सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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परिमाण के अवान्तर ( भीतर रहने वाले ) भेद हैं। यदि गिनती
बढ़ानी ही स्वीकार है तो एक तिरछा अणु, एक सीधा अणु,
ऐसे ही बहुत से भेद हो सकते हैं ; लेकिन ऐसा होना ठीक नहीं।
और हमने जो अणुओं को अनित्य प्रतिपादन किया था वह
सिर्फ पृथ्वी आदि के गुण को अनित्य कहा था ; किन्तु अणु
परिमाण द्रव्यों को अनित्य नहीं प्रतिपादन किया था, क्योंकि हम
भी तो अणु नित्य मानते हैं।
प्र०—जब प्रकृति और पुरुष के सिवाय सबको अनित्य
कहा तो प्रत्यभिज्ञा किस तरह हो सकती है, क्योंकि जब सब
पदार्थों को नाशवान् मान लेंगे तब प्रत्यभिज्ञा नहीं हो सकती है।
प्रत्यभिज्ञा का लक्षण पहले अध्याय में कह आये हैं।
उ०—अनित्यत्वेऽपि स्थिरतायोगात् प्रत्य-
भिज्ञानं सामान्यस्य ॥ ६१ ॥
अर्थ—यद्यपि प्रकृति और पुरुष के सिवाय जितने सामान्य
पदार्थ हैं वे सब ही अनित्य हैं तथापि हम उनको स्थिर मानते
हैं ; लेकिन क्षणिकवादियों के समान हर एक क्षण में परिवर्त्तन-
शील ( लौटना अर्थात् उलट-फेर ) नहीं मानते हैं ; इसवास्ते
प्रत्यभिज्ञा हो सकती है।
न तदपलापस्त स्मात् ॥ ६२ ॥
अर्थ—अतएव सामान्य पदार्थ कुछ न रहा ऐसा नहीं कहा
जा सकता ; किन्तु ऐसा कहा जा सकता है कि सामान्य पदार्थ
नित्य नहीं है।
नान्यनिवृत्तिरूपत्वं भाव प्रतीतेः ॥ ६३ ॥
अर्थ—सामान्य पदार्थों को अनित्य नहीं कह सकते हैं,