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शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 216 में से

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पृष्ठ 80

( ७६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
टीका-इस अन्तरमें योगीकी अभ्याससे परिचया-
वस्था होगी जब वायु इडा पिङ्गलाको त्यागके निश्चल
स्थिर रहेगा ॥ ७१ ॥ तब परिचित होके सुषुम्नाके र-
न्ध्रसे प्राणवायु आकाशको गमन करेगा ॥
मूलम्-क्रियाशक्तिं गृहीत्वैव चक्रान्भित्त्वा
सुनिश्चितम् ॥ ७२ ॥ यदा परिचयावस्था
भवेदभ्यासयोगतः ॥ त्रिकूटं कर्मणां
योगी तदा पश्यति निश्चितम् ॥ ७३ ॥
टीका-क्रियाशक्तिको ग्रहण करके योगी निश्चय सब
चक्रको वेधेगा ॥७२॥ और जब योग अभ्याससे परिचया
वस्था होगी तब त्रिकूट कर्मोंको योगी निश्चय देखेगा
तात्पर्य यह है कि, जब योगीका पूर्वोक्त अभ्यास सिद्ध
होजायगा तब त्रिकूट अर्थात् आध्यात्मिक आधिभौ-
तिक आधिदैविक मानसिक दुःखको आध्यात्मिक कह-
ते हैं और भूत पिशाचादिसे जो कष्ट होता है उसको
आधिभौतिक कहते हैं और देवता आदिसे जो कर्मानु-
सार कष्ट होताहै उसको आधिदैविक कहते हैं यह
त्रिकूटकर्मोंका ज्ञान योगीको होजाता है ॥ ७३ ॥
मूलम्-ततश्चकर्मकूटानि प्रणवेन विनाश-
येत् ॥ स योगी कर्मभोगाय कायव्यूहं
समाचरेत् ॥ ७४ ॥