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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

सूत्र—जिस (स्पन्दात्मक) विमर्श-भूमिका में अर्थात् शङ्कर में यह सारा कार्यरूप

स्पन्द एक मौलिक कृति २५
शक्तियों के संकोच को हटाकर, उनको मौलिक सामान्य-अवस्था पर पहुँचा सके तो स्वरूप-
विकास कहीं दूर नहीं है। यहाँ पर पाठकों को सावधान करने के लिए कई मुख्य शक्तियों के
नाममात्र गिनाये गये हैं। आगे बहुत से स्थानों पर इनके स्वरूप-वर्णन पर यथासम्भव प्रकाश
डाला जायेगा ॥१॥
पूर्व सूत्र में दर्शाया गया कि सामान्य-स्पन्दभूमिका (संवित्) ही सारे कार्यरूप अर्थात्
प्रमेयरूप विश्व के प्रत्येक पदार्थ के रूप में प्रवहमान है। परन्तु इस सम्बन्ध में यह शङ्का
उठती है कि संसार में विचित्र प्रकार के शरीर, इन्द्रिय, भुवन, घट, पट इत्यादि रूपों में
स्वभावों की अनेकाकारता देखने में आती है। ऐसी अवस्था में संसाररूप अनेकत्व का स्वभाव
शिवरूप एकत्व कैसे हो सकता है ? अगले सूत्र में इस शङ्का का समाधान यह कह कर किया
जा रहा है कि वास्तव में प्रमेयरूप अनेकाकारता 'अहं विमर्श' की एकाकारता में अनादिकाल
से अभिन्नरूप में अन्तर्निहित ही है। केवल जो वस्तु विमर्श में है उसी का बाह्य अवभासन
होता है। इस सिद्धान्त के अनुसार उसका (अनेकाकारता का) बाह्य अवभासनमात्र हो जाता
है। नई कोई वस्तु उत्पन्न नहीं होती है। दोनों रूपों में एकाकारता स्वरूपतः अक्षुण्ण
रहती है—
[कर्तृत्व और कार्यत्व]
यत्र स्थितमिदं सर्वं कार्यं यस्माच्च निर्गतम् ।
तस्यानावृतरूपत्वान्न निरोधोऽस्ति कुत्रचित् ॥२॥
कथं पुनः स्वस्वभावस्यैव संसारिणः शिवत्वेन निर्देशः-इति यद्युच्यते, तत्
यत्र स्थितम् इदं जगत्, यस्मात् च उत्पन्नं तस्य संसार्थवस्थायामपि अनाच्छादित-
स्वभावत्वात् न क्वचित् निरोधः, अतः शिवत्वमुच्यते ॥२॥
अनुवाद
सूत्र—जिस (स्पन्दात्मक) विमर्श-भूमिका में अर्थात् शङ्कर में यह सारा कार्यरूप
(प्रमेयरूप) जगत्, अभेदरूप में अवस्थित ही है और जिससे इसका (बहिर्मुखीन) प्रसार हो
जाता है, उस सत्ता के स्वरूप को कोई भी आवरण ढांप नहीं सकता है। अतः उसके स्वतन्त्र
प्रसार में कहीं भी कोई रुकावट नहीं है ॥२॥
वृत्ति—यदि कोई यह पूछे कि जब निजी स्वभाव (शंकर) ही संसारी बनकर आवा-
गमन के चक्कर में पड़ जाता है तो उसको उस रूप में शिव कैसे कहा जा सकता है ? इस
प्रश्न के उत्तर में यह कहा जाता है कि जिस अभेद-भूमिका में यह सारा विश्व (अनादिकाल
से) 'अहं-रूप' में अवस्थित ही है और जिससे इसकी उत्पत्ति अहंरूपता से अलग होकर
इदंरूपता में अवभासित हुई है, उस सत्ता के स्वभाव (अहंविमर्शरूप एकाकारता) पर, संसारी
अवस्था में भी कोई आवरण पड़ा हुआ नहीं है, अतः उसके स्वतन्त्र प्रसार में कोई रुकावट
