शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयपटलः। ( ६३ )
टीका-नाडी शुद्ध होनेपर जो योगीके शरीरमें
चिह्न देखपडतेहैं उन सबको हम संक्षेपसे वर्णन
करते हैं ॥ ३० ॥
मूलम्-समकायःसुगन्धिश्चसुकान्तिःस्वर-
साधकः॥३१॥ आरम्भघटकश्चैव यथा
परिचयस्तदा ॥ निष्पत्तिः सर्वयोगेषु
योगावस्था भवन्ति ताः ॥ ३२ ॥
टीका-जब योगीकी नाडी शुद्ध होगी तब समकाय
होजायगा अर्थात् न स्थूल न कृश न वक्र रहेगा और
शरीरमें सुगंधिसंयुक्त अच्छी कान्ति अर्थात् तेज रहेगा
और वायुस्वरका साधन होजायगा और आरम्भका
लक्षण जान पडेगा और सब योगका ज्ञान होजायगा
इसको योगावस्था कहते हैं ॥ ३१ ॥ ३२ ॥
मूलम्-आरम्भःकथितोऽस्माभिरधुना वा-
युसिद्धये ॥ अपरः कथ्यते पश्चात्सर्वदुः-
खौघनाशनः ॥ ३३ ॥
टीका-अभी जो हमने कहा है सो प्राणवायु सिद्ध
होनेके आरम्भमें यह चिह्न होता है और इसके पीछे
जो सर्व दुःखका नाश होता है सो कहते हैं ॥ ३३ ॥
मूलम्-प्रौढवह्निःसुभोगी च सुखीसर्वाङ्गसु-