शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
तृतीयपटलः । ( ५९ )
टीका-जिस पुरुषको श्रद्धा है उसको निश्चय कर-
के विद्या सिद्ध होती है दूसरेको नहीं होती. इस हेतुसे
साधकको उचित है कि यत्नसे साधन करे ॥ १६ ॥
मूलम्--न भवेत्सङ्गयुक्तानां तथाऽविश्वासि-
नामपि ॥ गुरुपूजाविहीनानां तथा च ब-
हुसंगिनाम् ॥१७॥ मिथ्यावादरतानां च
तथा निष्ठुरभाषिणाम् ॥ गुरुसन्तोषहीना-
नां न सिद्धिः स्यात्कदाचन ॥ १८ ॥
टीका-जिस पुरुषका किसी व्यवहारी मनुष्यसे
अतिसङ्ग है उसको योगविद्या सिद्ध नहीं होती ऐसेही
अविश्वासी और जो गुरुपूजासे हीन हैं और जिनका
बहुत लोगोंसे संग है और वह लोग जो झूठ और
कठोर वचन बोला करते हैं और वह लोग जो गुरुको
प्रसन्न नहीं करते इन लोगोंको, कदापि सिद्धि नहीं
होती ॥ १७ ॥ १८ ॥
मूलम्--फलिष्यतीति विश्वासः सिद्धेः प्रथम-
लक्षणम्॥ द्वितीयं श्रद्धया युक्तं तृतीयं गु-
रुपूजनम्॥१९॥चतुर्थं समताभावं पञ्चमे-
न्द्रियनिग्रहम् ॥ षष्ठं च प्रमिताहारं सप्त-
मं नैव विद्यते ॥ २० ॥
(६०) शिवसंहिता भाषाटीकासमेत ।
टीका-योगसिद्धि होनेका प्रथम लक्षण यह है कि,
उसके सिद्धिमें विश्वास हो दूसरे श्रद्धायुक्त तीसरे गुरु-
पूजारत हो चौथे प्राणीमात्रमें समताभाव रक्खे पांचवें
इन्द्रियोंका निग्रह रहे छठवें परिमित भोजन करै यह छः
लक्षण योगसिद्धिके हैं और सातवाँ नहीं है ॥१९॥२०॥
मूलम्-योगोपदेशं संप्राप्य लब्ध्वा योग
विदं गुरुम् ॥ गुरूपदिष्टविधिना धिया
निश्चित्य साधयेत् ॥ २१ ॥
टीका-योगवेत्ता गुरुसे योग उपदेश लेके जिस
विधिसे गुरु उपदेश करे उस विधिसे बुद्धि निश्चय क
रके साधन करे ॥ २१ ॥
मूलम्-सुशोभने मठे योगी पद्मासनसम-
न्वितः ॥ आसनोपरि संविश्य पवनाभ्या-
समाचरेत् ॥ २२ ॥
टीका-उपद्रवरहित सुन्दर स्वच्छ और उसका सू-
क्ष्म रन्ध्र होय उस मठमें पद्मासनसंयुक्त आसनपर
बैठके योगी पवनका अभ्यास करे ॥ २२ ॥
मूलम्-समकायः प्राञ्जलिंश्च प्रणम्य च
गुरून् सुधीः॥दक्षे वामे च विघ्नेशं क्षेत्रपा-
लांबिकां पुनः ॥ २३ ॥
तृतीयपटलः । ( ६१ )
टीका-समकायः अर्थात् सीधा शरीर करके हाथ
जोडके गुरुको प्रणाम करे और दक्षिण वामभागमें
गणेशजीको प्रणाम करे और क्षेत्रपाल और जगन्माता
देवीको प्रणाम करना उचित है ॥ २३ ॥
मूलम्--ततश्च दक्षाङ्गुष्ठेन निरुद्ध्य पिंगलां
सुधीः ॥ इडया पूरयेद्वायुं यथाशक्त्या तु
कुम्भयेत् ॥ २४ ॥ ततस्त्यक्त्वा पिंगलया
शनैरेव न वेगतः ॥ पुनः पिंगलयाऽऽपूर्य
यथाशक्त्या तु कुम्भयेत्॥२५॥इडया रे-
चयेद्वायुं न वेगेन शनैःशनैः॥इदं योगवि-
धानेन कुर्याद्विंशतिकुम्भकान् ॥ सर्वद्व-
