शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता।
मूलम्-प्रातःकाले च मध्याह्ने सूर्यास्ते
चार्द्धरात्रके ॥ कुर्यादेवं चतुर्वारं कालेष्वे-
तेषु कुम्भकान् ॥ २७ ॥
टीका-पूर्वोक्त विधिसे प्रातःकाल और मध्याह्नमें
और सायंकालमें और अर्द्धरात्रिमें इसीतरह चार बार
नित्य कुम्भक करना उचित है ॥ २७ ॥
मूलम्-इत्थं मासत्रयं कुर्यादनालस्योदिने
दिने ॥ ततो नाडीविशुद्धिः स्यादविल-
म्बेन निश्चितम् ॥ २८ ॥
टीका-इसीप्रकार आलस्यको छोडकरके तीन मास
नित्यकरे तो उस पुरुषकी नाडी बहुत शीघ्र शुद्ध
होजाय यह निश्चय है ॥ २८ ॥
मूलम्-यदा तु नाडीशुद्धिः स्याद्योगिन-
स्तत्त्वदर्शिनः ॥ तदा विध्वस्तदोषश्च
भवेदारम्भसम्भवः ॥ २९ ॥
टीका-तत्त्वदर्शी योगीकी जब नाडी शुद्ध होगी
तब सर्व दोषका नाश होगा और आरम्भका सम्भव
होगा ॥ २९ ॥
मूलम्-चिह्नानि योगिनो देहे दृश्यन्ते ना-
डिशुद्धितः ॥ कथ्यन्ते तु समस्तान्यङ्गा-
नि संक्षेपतो मया ॥ ३० ॥