवसायिनी वृत्तिप्रत्यस्तमितदशा के
दृष्टान्त की पृष्ठभूमि पर, इस बात का स्पष्ट संकेत किया गया है कि, स्पन्दमयी शाक्तभूमिका
में प्रवेश पाने के प्रति उत्सुक योगी को, पहले अपने में प्रखर मानसिक नियन्त्रण की क्षमता
प्राप्त करना नितान्त आवश्यक है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये संकल्प की दृढ़ता,
सद्विचार, अटल श्रद्धा और आत्म-शक्ति की तीव्रता परम अपेक्षित अंग हैं। दृढ़संकल्प वाला
योगी ही, स्वरूप-की उपलब्धि के लिए सांसारिक बाधाओं एवं तथाकथित विभीषिकाओं को
अपनी शक्ति से परास्त कर सकता है, अन्यथा नहीं।
भारतीय जनगण के मानविहारी भगवान् मुरलीमनोहर ने 'चित्तनिरोध' की क्षमता
रखने वाले व्यक्ति को 'स्थित-प्रज्ञ' कहा है। भगवान् का कथन है कि स्थित-प्रज्ञ व्यक्ति सारी
सांसारिक कामनाओं को भूलकर केवल अपने आप में रमणशील होकर रहते हैं। वे न तो
किसी दुःख के आने पर उद्विग्न होते हैं और न सुखभोग की सरिता में ही बह जाते हैं। उन
पर भगवान् का पूर्ण अनुग्रह होता है जिससे वे मायिय द्वन्द्वों के द्वारा प्रभावान्वित होने के
बिना, अपने मार्ग पर आगे बढ़ते जाते हैं।
सूत्र २४ में योग की प्रक्रिया के द्वारा मनस् एवं प्राण अथवा प्राण एवं अपान को सुषुम्ना-
धाम के अन्तर्वर्ती चिदाकाश में लय करने का भाव अभिव्यक्त किया गया है। इस सम्बन्ध
में सूत्र में उल्लिखित कई पारिभाषिक शब्दों पर यथासम्भव प्रकाश डालना आवश्यक है—
सोमसूर्य—भट्टकल्लट ने अपनी वृत्ति में इन दो शब्दों को, व्याख्या करने के बिना,
अस्पष्ट रूप में ही छोड़ रखा है। ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने जान-बूझ कर ही ऐसा
किया होगा। आगमशास्त्रों में भिन्न-भिन्न प्रकार की धारणाओं के आधार पर इस शब्द-युग्म
के भिन्न भिन्न अर्थ लगाये हैं। कहीं इनसे प्रमेयपद और प्रमाणपद का, कहीं प्राण और
अपान का अथवा कहीं शिवकला और जीवकला का अर्थ लिया गया है। शायद भट्टकल्लट
ने भी इसीबात को दृष्टि में रखकर, इस शब्द-युग्म को किसी निश्चित अर्थ की परिधि
में बांधने के बिना साधकों की रुचि पर ही छोड़ दिया है।
आध्यात्मिक विषयों की चर्चा करते समय अत्यन्त सावधानी से काम लेना आवश्यक
है अतः केवल इतना कहा जा सकता है कि प्रस्तुत सूत्र में पूर्व प्रकरण के आधार पर इन दो
शब्दों से 'मनस् एवं प्राण ये ही दो अभिप्राय लेना युक्तिसंगत है। कारण यह कि पूर्ववर्ती
१. चन्द्रसूर्यौ मनःप्राणौ द्वावपि। (स्प० का०, ७६ पृष्ठ)
११०
स्पन्दकारिका
सूत्रों में इस सिद्धान्त की स्थापना की गई है कि सामान्य स्पन्द-शक्ति एक ओर से ज्ञानरूपता
के द्वारा गुणत्रय पर आधारित अन्तःकरण की वृत्तियों (जिनको साधारण रूप में मनस्
