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सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 192 में से

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पृष्ठ 149

( १४८ )
मानने से प्रत्यक्ष में विरोध की प्राप्ति होती है, और संसार में
दीखता भी है, कि सुख-दुःख अनेक व्यक्ति एक समय में भोग
करते हैं, दूसरे पक्ष में ऐसा अर्थ करना चाहिये, कि जो मनुष्य
एक आत्मा के अतिरिक्त और कुछ नहीं मानते, उनके सिद्धांत में
पूर्वोक्त दोष के अतिरिक्त और एक दोष यह भी प्राप्त हो जायगा,
कि घटादि कार्यों को भी आत्मा मान कर उनके नाश होते ही
आत्मा का भी नाश मानना होगा। यह प्रत्यक्ष से विरोध
होगा, इसलिये ऐसा अद्वैत मानना सत्य नहीं है।
नोभाभ्यां ते नैव ॥ ६३ ॥
अर्थ—आत्मा और अनात्मा इन दोनों की एकता है ऐसा
कहना भी योग्य नहीं, क्योंकि उसी प्रत्यक्ष प्रमाण में बाधा प्राप्त
हो जायगी, और संसार में यह बात प्रत्यक्ष दीख रही है, कि
आत्मा और अनात्मा दो पदार्थ भिन्न-भिन्न हैं, इस वास्ते ऐसा
कहना कि एक आत्मा के अतिरिक्त और कुछ योग्य नहीं।
प्र०—अगर तुम ऐसा मानते हो कि आत्मा और अनात्मा
भिन्न-भिन्न पदार्थ हैं, तो श्रुतियाँ ऐसा क्यों कहती हैं, कि “एकमेवा-
द्वितीयंब्रह्म ।” “आत्मैवेदं सर्वम्” ( एक ही ब्रह्म अद्वितीय है ) ;
यह सब आत्मा ही है ) इत्यादि श्रुतियाँ एक आत्मा बताती हैं,
तो बहुत से आत्मा, जीव वा ब्रह्म पृथक्-पृथक् क्यों माने जाँय ।
उ०—अन्यपरत्वमविवेकानां तत्र ॥ ६४ ॥
अर्थ—इन श्रुतियों में अन्यपरत्व अर्थात् द्वैत है, ऐसा ज्ञान
अज्ञों को होता है, और जो विद्वान् हैं वह इन श्रुतियों का ऐसा
अर्थ नहीं करते हैं, क्योंकि अद्वितीय शब्द से यह प्रयोजन है,
कि ईश्वर के समान दूसरा और कोई नहीं है, और जो एक
आत्मा मानते हैं, उनके मत में संसार का उपादान कारण सत्य
नहीं हो सकता।