सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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स्वरूप नहीं कह सकते । आनन्दस्वरूप तो ईश्वर को ही कह
सकते हैं ।
प्र०—जब कि आप की मुक्ति ऐसी है, कि जिसके होने पर
भी फिर कुछ दिनों के बाद दुःख उत्पन्न होने की संभावना बनी
रहती है तो ऐसी मुक्ति से बद्ध रहना ही अच्छा है ।
उ०—विमुक्तिप्रशंसा मन्दानाम् ॥ ६८ ॥
अर्थ—विमुक्त ( बद्ध रहना ) की प्रशंसा मूर्ख लोग करते
हैं, न कि विद्वान् लोग । कोई-कोई मन को नित्य मानते हैं,
उनके मत का भी खंडन करते हैं ।
न व्यापकत्वं मनसः करणत्वादिनिन्द्रियत्वाद्वा ६९
अर्थ—मन व्यापक नहीं है, क्योंकि मन को इन्द्रिय और
कारण माना है ।
प्र०—कारण किसको कहते हैं ?
उ०—जिसके द्वारा जो अपने कार्य करने में तैयार हो, जैसे
कि मन के द्वारा जीवात्मा अपने कार्यों को करता है ।
सक्रियत्वाद्गतिश्रुतेः ॥ ७० ॥
अर्थ—मन क्रियावाला है इसलिये मन हर एक इन्द्रियों
के व्यापार और प्रवृत्ति का हेतु है, गतिवाला भी है ।
प्र०—यदि मन को नित्य नहीं मानते तो मत मानो, लेकिन
निर्विभाग, कारण रहित तो मानना होगा ।
उ०—न निर्भागित्वं तद्योगात् घटवत् ॥ ७१ ॥
अर्थ—जैसे घट आदि पदार्थ मृत्तिका ( मिट्टी ) के कार्य
हैं इस ही तरह मन भी किसी का कार्य अवश्य है । जबकि
कार्य निश्चय हो गया तो उसको कारण योग भी अवश्य होगा ।
प्र०—मन नित्य है या अनित्य ?