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सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( १४६ )
नात्माविद्या नोभयं जगदुपादानकारणं
निःसङ्गत्वात् ॥ ६५ ॥
अर्थ—इस कारण आत्मा जगत् का उपादान कारण नहीं
हो सकता कि वह निर्विकार है। यदि अविद्या को संसार का
उपादान कारण मानें तो अविद्या भी संसार का उपादान कारण
नहीं हो सकती, क्योंकि सत् मानें तो द्वैतापत्ति प्राप्त होती है,
और असत् मानने पर बन्ध्या के पुत्र के सदृश (समान) अभाव
वाली हो जायगी, और आत्मा तथा अविद्या यह दोनों मिलकर
संसार का उपादान कारण इस प्रकार नहीं हो सकते कि आत्मा
संग रहित है, इस कारण ही जो एक आत्मा के अतिरिक्त और
कुछ नहीं मानते, उनके मत में संसार का उपादान कारण सिद्ध
नहीं हो सकता है।
नैकस्यानन्दचिद्रूपत्वे द्वयोर्भेदात् ॥ ६६ ॥
अर्थ—वेदादि सत् शास्त्र ईश्वर को सच्चिदानन्द कहकर पुकार
रहे हैं, और जीव में आनन्द रूप होना नहीं है, इस कारण ईश्वर
और जीव इन दोनों में भेद है।
प्र०—जीव में आनन्द तो माना ही नहीं गया है, तो मुक्ति
का उपदेश क्यों कहा, क्योंकि मुक्ति अवस्था में दुःखों के दूर
हो जाने पर आनन्द होता ही है ?
उ०—दुःखनिवृत्तेर्गौणः ॥ ६७ ॥
अर्थ—मुक्त होने पर दुःख दूर हो जाते हैं, ऐसा कहना
गौण है। यद्यपि मुक्ति होने पर दुःख दूर हो जाते हैं, परन्तु
अल्पज्ञता तो जीव में उस समय भी बनी रहती है, इसलिये
फिर भी दुःख उत्पन्न होने का भय बना ही रहता है, इस कारण
जीव सर्वदा आनन्द में नहीं रहता है, अतः जीव को आनन्द-