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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

एकादशोऽध्यायः ] धातुशोधनमारणकल्पना 183

एकादशोऽध्यायः ] धातुशोधनमारणकल्पना 183


रसक-शुद्धि

नृमूत्रे वाथ गोमूत्रे सप्ताहं रसकं पचेत्।
दोलायन्त्रेण शुद्धिः स्यात् ततः कार्येषु योजयेत्॥७६॥

रसक (खपरिया) को पोटली में बाँधकर दोलायन्त्र द्वारा नरमूत्र या गोमूत्र में पकाना चाहिये। इस प्रकार यह शुद्ध हो जाता है और कार्यों में प्रयुक्त किया जाता है।

वक्तव्य— यहाँ भी 'पचेत्' का अर्थ सम्भवतः 'स्वेदयेत्' ही है। यथा—'सप्ताहात् स्वेदितः शुद्धो रसको नरवारिणा'। खपरिया दो प्रकार का होता है—१. दर्दुर और २. कारवेल्लक। इनमें पहला मेंढक के वर्ण का होता है और दूसरा करेले के वर्ण का। जिन दिनों खपरिया को अलभ्य माना जाता था उन दिनों उसके स्थान में यशद भस्म का प्रयोग किया जाता था और आज भी बहुधा उसी का प्रयोग किया जाता है, जैसे 'वसन्तमालती' में। खपरिया से ही यशद प्राप्त किया जाता है, जैसे तूतिया में से ताँबा।


उपधातुओं से सत्त्व निकालने की विधि

लाक्षामीनपयश्छागं टङ्कणं मृगशृङ्गकम्।
पिण्याकं सर्षपाः शिगुर्गुञ्जोर्णंगुडसैन्धवाः ॥७७॥
यवास्तिक्ता घृतं क्षौद्रं यथालाभं विचूर्णयेत्।
एभिर्विमिश्रिताः सर्वे धातवो गाढवह्निना ॥७८॥
मूषाध्माताः प्रजायन्ते मुक्तसत्त्वा न संशयः।

लाही (लाख), छोटी-छोटी मछलियाँ, बकरी का दूध, सुहागा, हरिण की सींग, खली, सरसों, सहजन को छाल, गुंजाफल (घुँघची या रत्तियाँ), ऊन (भेड़ के रोम), गुड़, सेंधा नमक, जौ, कुटकी, गोघृत तथा मधु सबको समान भाग में लेकर चूर्ण बनायें। इस चूर्ण के समान भाग किस भी उपधातु को लेकर और एक साथ मिलाकर गोलियाँ बना लें तथा मूषायन्त्र में रखकर तीव्र अग्नि (बबूर के कोपलों) द्वारा भली-भाँति पकाये। इस तरह सभी उपधातुओं का सत्त्व अलग हो जाता है, इसमें कोई भी सन्देह नहीं है।

वक्तव्य— उक्त विधि से माक्षिक में से लोह तथा ताम्र, तूतिया में से ताम्र, अभ्रक में से नीलाञ्जन, नीलाञ्जन में से अञ्जन नामक श्वेत स्फटिकाकार मृदु तत्त्व, मैनसिल तथा हरिताल में से संखिया तथा खर्पर (खपरिया) में से वङ्ग जैसा सत्त्व या तत्त्व या धातु प्राप्त किया जा सकता है। देखें— आ० प्र० अ० २। इन सत्त्वों को स्वरूपतः सेवन नहीं किया जाता, अपितु उक्त धातुओं जिस प्रकार भस्म बनायी जाती है, उसी प्रकार भस्म बनाकर सेवन करना चाहिये। धातुओं का उपादान या खनिज द्रव्य, जिसमें धातु द्रव्यान्तर से संयुक्त रहता है, उसे उपधातु कहा जाता है। सत्त्वपातन-विधि से उपधातुओं में से धातुओं को पृथक् कर लिया जाता है।


रत्नशोधन-विधि

कुलत्थकोद्रवक्वाथैर्दोलायन्त्रे विपाचयेत्॥७९॥
व्याघ्रीकन्दगतं वज्रं त्रिदिनं शुद्धिम्ऋच्छति।

वज्र (हीरा) को कण्टकारी की जड़ के कल्क में रखकर दोलायन्त्र द्वारा कुलथी तथा कोदों के क्वाथ में तीन दिन-पर्यन्त पकाना चाहिये। इस प्रकार वह (हीरा) शुद्ध हो जाता है।


