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शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 216 में से

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पृष्ठ 74

(७०) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
रनेसे कष्ट न होगा और योगीको अभ्याससे भूचरी
सिद्धि होजायगी जैसे दर्दुरजन्तु पाणि ताडन करनेसे
पृथ्वीपर उड्डान करताहै उसी प्रकार योगीभी पृथ्वीपर
उड्डान करता है ॥ ५५ ॥
मूलम्-सन्त्यत्र बहवो विघ्ना दारुणा दुर्नि-
वारणाः ॥ तथापि साधयेद्योगी प्राणैः
कंठगतैरपि ॥ ५६ ॥
टीका-इस योगसाधनमें बहुत दारुण विघ्न होते
हैं जिसका निवारण बहुत कठिन है. परन्तु साधकको
उचित है कि, यदि कंठगतभी प्राण होजाँय तोभी
साधन न छोड़े ॥ ५६ ॥
मूलम्-ततो रहस्युपाविष्टः साधकः संयते-
न्द्रियः॥प्रणवं प्रजपेद्दीर्घं विघ्नानां नाशहे-
तवे ॥ ५७ ॥
टीका-साधकको उचित है कि, विघ्नोंके नाशके हेतु
इन्द्रियोंके संयममें अर्थात् उनके कार्यको रोकके विधि-
पूर्वक एकान्तमें बैठके दीर्घमात्रासे अर्थात् स्पष्ट अक्ष-
रके उच्चारणसे प्रणवका जप करे ॥ ५७ ॥
मूलम्-पूर्वार्जितानि कर्माणि प्राणायामेन
निश्चितम् ॥ नाशयेत्साधको धीमानिह
लोकोद्भवानि च ॥ ५८ ॥