न्द्रविनिर्मुक्तः प्रत्यहं विगतालसः ॥२६॥
टीका-इसके पश्चात् दहिने हाथके अंगुष्ठसे पिंग-
लाको रोककरके इडासे वायुपूरक करे अर्थात् ग्राह्य
करे और यथाशक्ति वायुको रोके फिर पिंगलासे शनैः
शनैः रेचक अर्थात् वायुको बाहरकरे इसीप्रकार फिर
पिंगलासे पूरक करके यथाशक्ति कुम्भक करे फिर इडा
से धीरे धीरे रेचक करे वेगसे कदापि न करे इस योगविधा-
नसे· बीस कुम्भक करे और सर्वद्वन्द्वसे रहित होजाय
अर्थात् एकाकार वृत्ति रक्खे,और नित्य आलस्यको
त्याग करके अभ्यास करे ॥ २४ ॥ २५ ॥ २६ ॥
२. द्वितीय पटल: पिण्ड-ब्रह्माण्ड, नाड़ी-चक्र व प्राण-स्थान
( ६२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता।
मूलम्-प्रातःकाले च मध्याह्ने सूर्यास्ते
चार्द्धरात्रके ॥ कुर्यादेवं चतुर्वारं कालेष्वे-
तेषु कुम्भकान् ॥ २७ ॥
टीका-पूर्वोक्त विधिसे प्रातःकाल और मध्याह्नमें
और सायंकालमें और अर्द्धरात्रिमें इसीतरह चार बार
नित्य कुम्भक करना उचित है ॥ २७ ॥
मूलम्-इत्थं मासत्रयं कुर्यादनालस्योदिने
दिने ॥ ततो नाडीविशुद्धिः स्यादविल-
म्बेन निश्चितम् ॥ २८ ॥
टीका-इसीप्रकार आलस्यको छोडकरके तीन मास
नित्यकरे तो उस पुरुषकी नाडी बहुत शीघ्र शुद्ध
होजाय यह निश्चय है ॥ २८ ॥
मूलम्-यदा तु नाडीशुद्धिः स्याद्योगिन-
स्तत्त्वदर्शिनः ॥ तदा विध्वस्तदोषश्च
भवेदारम्भसम्भवः ॥ २९ ॥
टीका-तत्त्वदर्शी योगीकी जब नाडी शुद्ध होगी
तब सर्व दोषका नाश होगा और आरम्भका सम्भव
होगा ॥ २९ ॥
मूलम्-चिह्नानि योगिनो देहे दृश्यन्ते ना-
डिशुद्धितः ॥ कथ्यन्ते तु समस्तान्यङ्गा-
नि संक्षेपतो मया ॥ ३० ॥
तृतीयपटलः। ( ६३ )
टीका-नाडी शुद्ध होनेपर जो योगीके शरीरमें
चिह्न देखपडतेहैं उन सबको हम संक्षेपसे वर्णन
करते हैं ॥ ३० ॥
मूलम्-समकायःसुगन्धिश्चसुकान्तिःस्वर-
साधकः॥३१॥ आरम्भघटकश्चैव यथा
परिचयस्तदा ॥ निष्पत्तिः सर्वयोगेषु
योगावस्था भवन्ति ताः ॥ ३२ ॥
टीका-जब योगीकी नाडी शुद्ध होगी तब समकाय
होजायगा अर्थात् न स्थूल न कृश न वक्र रहेगा और
शरीरमें सुगंधिसंयुक्त अच्छी कान्ति अर्थात् तेज रहेगा
और वायुस्वरका साधन होजायगा और आरम्भका
लक्षण जान पडेगा और सब योगका ज्ञान होजायगा
इसको योगावस्था कहते हैं ॥ ३१ ॥ ३२ ॥
मूलम्-आरम्भःकथितोऽस्माभिरधुना वा-
युसिद्धये ॥ अपरः कथ्यते पश्चात्सर्वदुः-
खौघनाशनः ॥ ३३ ॥
टीका-अभी जो हमने कहा है सो प्राणवायु सिद्ध
होनेके आरम्भमें यह चिह्न होता है और इसके पीछे
जो सर्व दुःखका नाश होता है सो कहते हैं ॥ ३३ ॥
मूलम्-प्रौढवह्निःसुभोगी च सुखीसर्वाङ्गसु-