नहीं पड़ सकती है। यही कारण है कि उसको शिव कहा जाता है ॥२॥

२६ स्पन्दकारिका
विवरण
आन्तर और बाह्य पदार्थों की विमर्शरूपता
शैवशास्त्रों का सिद्धान्त है :—'यदन्तस् तद् बहिः' । इसका अभिप्राय यह है कि
स्पन्दात्मक विमर्शभूमिका में सारे प्रमेयपदार्थों की विद्यमानता उसीप्रकार विमर्शरूप में ही
विद्यमान है जिस प्रकार छोटे से बीज¹ में बड़े-से-बड़े न्यग्रोध वृक्ष की शाखायें, पत्ते, फूल
और फल इत्यादि की कल्पना बीजरूप में ही विद्यमान होती है । चैतन्य में स्वभावतः प्रसार
का रस होने के कारण वही आन्तर कल्पना बाह्य स्थूल नानारूपता में विकसित होती है ।
अतः जो ही अन्दर है वही बाहर है । विषय को सुगम बनाने के लिए पहले इस सिद्धान्त का
परीक्षण जीवभाव के स्तर पर करना ही युक्तियुक्त होगा—
साधारण जीवभाव के स्तर पर भी यही देखा जाता है कि प्रत्येक प्राणी के आन्तर
विमर्श में उसके परिचित प्रमेयभाव विमर्शरूप में ही अवस्थित रहते हैं । अपने-अपने मानसिक
विस्तार के अनुपात से जिस प्राणी का जितना विमर्श होता है उतना ही उसके संसार का
विस्तार होता है । परन्तु इतना तो निश्चित है कि जो ही बातें विमर्श में विद्यमान होती हैं
उन्हीं का बाह्य अवभासन होता रहता है । उदाहरण के तौर पर—'कुम्हार घड़ा बनाता
हैं'—इस परामर्श का दार्शनिक विश्लेषण करने से कुछ बातों की ओर ध्यान आकर्षित होता
है । पहली यह कि घट एक कार्य है जो किसी चेतन कुम्हार की क्रिया का विषय बना हुआ
है । दूसरी यह कि घट स्वयं विमर्शहीन अथवा जड़ होने के कारण न तो स्वरूप को जानता
है और न अपने से भिन्न और किसी वस्तु को सत्ता प्रदान कर सकता है । तीसरी यह कि
कुम्हार चेतन होने के कारण ही मिट्टी के पिंड को घट का रूप दे सकता है जब कि मिट्टी
स्वयं घट का रूप धारण नहीं कर सकती है । इन बातों के साथ-साथ मन में एक शङ्का भी
उत्पन्न हो जाती है कि घट की रचना करते-करते शराव अथवा शरावों को बनाते-बनाते
प्याले क्यों नहीं बन जाते हैं ।
इस शङ्का का समाधान ढूँढ़ते-ढूँढ़ते अन्ततोगत्वा हमें यह स्वीकार करना पड़ता है
कि कुम्हार के अन्तर्विमर्श में, घट इत्यादि पदार्थों को बाह्य साकारता प्रदान करने से पहले
ही उनकी आकृति, मान, रंग इत्यादि की यथावत् कल्पना विद्यमान होती है । रचना करते
समय केवल इतना होता है कि कुम्हार के अन्तस्² में विद्यमान कल्पना बाह्य साकार रूप में
विकसित हो जाती है और दोनों रूपों में तिल जैसा भी फर्क नहीं पड़ता है ।
यदि कुम्भकार के विमर्श में ये कल्पनायें पहले से ही विद्यमान न होतीं तो वह उनको
बाह्य साकाररूप देने में असफल ही रहता । फलतः घट कुम्हार के आन्तरिक विमर्श के
बाह्य अवभास-मात्र के अतिरिक्त स्वतः कुछ भी नहीं है ।
१. यथा न्यग्रोधबीजस्थः शक्तिरूपो महाद्रुमः ।
तथा हृदयबीजस्थं जगदेतच्चराचरम् ॥ (प० त्रि०, २४) ।
