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सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 152, कुल 192 में से

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पृष्ठ 152

( १५१ )
उ०—प्रकृतिपुरुषयोरन्यत् सर्वमनित्यम् ॥ ७२
अर्थ—प्रकृति और पुरुष के अतिरिक्त जो अन्य पदार्थ हैं,
वह सब अनित्य हैं, इस कारण से मन भी अनित्य है।
प्र०—प्रकृति और पुरुष इन दो को ही नित्य क्यों माना है ?
उ०—न भागलाभो भोगिनो निर्भागस्वश्रुतेः ७३
अर्थ—जो आप ही कारण रूप है, उसका और कोई कारण
नहीं हो सकता, उसको तो सब ही कारण रहित मानते चले
आये हैं, इस कारण प्रकृति, पुरुष दोनों नित्य हैं।
प्र०—पुरुष की मुक्ति क्यों मानी गई है ?
नानन्दाभिव्यक्तिमुक्तिर्निर्धर्मत्वात् ॥ ७४ ॥
अर्थ—प्रधान जो प्रकृति है, उसको आनन्द की अभिव्यक्ति
(ज्ञान) नहीं हो सकती, इस कारण उसकी मुक्ति भी नहीं कह
सकते; क्योंकि आनन्द प्रधान का धर्म नहीं है। किन्तु जीव का है।
उ०—न विशेषगुणोच्छित्तिस्तद्वत् ॥ ७५ ॥
अर्थ—सत्व, रज, तम, इनके नाश होने को ही यदि मुक्ति
माना जाय तो भी ठीक नहीं, क्योंकि उक्त सत्त्वादि तीन गुण
प्रधान के स्वाभाविक धर्म हैं, उनका नाश होना प्रधान का धर्म
नहीं है, इसलिये उसकी मुक्ति नहीं मानी जाती ।
न विशेषगतिर्निष्क्रियस्य ॥ ७६ ॥
अर्थ—यदि विशेष गति ऊपर नीचे का जाना, आना अर्थात्
ब्रह्मलोक की प्राप्ति इत्यादिक को ही मुक्ति मानें सो भी नहीं हो
सकती, क्योंकि प्रधान तो क्रिया शून्य है, जो कुछ उसमें क्रिया
दीखती है वह सब पुरुष के संसर्ग (मेल) से है, परन्तु आप
ऐसी शक्ति को नहीं रखता ।
नाकारो परागोच्छित्तिः क्षणिकत्वादिदोषात् ७७