(६४) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता।
न्दरः ॥ संपूर्णहृदयो योगी सर्वोत्साहब-
लान्वितः ॥ जायते योगिनोऽवश्यमेत-
त्सर्वं कलेवरे ॥ ३४ ॥
टीका-साधकके शरीरमें जठराग्नि विशेष प्रज्वलित
होगी और सर्व अङ्ग सुन्दर सुखपूर्वक सुन्दर भोजन
करेगा और बलसंयुक्त सर्व उत्साहसे हृदय योगीका
प्रसन्न रहेगा इतने गुण योगीके शरीरमें अवश्य होंगे॥३४
मूलम्-अथ वर्ज्यं प्रवक्ष्यामि योगविघ्नकरं
परम् ॥ येन संसारदुःखाब्धिं तीर्त्वा या-
स्यन्ति योगिनः॥ ३५ ॥
टीका-अब जो योगमें विघ्न हैं उनको हम कहते हैं
जिनको त्यागके यह संसाररूपी जो दुःखका समुद्र है
योगी उसके पार होजाताहै ॥ ३५ ॥
मूलम्-आम्लं रूक्षं तथा तीक्ष्णंलवणंसार्प-
पं कटुम्॥बहुलं भ्रमणं प्रातः स्नानं तैल-
विदाहकम्॥३६॥स्तेयं हिंसां जनद्वेषञ्चा-
हङ्कार मनार्जवम्॥उपवासमसत्यञ्च मोह-
ञ्च प्राणिपीडनम्॥३७॥ स्त्रीसङ्गमग्निसेवां
च बह्वालापं प्रियाप्रियम्॥अतीव भोजनं
योगी त्यजेदेतानि निश्चित ॥ ३८ ॥
तृतीयपटलः । (६५)
टीका-खट्टा रूखा तीक्षण लोन सरसों कडुभा
बहुत भ्रमण करना प्रातःकाल स्नान शरीरमें तेल म-
र्दन करना ॥ ३६ ॥ स्वर्णआदिककी चोरी हिंसा म-
नुष्यसे द्वेष व अहंकार अनार्यव अर्थात् मनुष्यसे प्रेम
न रखना, उपवास, झूठ, ममता, प्राणीको पीडा देना॥३७॥
स्त्रीका सङ्ग, अग्निसेवन, प्रिय, अप्रिय, बहुत बोलना,
बहुत भोजन करना योगीको उचित है कि, यह सब
अवश्य त्यागदे ॥ ३८॥
मूलम्-उपायं च प्रवक्ष्यामि क्षिप्रं योगस्य
सिद्धये ॥ गोपनीयं साधकानां येन सि-
द्धिर्भवेत्खलु ॥ ३९ ॥
टीका-अब हम बहुत शीघ्र योग सिद्ध होनेका उपा-
य कहते हैं इसको गोप्य रखनेसे साधकको योग निश्च-
य सिद्ध होजायगा ॥ ३९ ॥
मूलम्-घृतं क्षीरं च मिष्टान्नं ताम्बूलं चूर्णव-
र्जितम्॥कर्पूरं निष्ठुरं मिष्टं सुमठं सूक्ष्मव-
स्त्रकम् ॥४०॥ सिद्धान्तश्रवणं नित्यं वैरा-
ग्यगृहसेवनम् ॥ नामसङ्कीर्तनं विष्णोः सु-
नादश्रवणं परम् ॥४१॥ धृतिः क्षमा तपः
शौचं ह्रीर्मतिर्गुरुसेवनम् ॥ सदैवतानि परं
योगी नियमेन समाचरेत् ॥ ४२ ॥
( ६६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
टीका-घृत दूध मधुर पदार्थ ताम्बूल कर्पूरवासित
चूर्णरहित, कठोर शब्दरहित मधुर बोलना, सुन्दर सू-
क्ष्मरन्ध्रके स्थानमें रहना, सूक्ष्म वस्त्र अर्थात् महीन और
थोडा वस्त्र धारण करे नित्य सिद्धांत अर्थात् वेदान्त
श्रवण करे और वैराग्यसे गृहमें रहे ईश्वरका स्मरण करे
अच्छा शब्द श्रवण करे धैर्य क्षमा तप शौच लज्जा गुरु-
की सेवा योगी सदैव इसप्रकार नियमसंयुक्त रहे तो
कल्याण होगा ॥ ४० ॥ ४१ ॥ ४२ ॥