वज्रभस्म की विधि

तप्तं तप्तं तु ततद् वज्रं खरमूत्रैर्निषेचयेत्॥८०॥
पुनस्तप्त्यं पुनः सेच्यमेवं कुर्यात् त्रिसप्तधा।
मत्कुणैस्तालकं पिष्ट्वा यावद्भवति गोलकम्॥८१॥
तद्गोले निहितं वज्रं तद्गोलं वह्निना धमेत्।
सिञ्चयेदश्वमूत्रेण तद्गोले च क्षिपेत् पुनः॥८२॥
रुद्ध्वा ध्मातं पुनः सेच्यमेवं कुर्यात् त्रिसप्तधा।
एवं च म्रियते वज्रं चूर्णं सर्वत्र योजयेत्॥८३॥

हीरा को तपाकर गधे के मूत्र में बुझायें, बार-बार तपायें और बार-बार बुझायें। इस प्रकार इक्कीस बार करें। उत्तम तबकिया हरताल को खटमलों के साथ तब तक पीसें जब तक गोला न बन जाये, फिर इस गोला में शुद्ध वज्र (हीरा) को रख दें, उस वज्र युक्त गोला को अग्नि में धमायें तथा घोड़े के मूत्र में बुझा दें। पुनः हरिताल तथा खटमलों के गोला को फिर धमायें और घोड़े के मूत्र में बुझायें। इसी तरह इक्कीस बार करें। इस विधि से वज्र चूर्ण भस्मीभूत हो जाता है। इस वज्रभस्म को आवश्यक कार्यों में प्रयुक्त करना चाहिये।

दूसरी विधि

हिङ्गुसैन्धवसंयुक्ते क्वाथे कौलत्थजे क्षिपेत्।
तप्तं तप्तं पुनर्वज्रं भवेच्चूर्णं त्रिसप्तधा॥८४॥

वज्र (हीरा) को तपाकर हींग तथा सैन्धव लवण से युक्त कुलथी के क्वाथ में इक्कीस बार बुझाना चाहिये। इस तरह उसकी भस्म हो जाती है।

वक्तव्य— कुछ विद्वानों का कथन है कि हींग तथा सैन्धव लवण के कल्क में लपेट कर हीरक को बुझाना चाहिये।

तीसरी विधि

मण्डूकं कांस्यजे पात्रे निगृह्य स्थापयेत् सुधीः।
स भीतो मूत्रयेत् तत्र तन्मूत्रे वज्रमावपेत्॥८५॥