२. तदेवं व्यवहारोऽपि प्रवृद्धेरूढिमाविशन् ।
भान्तमेवान्तरर्थौघमिच्छया भासयेद् बहिः ॥ (ई० प्र०, १, १.६.७)

इस सम्बन्ध में यह बात विचारणीय है कि आन्तर-विमर्श एक थैला जैसा नहीं कि
जिसमें अनन्त पदार्थों की कल्पनायें ¹अखरोट, पिस्ते या बादाम इत्यादि की तरह ठसाठस
भरी हुई होती हैं और फिर वही अलग-अलग रूप में बाहर निकलती रहती हैं। ऐसी कोई
बात समझ में नहीं आती है अपितु कुम्हार जैसे प्रत्येक चेतन प्रमाता के अन्तर्विमर्श में सारे
वाच्य पदार्थ विमर्श के ही रूप में अर्थात् 'अहं' से अभिन्न रूप में ही अवस्थित रहते हैं।
साथ ही विमर्श में ही यह स्वातन्त्र्य होता है कि अपने में अभिन्नरूप में अवस्थित पदार्थों
को भिन्न रूप में साकारता प्रदान कर सकता है।
बाह्यरूप में अवभासित होने के अनन्तर वह कल्पनायें समाप्त नहीं होती हैं अपितु
फिर भी अन्तःचेतना में निलीन होकर अवस्थित² रहती हैं क्योंकि यदि वे समाप्त ही हो
जातीं तो सम्भव था कि कुम्हार एक घट को साकारता प्रदान करने के अनन्तर दूसरे उसी
आकार-प्रकार के घट को बना नहीं सकता।
ठीक इसीप्रकार सर्वोत्कृष्ट शाङ्कर स्तर पर भी उस विश्वस्पन्द में यह सारा
इदंरूप अर्थात् संकुचित प्रमाता, प्रमेय और प्रमाणों से भरा कार्यजगत् अनादिकाल से 'अहं
रूप' एकाकारता में अवस्थित ही है। उसी मौलिक अहं परामर्श में, स्वातन्त्र्य से ही, जो
इदन्ता का परामर्श उदित हो जाता है वही बाह्य-प्रमेयता का विकास कहलाता है।
फलतः आन्तर विमर्शरूप में अवस्थित भाववर्ग को भेदमय प्रमेयता की नानारूपता
में अवभासित करना और अवभासित करने के अनन्तर उनको फिर भी विमर्शात्मक
एकाकारता में निलीन करना ही स्वभाव अथवा स्वातन्त्र्य अथवा आनन्द शक्ति अथवा
उन्मेष-निमेषमय स्पन्द की शाश्वत क्रीडा का चमत्कार है। यदि परमार्थ दृष्टि से देखा जाए
तो यह बात स्पष्ट रूप में समझ में आती है कि वे सारे प्रमेय पदार्थ जो स्फुट³ रूप में
अर्थात् 'इदं' रूप में भासमान हैं, वास्तव में परमार्थ सत्ता के निजी अवयव ही हैं। अतः
स्वरूप में अवस्थित रहते हुए ही, केवल मायाशक्तिरूप स्वातन्त्र्य के द्वारा, उनका उसी
प्रकार भिन्न रूप में जैसे अवभासन हो जाता है, जिस प्रकार घटरूप पदार्थ का अवभासन
मिट्टीरूप सत्ता के अन्तर्गत ही होता है। यदि मिट्टी की सत्ता न हो तो घट की भी सत्ता
नहीं होगी। यदि भाव स्वरूप में अवस्थित न हों तो वे भाव नहीं होंगे।
अनुत्तरतत्त्व और जीव का अन्तर
इस सम्बंध में यह बात विशेष रूप से ध्यान में रखनी आवश्यक है कि बाह्यरूप में
१. एतदुक्तं भवति न प्रसवेकादिवाक्षोटादि तत् तस्मात् निर्गतम्' ।
(स्प० नि०, १० पृष्ठ)
२. स्वामिनश्चात्मसंस्थस्य भावजातस्य भासनम् ॥
अस्त्येव···· ···· ···· ····॥ (ई० प्र०, १-५ १०)
३. वर्तमानावभासानां भावानांमवभासनम् ।