मूलम्-अनिलेऽर्कप्रवेशे च भोक्तव्यं योगि-
भिः सदा ॥ वायौ प्रविष्टे शशिनि शयनं
साधकोत्तमैः ॥ ४३ ॥
टीका-जब सूर्यनाडी अर्थात् पिंगलानाडीका
प्रवाह रहे तब योगी सदैव भोजन करे और जब चन्द्र
अर्थात् इडानाडीसे वायुका प्रवाह रहे तब साधकके
प्रति शयन करना उचित है ॥ ४३ ॥
मूलम्-सद्यो भुक्तेऽपि क्षुधिते नाभ्यासः
क्रियते बुधैः ॥ अभ्यासकाले प्रथमं कुर्या-
त्क्षीराज्यभोजनम् ॥ ४४ ॥
टीका-भोजन करके तुरंत उसी समय अथवा जब
क्षुधित होय तब साधक कदापि अभ्यास न करे और
अभ्यास कालमें प्रथम दूध घृत भोजन करे ॥ ४४ ॥
तृतीयपटलः । (६७)
मूलम्-ततोऽभ्यासे स्थिरीभूते न तादृङ्निय-
मग्रहः ॥ ४५ ॥ अभ्यासिना विभोक्तव्यं
स्तोकं स्तोकमनेकधा ॥ पूर्वोक्तकाले
कुर्यात्तु कुम्भकान्प्रतिवासरे ॥ ४६ ॥
टीका-जब अभ्यास स्थिर होजाय तब पूर्वोक्त निय-
मका कुछ प्रयोजन नहीं है ॥ ४५ ॥ और अभ्यासीको
उचित है कि, थोडा थोडा कईबार भोजनकरे और जिस-
प्रकार पहिले कहा है उसीतरह नित्य कुम्भक करे॥४६॥
मूलम्-ततो यथेष्टा शक्तिः स्याद्योगिनो वा-
युधारणे ॥ यथेष्टं धारणाद्वायोः कुम्भकः
सिद्ध्यति ध्रुवम् ॥ केवले कुम्भके सि-
द्धे किं न स्यादिह योगिनः ॥ ४७ ॥
टीका-योगीको वायु धारण करनेकी शक्तिं इच्छा-
के अनुसार होजायगी. जब इच्छानुसार धारणशक्ति
होजायगी तब कुंभक निश्चय सिद्ध होगा और
केवल कुम्भक सिद्ध होनेसे योगी क्या नहीं करसकता
अर्थात् सब सिद्ध करसकता है ॥ ४७ ॥
मूलम्-स्वेदःसंजायते देहे योगिनः प्रथमो-
द्यमे ॥ ४८ ॥ यदा संजायते स्वेदो मर्दनं
( ६८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
कारयेत्सुधीः ॥ अन्यथा विग्रहे धातुर्न-
ष्टो भवति योगिनः ॥ ४९ ॥
टीका-योगीके शरीरमें प्रथम स्वेद अर्थात् पसीना
उत्पन्न होता है जब स्वेद उत्पन्न होय तो उसको शरी-
रमें मर्दन करे अन्यथा अर्थात् मर्दन न करनेसे योगी-
के शरीरका धातु नष्ट होजाता है ॥ ४८ ॥ ४९ ॥
मूलम्-द्वितीये हि भवेत्कम्पो दार्दुरी
मध्यमे मतः ॥ ततोऽधिकतराभ्यासा
द्गगनेचरसाधकः ॥ ५० ॥
टीका-दूसरे भूमिकामें कंप होताहै तीसरेमें दार्दु-
रीवृत्ति होती है अर्थात् आसन उठता है फिर भूमिपर
आयजाता है उससे अधिक अभ्यास होनेसे योगी
गगनमें स्वेच्छाचारी होजाताहै ॥ ५० ॥
मूलम्-योगी पद्मासनस्थोऽपि भुवमुत्सृज्य
वर्तते॥ वायुसिद्धिस्तदा ज्ञेया संसारध्वा-
न्तनाशिनी ॥ ५१ ॥
टीका-योगी पद्मासनस्थ होके पृथिवीको त्यागके
आकाशमें स्थिर रहे तब जाने कि, संसारके अन्धकार
नाश करनेवाली वायु सिद्ध होगई ॥ ५१ ॥
मूलम्-तावत्कालं प्रकुर्वीत योगोक्तनियम-
तृतीयपटलः । ( ६९ )