या चित्त कहते हैं) और दूसरी ओर क्रियारूपता के द्वारा पाँच स्थूल प्राणों के रूप में,
पाञ्चभौतिक काया में व्याप्त होकर रहती है । कहना न होगा कि अपान स्वयं भी पांच
प्रकार के स्थूल प्राणों में ही अन्तर्भूत हो जाता है । फलतः योगी के लिए, प्राण के साथ मनस्
का भी चिदाकाश में लयीकरण परम आवश्यक है । श्रीयुत क्षेमराज ने अपनी व्याख्या में
इस शब्द-युग्म का अर्थ १ प्राण एवं अपान ही लगाया है ।
सुषुम्ना मार्ग—आगम शास्त्रों में सुषुम्ना नाडी का प्रधान नाम 'मध्यनाडी' रखा
गया है । भट्टकल्लट ने भी अपनी वृत्ति में इसी नाम से इसका उल्लेख किया है । इसके
अतिरिक्त इसको 'ब्रह्मनाडी' भी कहते हैं ।
इस नाडी को 'मध्य' कहे जाने के दो कारण हैं । एक यह कि मूलरूप में यह नाडी
स्वतः संवित्-रूपा ही है और संवित् ही प्रत्येक जड़ अथवा चेतन पदार्थ का 'मध्य' अर्थात्
२अन्तरतम जीवन है । प्रत्येक प्राणी के शरीर में यही नाडी जीवनी शक्ति का मूलस्रोत है ।
पहले भी कहा गया है कि संवित् भगवती ही अवरोहक्रम में सूक्ष्म ३प्राणना का रूप धारण
करके, क्रमशः उत्तरोत्तर स्थूलता को प्राप्त होती हुई, समूचे अस्थिमेदोमय स्थूल शरीरका
और उसमें फैली हुई असंख्य शिराओं के जाल का रूप धारण कर लेती है । ४स्वयं इन
असंख्य नाडियों के जाल के ठीक मध्य में ब्रह्मरन्ध्र से लेकर मूलाधार तक प्रधान प्राणशक्ति-
रूपा सुषुम्नानाडी के रूप से अवस्थित रहती है । शिराजाल के ठीक मध्य में इसका अवस्थित
रहना ही दूसरा कारण है जिसके लिये इसको 'मध्य' की संज्ञा दी गयी है । शिराजाल के
५मध्य में यह ठीक उसीप्रकार ऊपर से नीचे तक अवस्थित रहती है जिस प्रकार पलाश के
पत्ते के ठीक बीचोबीच एक प्रधान शिरा ऊपर से नीचे तक अवस्थित रहती है ।
मध्यनाडी के आकार-प्रकार के विषय में अनुभवी व्यक्तियों का कथन है कि यह नाडी
६मृणाल के तन्तु के समान अत्यन्त सूक्ष्म है । इसके अन्तराल में ७शून्य अवकाश की वर्तमानता
है और उसी को सूत्रकार ने 'महान् व्योम' की संज्ञा के द्वारा अभिव्यक्त किया है । यह अन्त-
१. चन्द्रसूर्यौ अपानः प्राणश्चोभावपि । (स्प० का०, ४२ पृष्ठ)
२. सर्वान्तरतमत्वेन वर्तमानत्वात् ......... संविदेव भगवती मध्यम् । (प्र० हृ०, १७)
३. सा तु मायादशायां .... प्राणशक्तिभूमिं स्वीकृत्य, अवरोहक्रमेण बुद्धिदेहादिभुवम् अधिशयाना
नाडीसहस्रसरणिम् अनुसृता । (प्र० हृ०, १७)
४. तत्रापि च पलाशपर्णमध्यशाखान्यायेन आब्रह्मरन्ध्राद् अधोवक्त्रपर्यन्तं प्राणशक्तिमध्यनाडी-
रूपतया प्राधान्येन स्थिता । (तत्रैव)
५. मध्यनाडी मध्यसंस्था । (वि० भै०, ३५)
६. सूक्ष्मत्वात् मृणालसूत्रतुल्यरूपतया (प्र० हृ०, १७)
मध्यनाड्या मन्तश्चिदात्मकं शून्यमेवास्ति । (तत्रैव)