184 शार्ङ्गधरसंहिता [ मध्यमखण्डे
[ बायाँ स्तम्भ ]
तप्तं तप्तं च बहुधा वज्रस्यैवं मृतिर्भवेत्।
बुद्धिमान् मनुष्य मण्डूक (मेंढक) को पकड़कर कांस्यपात्र में रखें। जब डरकर वह मूत्र दें, तो इस मूत्र में वज्र को कई बार तपाकर बुझाना चाहिये। इस प्रकार वज्र की मृत्यु (भस्म) हो जाती है।
वक्तव्य-वज्रभस्म सफेद होती है। यथा-'भस्मी भवति तद् वज्रं शङ्खशीतांशुसुन्दरम्। (आ०प्र०अ० 5)।
वैक्रान्त-मारण
वैक्रान्तं वज्रवच्छोध्यं नीलं वा लोहितं तथा।।86।।
हयमूत्रेण तत्सेच्यं तप्तां तप्तं द्विसप्तधा।
ततस्तु मेषशृङ्ग्युक्तपञ्चाङ्गे गोलकं क्षिपेत्।।87।।
पुटेन्मूषापुटे रुद्ध्वा कुर्यादेवं च सप्तधा।
वैक्रान्तं भस्मतां याति वज्रस्थाने नियोजयेत्।।88।।
वैक्रान्त नामक उपरत्न दो तरह का होता है-1. नीलवर्ण और 2 रक्तवर्ण। उसका शोधन वज्र के समान करना चाहिये। वैक्रान्त भस्म-निर्माण-विधि-वैक्रान्त को तपा-तपाकर चौदह बार घोड़े के मूत्र में बुझायें, इसके बाद मेढासिंगी के पञ्चांग (छाल, पत्र, पुष्प, फल तथा मूल) का कल्क बनायें और उसमें वैक्रान्त को भरकर तथा दो सिकोरों के सम्पुट में बाँध करके (कपड़मिट्टी द्वारा) पुट दें। इसी प्रकार सात पुटें देने से वैक्रान्त की भस्म हो जाती है। इसका प्रयोग वज्र के स्थान में अर्थात् उसके अभाव में करना चाहिये।
वक्तव्य-भूमि के गर्भ में जो हीरक खंड अपरिपक्व रह जाते हैं, उनका नाम 'वैक्रान्त' है। यथा-'विकृता वज्रखण्डा ये वैक्रान्ताख्यां भजन्ति ते' (आ० प्र० अ० 5)। हीरक आदि बहुमूल्य रत्नों की भस्म बनाने का शास्त्रों में निषेध पाया जाता है। अतः रत्नों की छीलन, जो मणि या नगीना बनाते समय उतरती है, उसे लेकर भस्म बनाना चाहिये। देखें०-आ प्र०अ० 5।
रत्नों का शोधन-मारण
स्वेदयेद् दोलिकायन्त्रे जयन्त्याः स्वरसेन च।।89।।
मणिमुक्ताप्रवालानां यामैकं शोधनं भवेत्।
कुमार्यास्तण्डुलीयेन स्तन्येन च निषेचयेत्।।90।।
प्रत्येकं सप्तवेलं च तप्ततप्तानि कृत्स्नशः।
मौक्तिकानि प्रवालानि तथा रत्नान्यशेषतः।।91।।
क्षणाद् विविधवर्णानि म्रियन्ते नात्र संशयः।
उक्तमाक्षिकवन्मुक्ताः प्रवालानि च मारयेत्।।92।।
[ दायाँ स्तम्भ ]
वज्रवत् सर्वरत्नानि शोधयेन्मारयेत् तथा।
मणि (माणिक्य, पुखराज तथा नीलम आदि), मुक्ता (मोती) तथा प्रवाल (मूँगा) को दोलायन्त्र द्वारा जयन्ती (अरणी) के स्वरस अथवा क्वाथ में एक प्रहर तक स्वेदन करें, इस प्रकार वे शुद्ध हो जाते हैं। मोती प्रवाल तथा सम्पूर्ण रत्नों को तपा-तपाकर सात बार घीकुआर के रस में अथवा चौलाई के रस में अथवा स्त्री के दूध में बुझायें। इस प्रकार सरलता से उनकी भस्म हो जाती है। इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है। अथवा सोनामाखी के समान मोती तथा प्रवाल की भस्म बना लेनी चाहिये और सब प्रकार के रत्नों की शुद्धि तथा भस्म वज्र (हीरा) के समान करनी चाहिये।
वक्तव्य-उक्त मोती, प्रवाल आदि पदार्थों की तौल भस्म होने पर घट जाती है। अतः भस्मकर्ताओं तथा पड़ोसियों पर चोरी का सन्देह नहीं करना चाहिये। इसी प्रकार शंख, शुक्ति तथा कौड़ी की भस्म बनायी जाती है। इनकी तौल भी घट जाती है। उक्त पदार्थों को गुलाबजल में पीसकर भी प्रयोग में लाया जाता है।
शिलाजतु शोधन-विधि
शिलाजतु समानीय ग्रीष्मतप्तशिलाच्युतम्।।93।।
गोदुग्धैस्त्रिफलाक्वाथैर्भृङ्गद्रावैश्च मर्दयेत्।
आतपे दिनमेकैकं तच्छुष्कं शुद्धतां व्रजेत्।।94।।
ग्रीष्म ऋतु अर्थात् ज्येष्ठ तथा आषाढ़ मास में सूर्य की किरणों से सन्तप्त शिलाओं में से चूये हुये शिलाजीत को लेकर गोदुग्ध, त्रिफला क्वाथ तथा भाँगरा के रस के साथ एक-एक दिन मर्दन करें और धूप में सुखा लें। इस प्रकार शिलाजीत की शुद्धि हो जाती है।
वक्तव्य-इस प्रकार की शिलाजीत बहुत थोड़ी उपलब्ध होती है। इस कारण निम्नलिखित विधि से तैयार करके ग्राहकों की इच्छापूर्ति की जाती है। यद्यपि विन्ध्याचल की पर्वतमालाओं में भी शिलाजीत की उत्पत्ति होती है, तथापि पर्वतराज हिमालय को इस औषधरत्न की जन्मभूमि होने का श्रेय प्राप्त है।
शिलाजतु निर्माण-विधि
मुख्यां शिलाजतुशिलां सूक्ष्मखण्डप्रकल्पिताम्।
निक्षिप्यात्युष्णपानीये यामैकं स्थापयेत् सुधीः।।95।।
मर्दयित्वा ततो नीरं गृह्णीयाद् वस्त्रगालितम्।
स्थापयित्वा च मृत्पात्रे धारयेदातपे बुधः।।96।।
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