ग्रहम् ॥ अल्पनिद्रा पुरीषं च स्तोकं मूत्रं
च जायते ॥ ५२ ॥
टीका-उस कालतक योगके हेतु पूर्वोक्त नियम
करना उचित है जबतक वायु न सिद्ध होय और यो-
गीको थोड़ी निद्रा और थोड़ा मलमूत्र होता है ॥ ५२॥
मूलम्-अरोगित्वमदीनत्वं योगिनस्तत्त्वद-
र्शिनः ॥ स्वेदो लाला कृमिश्चैव सर्वथैव न
जायते ॥ ५३ ॥ कफपित्तानिलाश्चैव सा-
धकस्य कलेवरे ॥ तस्मिन्काले साधक-
स्य भोज्येष्वनियमग्रहः ॥ ५४ ॥
टीका-तत्त्वदर्शी योगीको कायिक वा मानसिक
व्यथा उत्पन्न नहीं होती और स्वेद लाला कृमिआदि
उत्पन्न नहीं होते और साधकके शरीरमें कफ पित्त
वातका दोषभी नहीं होता पूर्वोक्त कालतक साधक
भोजन आदिका नियम करे ॥ ५३ ॥ ५४ ॥
मूलम्-अत्यल्पं बहुधा भुक्त्वा योगी न
व्यथते हि सः॥अथाभ्यासवशाद्योगी भू-
चरीं सिद्धिमाप्नुयात् ॥ यथादर्दुरजन्तूनां
गतिः स्यात्पाणिताडनात् ॥ ५५ ॥
टीका-योगीको बहुत थोड़ा या विशेष भोजन क-
(७०) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
रनेसे कष्ट न होगा और योगीको अभ्याससे भूचरी
सिद्धि होजायगी जैसे दर्दुरजन्तु पाणि ताडन करनेसे
पृथ्वीपर उड्डान करताहै उसी प्रकार योगीभी पृथ्वीपर
उड्डान करता है ॥ ५५ ॥
मूलम्-सन्त्यत्र बहवो विघ्ना दारुणा दुर्नि-
वारणाः ॥ तथापि साधयेद्योगी प्राणैः
कंठगतैरपि ॥ ५६ ॥
टीका-इस योगसाधनमें बहुत दारुण विघ्न होते
हैं जिसका निवारण बहुत कठिन है. परन्तु साधकको
उचित है कि, यदि कंठगतभी प्राण होजाँय तोभी
साधन न छोड़े ॥ ५६ ॥
मूलम्-ततो रहस्युपाविष्टः साधकः संयते-
न्द्रियः॥प्रणवं प्रजपेद्दीर्घं विघ्नानां नाशहे-
तवे ॥ ५७ ॥
टीका-साधकको उचित है कि, विघ्नोंके नाशके हेतु
इन्द्रियोंके संयममें अर्थात् उनके कार्यको रोकके विधि-
पूर्वक एकान्तमें बैठके दीर्घमात्रासे अर्थात् स्पष्ट अक्ष-
रके उच्चारणसे प्रणवका जप करे ॥ ५७ ॥
मूलम्-पूर्वार्जितानि कर्माणि प्राणायामेन
निश्चितम् ॥ नाशयेत्साधको धीमानिह
लोकोद्भवानि च ॥ ५८ ॥
तृतीयपटलः । ( ७१ )
टीका-पूर्व्वार्जित कर्म और जो इस जन्ममें किया है
यह दोनोंके फलको बुद्धिमान् साधक प्राणायामसे
निश्चय है कि, नाश करदेता है ॥ ५८ ॥
मूलम्-पूर्व्वार्जितानि पापानि पुण्यानि विवि-
धानि च ॥ नाशयेत्षोडशप्राणायामेन
योगिपुंगवः ॥ ५९ ॥
टीका-श्रेष्ठयोगी पूर्व्वार्जित नानाप्रकारका पाप
और पुण्य केवल सोलह प्राणायामसे नाश कर-
देताहै ॥ ५९ ॥
मूलम्-पापतूलचयानाहोप्रलयेत्प्रलयाग्नि-
ना ॥ ततः पापविनिर्मुक्तः पश्चात्पुण्या-
नि नाशयेत् ॥ ६० ॥
टीका-साधक पाप राशिको तूलके समान प्राणा-
यामरूपी अग्निसे प्रलय करदेताहै अर्थात् जलादेताहै.