अन्तर्विद्यमानामेव प्रसवे बहिरात्मना ॥

२८ स्पन्दनिरूपणम्
अवभासमान पदार्थ वर्ग अर्थात् कार्य-जगत् स्वतः कोई भिन्न सत्ता नहीं अपितु¹ आन्तरिक
चैतन्यसत्तारूप एकता का बहिर्मुखीन प्रसार ही कार्यता अथवा अनेकाकारता कहलाती है । एक
से हो अनेक बन जाता है परन्तु अनेक में एक भी अन्तर्निहित ही है । अतः यह कहना कि घट,
पट इत्यादि रूप अनेकाकारता का मूल, शिवरूप एकाकार कैसे हो सकता है, सर्वथा अनुचित
है । यही कारण है कि कार्यरूप जगत् को अपने से भिन्नरूप में सत्ता प्रदान करने के अनन्तर
भी शिव, शिव ही है ओर उससे पहले भी वह शिव ही है । कुम्भकार² घट को बाह्य साकार-
रूप देने से पहले भी ओर अनन्तर भी कुम्हार ही है । दोनों³ अवस्थाओं में वास्तविक सत्ता
की एकाकारता ही व्याप्त है ।
अब इस संबन्ध में यह बात विचारणीय है कि साधारण कुम्हार को घड़ा इत्यादि
पदार्थ बनाने के समय विशेष प्रकार के समवायिकारण, असमवायिकारण या उपादानकारण,
निश्चित देश, काल, आकार इत्यादि की परिधि ओर भिन्न-भिन्न आकार-प्रकारों के बनाने की
सक्रमत्ता इत्यादि की अपेक्षा रहती है । क्या अनुत्तर-सत्ता को भी कार्यजगत् बनाने के लिए
ऐसी ही सामग्री की अपेक्षा रहती है ? यदि रहती है तो एक साधारण कुम्हार को ही शिव
मानना पड़ेगा । इस विषय में पारदृश्वा सिद्धों का कथन है कि अनुत्तरतत्त्व और जीव के ज्ञातृत्व
और कर्तृत्व में केवल स्वातन्त्र्य की मात्रा का भेद है । परमेश्वर पूर्ण चिद्रूप होने के कारण अपने
स्पन्दात्मक स्वातन्त्र्य से प्रत्येक कार्य किसी भी प्रकार की कारण-सामग्री और निश्चित क्रम के
बिना, अपने संकल्पमात्र से ही सिद्ध कर सकता है जब कि साधारण जीव को, अंशतः चिद्रूप
और अस्वतन्त्र होने के कारण, कोई भी कार्य करने के समय परमुखापेक्षी बनना पड़ता है ।
श्रीमान्⁴ उत्पलदेव जी का कथन है कि भगवान् चिदात्मा होने के कारण एक योगी की तरह
किसी प्रकार की लौकिक सामग्री के बिना, इच्छामात्र से ही अन्तर विमर्श-रूप में अवस्थित
पदार्थवर्ग को बाह्यरूप में अवभासित करता है । इस अलौकिक क्रियाशक्ति पर कोई लौकिक
प्रतिबन्ध कार्यान्वित नहीं हो सकता है । श्री भट्टनारायण⁵ ने इसी लक्ष्य को हृदय में रखकर
भगवान् को एक ऐसा सर्वोत्कृष्ट कलाकार स्वीकार किया है जिसको अपनी कला का प्रदर्शन
१. एवमात्मन्यसत्कल्पाः प्रकाशस्यैव सन्त्यमी ।
जडाः.................................................॥ (अ० सि० १३)
२. न च कार्यं घटादिकर्तुः कुम्भकारादेः कदाचित् स्वरूपं तिरोदधद् दृष्टम् ।
(स्प० नि०, १० पृष्ठ)
३. प्रकाश एवास्ति स्वात्मना स्वपरात्मभिः । (अ० सि० १३)
४. चिदात्मैव हि देवो न्तःस्थितमिच्छावशाद् बहिः ।
योगीव निरूपादानमर्थजातं प्रकाशयेत् ।।
(ई० प्र० : १.५.७)
५. निरूपादानसंभारमभित्तावेव तन्वते ।
