शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(६४) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता।
न्दरः ॥ संपूर्णहृदयो योगी सर्वोत्साहब-
लान्वितः ॥ जायते योगिनोऽवश्यमेत-
त्सर्वं कलेवरे ॥ ३४ ॥
टीका-साधकके शरीरमें जठराग्नि विशेष प्रज्वलित
होगी और सर्व अङ्ग सुन्दर सुखपूर्वक सुन्दर भोजन
करेगा और बलसंयुक्त सर्व उत्साहसे हृदय योगीका
प्रसन्न रहेगा इतने गुण योगीके शरीरमें अवश्य होंगे॥३४
मूलम्-अथ वर्ज्यं प्रवक्ष्यामि योगविघ्नकरं
परम् ॥ येन संसारदुःखाब्धिं तीर्त्वा या-
स्यन्ति योगिनः॥ ३५ ॥
टीका-अब जो योगमें विघ्न हैं उनको हम कहते हैं
जिनको त्यागके यह संसाररूपी जो दुःखका समुद्र है
योगी उसके पार होजाताहै ॥ ३५ ॥
मूलम्-आम्लं रूक्षं तथा तीक्ष्णंलवणंसार्प-
पं कटुम्॥बहुलं भ्रमणं प्रातः स्नानं तैल-
विदाहकम्॥३६॥स्तेयं हिंसां जनद्वेषञ्चा-
हङ्कार मनार्जवम्॥उपवासमसत्यञ्च मोह-
ञ्च प्राणिपीडनम्॥३७॥ स्त्रीसङ्गमग्निसेवां
च बह्वालापं प्रियाप्रियम्॥अतीव भोजनं
योगी त्यजेदेतानि निश्चित ॥ ३८ ॥