इसप्रकारसे मुक्तहोके पश्चात् पुण्यकोभी उसी अग्निमें
नाश करदेताहै ॥ ६० ॥
मूलम्-प्राणायामेन योगीन्द्रो लब्ध्वैश्वर्या-
ष्टकानि वै॥ पापपुण्योदधिं तीर्त्वा त्रैलो-
क्यचरतामियात् ॥६१ ॥
·टीका-योगी प्राणायामके प्रभावसे आठ ऐश्वर्य
( ७२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
जिसको अष्टसिद्धि कहते हैं अर्थात् अणिमा, महिमा,
गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशिता और वशिता
प्राप्त करता है अब इन आठों सिद्धिके लक्षण कहते हैं
योगीका शरीर इच्छामात्रसे परमाणुवत् होजाय उस-
को अणिमा कहते हैं और योगी इच्छापूर्वक प्रकृति-
को अपनेमें करके आकाशवत् स्थूल होजाय उसको
महिमा कहते हैं और अति हलके शरीरका पर्वतके
समान भारी होजाना उसको गरिमा कहते हैं और
बहुत भारी पर्वतके समानको रुईके सदृश होजाना
इसको लघिमा कहते हैं और सर्व पदार्थ इच्छामात्रसे
योगीके समीप होजाय उसको प्राप्ति कहते हैं और
दृश्यादृश्य अर्थात् कभी देख पडे कभी न देखपडे
इसको प्राकाम्य कहते हैं और भूत भविष्य पदार्थको
जन्म मरणकी रचना करनेमें समर्थ होय उसको ईशि-
ता कहते हैं और भूत भविष्य वर्तमान पदार्थको इच्छा
से अपने आधीन करलेना इसको वशित्वसिद्धि कहते
हैं और योगी पाप पुण्यके समुद्रको तरके अपनी इच्छा
पूर्वक त्रैलोक्यमें विचरता है ॥ ६१ ॥
मूलम्--ततोऽभ्यासक्रमेणैव घटिकात्रितयं
भवेत् ॥ येन स्यात्सकलासिद्धिर्योंगिनः
स्वेप्सिता ध्रुवम् ॥ ६२ ॥
तृतीयपटलः । ( ७३ )
टीका-पूर्वोक्त क्रमस प्राणायाम जब तीन घडीतक
स्थिर होजायगा तब योगीको उसके इच्छाके अनुसार
सब सिद्ध होजायगा यह निश्चय है ॥ ६२ ॥
मूलम्-वाक्सिद्धिः कामचारित्वं दूरदृष्टि-
स्तथैव च ॥ दूरश्रुतिः सूक्ष्मदृष्टिः परका-
यप्रवेशनम् ॥६३॥ विण्मूत्रलेपने स्वर्णम-
दृश्यकरणं तथा ॥ भवन्त्येतानि सर्वा-
णि खेचरत्वं च योगिनाम् ॥६४॥
टीका-वाक्यसिद्धी स्वेच्छाचारी दूरदृष्टी दूर शब्द
श्रवण अतिसूक्ष्म दर्शन दूसरेके शरीरमें प्रवेश करने-
की शक्ति होय और योगी अन्यधातुमें अपने मल मूत्र
लेपनमात्रसे स्वर्ण करे और योगीको अदृश्य होजाने
की शक्ति और आकाशमें गमन करनेकी सिद्धि यह
सब योगीको कुम्भक सिद्ध होजानेसे स्वयं सिद्ध हो-
जायगा इसमें संशय नहीं है ॥ ६३ ॥ ६४ ॥
मूलम्-यदा भवेद्घटावस्था पवनाभ्यासने
परा ॥ तदा संसारचक्रेऽस्मिंस्तन्नास्ति
यन्न साधयेत् ॥ ६५ ॥
टीका-जब योगींकी घटावस्था होगी अर्थात् उसमें
( ७४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