जगच्चित्रं नमस्तस्मै कलाश्लाघ्याय शूलिने ।। (स्त० चिं०, १)

अवस्था भेदों में स्वरूप की एकता २९
करने के लिये, अपने स्वरूप से इतर अन्य किसी आधार इत्यादि की आवश्यकता नहीं पड़ती
है। पारमेश्वरी१ शक्ति चतुर्दिकू स्वतन्त्र होने के कारण कभी क्रम के अनुसार अथवा कभी
क्रमात्मक पराधीनता के बिना ही कार्यनिरत है परन्तु उसका वास्तविक स्वरूप सदा अक्रम
ही है।
चित्-रसमयी तरलता स्वयं अपने में आश्यानता अर्थात् घनता का रूप धारण करती
है और यह आश्यानता ही स्थूल प्रमेयता है। वह जितना जितना उत्तरोत्तर आश्यान होती
जाती है उतनी उतनी जड़ता उभर आती है। इस आश्यानीभवन की क्रिया की अन्तिम सीमा
पृथिवी-तत्त्व है। हमारे गुरु महाराज कभी-कभी मंद मुस्कान में कह डालते हैं कि “संवित् का
स्वातन्त्र्य कितना विस्मयकारी है कि वह, उसी के द्वारा, अपने संविद्भाव से अवरूढ़ होकर
मिट्टी बन गई है।”
शास्त्रकारों ने मन्दबुद्धिवाले शिष्यों को, बाह्य-अवभास की प्रक्रिया को समझाने के
लिये दर्पण-नगर की उपमा दे रखी है। जिसप्रकार२ दर्पण में पड़ा हुआ नगर इत्यादि का
प्रतिबिम्ब दर्पण से पृथक् न होते हुए भी अलग जैसा दिखाई देता है उसी प्रकार चिद्दर्पण
में पड़ा हुआ विश्वरूप प्रतिबिम्ब उससे भिन्न न होकर भी भिन्न जैसा दिखता है। दर्पण
नगर तो एक उपमामात्र है। वास्तव में चिद्दर्पण और साधारण दर्पण में दूर का भी वास्ता
नहीं है। जहाँ साधारण दर्पण प्रतिबिम्ब प्रक्रिया में दर्पण, बिम्ब और प्रतिबिम्ब तीनों
अलग अलग पदार्थ होते हैं वहाँ चिद्दर्पण की प्रतिबिम्बप्रक्रिया में चैतन्य-सत्ता स्वयं ही बिम्ब
प्रतिबिम्ब और दर्पण है। अतः सांसारिक शब्दार्थ-कल्पना की कोई भी अवस्था ऐसी नहीं है
जिसको शिव नहीं कहा जा सकता है।
फलतः३ 'ज्ञानक्रियात्मक चैतन्य' ही प्रत्येक जड़ अथवा अजड़ पदार्थ का स्वभाव है जो
कि प्रत्येक अवस्था में सिद्ध और अनावृतरूप में अवस्थित है। उस विश्वात्मक स्वभाव को
किसी प्रकार की भी विरोधी सत्ता की कल्पना के द्वारा झुठलाया नहीं जा सकता है ॥ २ ॥
१. ............निःशेषशक्तिचक्रक्रमाक्रमाक्रामिणी अतिक्रान्तक्रमाक्रमातिरिक्तारिक्ततदुभया-
त्मतयापि अभिधीयमानापि अनेतद्रूपा अनुत्तरापरा स्वातन्त्र्यशक्तिः काप्यस्ति (शि०
सू० वि०, २० पृष्ठ)
२. स एव भगवान् स्वस्वातन्त्र्यादनतिरिक्तामप्यतिरिक्ततामिव जगद्रूपतां स्वभित्तौ दर्पणनगर-
वत्प्रकाशयन् स्थितः (स्प० नि०, १० पृष्ठ)
दर्पणबिम्बे यद्वन्नगरग्रामादि चित्रमविभागि ।
भाति विभागेनैव च परस्परं दर्पणदपि च ॥
विमलतमपरमभैरवबोधात् तद्वद् विभागशून्यमपि ।
अन्योन्यं च ततोऽपि च विभक्तमाभाति जगदेतत् ॥
(प० सा०, श्लोक १२, १३)
३. चैतन्यमात्मनो रूपं सिद्धं ज्ञानक्रियात्मकम् ।
तस्यानावृतरूपत्वात् शिवत्वं केन वार्यते ।। ( शि० सू० वा०, १.१५ )