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शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

पृष्ठ 64, कुल 216 में से

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पृष्ठ 64

(६०) शिवसंहिता भाषाटीकासमेत ।
टीका-योगसिद्धि होनेका प्रथम लक्षण यह है कि,
उसके सिद्धिमें विश्वास हो दूसरे श्रद्धायुक्त तीसरे गुरु-
पूजारत हो चौथे प्राणीमात्रमें समताभाव रक्खे पांचवें
इन्द्रियोंका निग्रह रहे छठवें परिमित भोजन करै यह छः
लक्षण योगसिद्धिके हैं और सातवाँ नहीं है ॥१९॥२०॥
मूलम्-योगोपदेशं संप्राप्य लब्ध्वा योग
विदं गुरुम् ॥ गुरूपदिष्टविधिना धिया
निश्चित्य साधयेत् ॥ २१ ॥
टीका-योगवेत्ता गुरुसे योग उपदेश लेके जिस
विधिसे गुरु उपदेश करे उस विधिसे बुद्धि निश्चय क
रके साधन करे ॥ २१ ॥
मूलम्-सुशोभने मठे योगी पद्मासनसम-
न्वितः ॥ आसनोपरि संविश्य पवनाभ्या-
समाचरेत् ॥ २२ ॥
टीका-उपद्रवरहित सुन्दर स्वच्छ और उसका सू-
क्ष्म रन्ध्र होय उस मठमें पद्मासनसंयुक्त आसनपर
बैठके योगी पवनका अभ्यास करे ॥ २२ ॥
मूलम्-समकायः प्राञ्जलिंश्च प्रणम्य च
गुरून् सुधीः॥दक्षे वामे च विघ्नेशं क्षेत्रपा-
लांबिकां पुनः ॥ २३ ॥