योगकी घटना होगी तब यह संसारचक्र योगीको कुछ
असाध्य न रहेगा ॥ ६५ ॥
मूलम्-प्राणापाननादबिंदुजीवात्मपरमात्म
नः ॥ मिलित्वा घटते यस्मात्तस्माद्वै घट
उच्यते ॥ ६६ ॥
टीका-प्राण अपान नाद विन्दु जीव आत्मा और
परमात्मा इनको एकत्र घटना होनेसे इसको घटावस्था
कहते हैं ॥ ६६ ॥
मूलम्-याममात्रं यदा धर्त्तुं समर्थः स्यात्त-
दाद्भुतः ॥ प्रत्याहारस्तदैव स्यान्नांतरा
भवति ध्रुवम् ॥ ६७ ॥
टीका-एक प्रहर मात्र जब वायु धारण करनेकी
सामर्थ्य होगी तब अद्भुत प्रत्याहारकी शक्ति होगी और
साधनसे न होगी निश्चय है ॥ ६७ ॥
मूलम्-यं यं जानाति योगीन्द्रस्तं तमात्मे-
ति भावयेत् ॥ यैरिन्द्रियैर्यद्विधानस्तदि-
न्द्रयजयो भवेत् ॥ ६८ ॥
टीका-योगी जो जो पदार्थ जाने सो सो पदार्थमें
आत्माकाही भावना करे जो इंद्रियसे जिस पदार्थका
बोध होगा उस पदार्थमें वही आत्मभावनासे वह इंद्रिय
तृतीयपटलः । ( ७५ )
जय हो जायगी अर्थात् जैसे नेत्रसे रूपका बोध होताहै
तो जब रूपमें आत्मभावना होगी तब उस भावनासे
चक्षु इन्द्रिय रूपमें कदापि आसक्त न होगी जब वह
आसक्त न भई तब वह इन्द्रिय आपही जय होगई ॥६८॥
मूलम्-याममात्रं यदा पूर्णं भवेदभ्यासयो-
गतः॥एकवारं प्रकुर्वीत तदा योगी च कु-
म्भकम्॥६९॥दण्डाष्टकं यदा वायुर्निश्च-
लो योगिनो भवेत् ॥ स्वसामर्थ्यात्तदांगु-
ष्ठे तिष्ठेद्वातुलवत्सुधीः ॥ ७० ॥
टीका-जब एकवारमें पूर्ण एक प्रहरतक योगीका
अभ्याससे कुम्भक स्थिर रहेगा अर्थात् आठ घडीतक
योगीका वायु निश्चल रहे तब वह अपने सामर्थ्यसे अङ्गु-
ष्ठमात्रके बलसे अचल अबोधवत् खडा रहसक्ता है
अर्थात् यह सामर्थ्य भी योगीको होगी और अपने सा-
मर्थ्यको गोप्य रखनेके हेतु विक्षिप्तकी चेष्टा योगी दिख
लावैगा ॥ ६९ ॥ ७० ॥
मूलम्-ततःपरिचयावस्था योगिनोऽभ्यास-
तो भवेत् ॥यदा वायुश्चंद्रसूर्यं त्यक्त्वा ति-
ष्ठति निश्चलम् ॥ ७१ ॥ वायुः परिचितो
वायुः सुषुम्ना व्योम्नि संचरेत् ॥
( ७६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
टीका-इस अन्तरमें योगीकी अभ्याससे परिचया-
वस्था होगी जब वायु इडा पिङ्गलाको त्यागके निश्चल
स्थिर रहेगा ॥ ७१ ॥ तब परिचित होके सुषुम्नाके र-
न्ध्रसे प्राणवायु आकाशको गमन करेगा ॥
मूलम्-क्रियाशक्तिं गृहीत्वैव चक्रान्भित्त्वा
सुनिश्चितम् ॥ ७२ ॥ यदा परिचयावस्था
भवेदभ्यासयोगतः ॥ त्रिकूटं कर्मणां
योगी तदा पश्यति निश्चितम् ॥ ७३ ॥
टीका-क्रियाशक्तिको ग्रहण करके योगी निश्चय सब
चक्रको वेधेगा ॥७२॥ और जब योग अभ्याससे परिचया
वस्था होगी तब त्रिकूट कर्मोंको योगी निश्चय देखेगा
तात्पर्य यह है कि, जब योगीका पूर्वोक्त अभ्यास सिद्ध
होजायगा तब त्रिकूट अर्थात् आध्यात्मिक आधिभौ-
तिक आधिदैविक मानसिक दुःखको आध्यात्मिक कह-
ते हैं और भूत पिशाचादिसे जो कष्ट होता है उसको
आधिभौतिक कहते हैं और देवता आदिसे जो कर्मानु-
सार कष्ट होताहै उसको आधिदैविक कहते हैं यह
त्रिकूटकर्मोंका ज्ञान योगीको होजाता है ॥ ७३ ॥
मूलम्-ततश्चकर्मकूटानि प्रणवेन विनाश-
येत् ॥ स योगी कर्मभोगाय कायव्यूहं
समाचरेत् ॥ ७४ ॥
तृतीयपटलः । ( ७७ )
टीका-इस कर्मकूटको योगी प्रणवद्वारा नाश कर-
देताहै और यदि पूर्वकृत कर्मफल भोगनेकी इच्छा
करे तो अपने इच्छानुसार इसी जन्ममें इसी शरीरसे
भोगलेगा ॥ ७४ ॥
मूलम्-अस्मिन्कालेमहायोगी पंचधा धा-
रणं चरेत् ॥ येन भूरादिसिद्धिः स्यात्ततो
भूतभयापहा॥७५॥आधारे घटिकाः पंच-
लिंगस्थाने तथैव च ॥ तदूर्ध्वं घटिकाः
पञ्च नाभिहृन्मध्यके तथा ॥७६॥ भ्रूम-
ध्योर्ध्वं तथा पंच घटिका धारयेत्सुधीः ॥
तथा भूरादिना नष्टो योगीन्द्रो न भवे
त्खलु ॥ ७७ ॥
टीका-जिसकालमें महायोगी पञ्चधाधारणा सिद्ध
करलेगा तब यह पञ्चभूत सिद्ध होजायेंगे और इनसे
कोई कष्टका भय नहोगा. अब धारणाका निर्णय करतेहैं
कि, आधारचक्रमें पांचघडी वायु धारणकरे इसी क्रमसे
स्वाधिष्ठान मणिपूर अनाहत विशुद्ध आज्ञाचक्रमें
अर्थात् गुदा लिङ्ग नाभि हृदय कंठ भृकुटीके मध्यमें
ऊपर कहेहुए प्रमाणसे वायु धारणकरेगा तो योगी पञ्च
भूतसे निश्चय नाश न होगा ॥ ७५ ॥ ७६ ॥ ७७ ॥
( ७८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
मूलम्-मेधावी सर्वभूतानां धारणांयः सम-
भ्यसेत् ॥ शतब्रह्ममृतेनापि मृत्युस्त-
स्य न विद्यते ॥ ७८ ॥
टीका-बुद्धिमान् योगी अभ्याससे पञ्चभूतकी धार-
णा करेगा तो यदि एकशत ब्रह्माभी मृत्युको प्राप्त होंगे
तबभी उसकी मृत्यु न होगी ॥ ७८ ॥
मूलम्-ततोऽभ्यासक्रमेणैव निष्पत्तियोगि-
नो भवेत् ॥ अनादिकर्मबीजानि येन ती-
र्त्वाऽमृतं पिबेत् ॥ ७९ ॥
टीका-इस अभ्यासक्रमसे योगीको ज्ञान होता है
और अनादिकर्म बीजको तरके अर्थात् नाश करके
योगी अमृतपान करताहै ॥ ७९ ॥
मूलम्-यदा निष्पत्तिर्भवति समाधेः स्वेन
कर्मणा ॥ जीवन्मुक्तस्य शांतस्य भवेद्धी-
रस्य योगिनः ॥ ८० ॥ यदा निष्पत्तिसं-
पन्नः समाधिःस्वेच्छया भवेत् ॥ ८१ ॥
गृहीत्वा चेतनां वायुः क्रियाशक्तिं च वेग-
वान् ॥ सर्वांश्चक्रान्विजित्वा च ज्ञान-
शक्तौ विलीयते ॥ ८२ ॥