सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

अध्याय - 2
देह की जीव संज्ञा व्यवहार से है -
पज्जत्तापज्जत्ता जे सुहुमा बादरा य जे जीवा।
देहस्स जीवसण्णा सुत्ते ववहारदो उत्ता॥ (2-29-67)
जो पर्याप्त तथा अपर्याप्त और जो सूक्ष्म तथा वादर जीव कहे गये हैं, वे देह की
अपेक्षा जीव संज्ञाएँ हैं। वे सब परमागम में व्यवहार नय से कही गई हैं।
गुणस्थान जीव नहीं हैं -
मोहणकम्मस्सुदया दु वण्णिदा जे इमे गुणट्ठाणा।
ते किह हवंति जीवा जे णिच्चमचेदणा उत्ता॥ (2-30-68)
जो ये गुणस्थान हैं, वे मोहनीय कर्म के उदय से बतलाये गये हैं। जो नित्य अचेतन
कहे गये हैं, वे जीव किस प्रकार हो सकते हैं?
इदि दुदियो जीवाजीवाधियारो समत्तो
34

अध्याय - 3
तिदियो कत्तिकम्माधियारो
THE DOER AND THE KARMA
जीव के कर्म-बन्ध कैसे होता है -
जाव ण वेदि विसेसंतरं तु आदासवाण दोण्हं पि।
अण्णाणी ताव दु सो कोहादिसु वट्टदे जीवो॥ (3-1-69)
कोहादिसु वट्टंतस्स तस्स कम्मस्स संचओ होदि।
जीवस्सेवं बंधो भणिदो खलु सव्वदरिसीहिं॥ (3-2-70)
जीव जब तक आत्मा और आस्रव दोनों के ही (भिन्न-भिन्न) लक्षण और भेद को
नहीं जानता है, तब तक वह अज्ञानी क्रोधादिक आस्रवों में प्रवृत्त रहता है। क्रोधादिक
आस्रवों में वर्तते हुए उसके कर्मों का संचय होता है। वास्तव में जीव के इस प्रकार
कर्मों का बन्ध सर्वज्ञदेवों ने बताया है।
So long as the soul (jīva) does not recognize the differences in the
attributes of the Self and the influx of karmas, it remains
ignorant, and indulges in baser emotions like anger. The
Omniscients declare that while indulging in anger etc., the soul
accumulates karmic matter and, in this manner, bondage takes
place.
35

अध्याय - 3
ज्ञान से बन्ध का निरोध -
जइया इमेण जीवेण अप्पणो आसवाण य तहेव।
णादं होदि विसेसंतरं तु तइया ण बंधो से॥ (3-3-71)
जब यह जीव आत्मा का और आस्रवों का (भिन्न-भिन्न) लक्षण और भेद जान लेता
है, तब उसके कर्मबन्ध नहीं होता।
When the soul (jīva) is able to recognize the differences in the
attributes of the Self and the influx of karmas, then fresh
bondage does not take place.
भेदज्ञान से आस्रव-निवृत्ति -
णादूण आसवाणं, असुचित्तं च विवरीदभावं च।
दुक्खस्स कारणं त्ति य, तदो णियत्तिं कुणदि जीवो॥
(3-4-72)
आस्रवों का अशुचिपना, इनका विपरीत भाव और वे दुःख के कारण हैं, यह जानकर
जीव उनसे निवृत्ति करता है।
After knowing that karmic influxes are impure, of nature
contrary to the Self, and the cause of misery, the Self abstains
from them.
36

अध्याय - 3
आत्म स्वभाव में स्थिति से आस्रवों का क्षय -
अहमिक्को खलु सुद्धो य णिम्ममो णाणदंसणसमग्गो।
तम्हि ठिदो तच्चित्तो सव्वे एदे खयं णेमि॥ (3-5-73)
(ज्ञानी विचार करता है कि-) मैं निश्चय ही एक हूँ, शुद्ध हूँ, ममत्वरहित हूँ और
ज्ञान-दर्शन से परिपूर्ण हूँ। (उक्त लक्षण वाले) शुद्धात्मस्वरूप में स्थित और
सहजानन्द स्वरूप में तन्मय हुआ मैं इन सब (क्रोधादिक आस्रवों) को नष्ट करता
हूँ।
(The well-informed asserts that –) I am really one, pure, free
from possessive desires, and replete with knowledge and
perception. Resting on pure consciousness (with the above-
mentioned attributes), and self-contented, I lead all the karmic
influxes (like anger) to destruction.
ज्ञानी आस्रवों से निवृत्त होता है -
जीवणिबद्धा एदे अधुव अणिच्चा तहा असरणा य।
दुक्खा दुक्खफला त्ति य णादूण णिवत्तदे तेहिं॥ (3-6-74)
ये क्रोधादि आस्रव जीव के साथ निबद्ध हैं, अध्रुव हैं, अनित्य हैं तथा अशरण हैं
(रक्षा करने में समर्थ नहीं हैं) और ये दुःखरूप हैं और दुःखरूप फल देने वाले हैं।
यह जानकर (ज्ञानी) उन आस्रवों से निवृत्त होता है।
These influxes like anger are associated with the soul,
destructible, evanescent, incapable of providing refuge, misery
themselves, and result into misery. Knowing this, the well-
informed abandons them.
37

३. कर्तृ-कर्म अधिकार (आत्मा व कर्म का सम्बन्ध)

अध्याय - 3
ज्ञानी की पहिचान -
कम्मस्स य परिणामं णोकम्मस्स य तहेव परिणामं।
ण करेदि एदमादा जो जाणदि सो हवदि णाणी॥ (3-7-75)
जो आत्मा इस कर्म के परिणाम को, इसी प्रकार नोकर्म के परिणाम को नहीं करता
है, अपितु जो जानता है, वह ज्ञानी है।
The Self who does not get involved in the adoption of the karmic
matter, and, in the same way, the quasi-karmic matter
(nokarma), but is aware of these, is knowledgeable.
ज्ञानी परद्रव्य की पर्यायों में परिणमन नहीं करता -
ण वि परिणमदि ण गिण्हदि उप्पज्जदि ण परदव्वपज्जाए।
णाणी जाणंतो वि हु पोग्गलकम्मं अणेयविहं॥ (3-8-76)
ज्ञानी अनेक प्रकार के पौद्गलिक कर्मों को जानता हुआ भी निश्चय से परद्रव्य की
पर्यायों में न उन स्वरूप परिणमन करता है, न उन्हें ग्रहण करता है, न उन रूप
उत्पन्न होता है।
The knower, while knowing the various kinds of karmic matter,
surely does not manifest himself in the modifications of alien
substances, or assimilate them, or transmute in their form.
38

अध्याय - 3
ज्ञानी अपने परिणामों को जानता है -
ण वि परिणमदि ण गिण्हदि उप्पज्जदि ण परदव्वपज्जाए।
णाणी जाणंतो वि हु सगपरिणामं अणेयविहं॥ (3-9-77)
ज्ञानी अनेक प्रकार के अपने परिणामों का जानता हुआ भी निश्चय से परद्रव्य की
पर्यायों में न तो परिणमन करता है, न उन्हें ग्रहण करता है, न उन रूप उत्पन्न ही
होता है।
The knower, while knowing the various modes of his own
thought-dispositions, surely does not manifest himself in the
modifications of alien substances, or assimilate them, or
transmute in their form.
ज्ञानी कर्म-फल को जानता है -
ण वि परिणमदि ण गिण्हदि उप्पज्जदि ण परदव्वपज्जाए।
णाणी जाणंतो वि हु पॉग्गलकम्मफलं अणंतं॥ (3-10-78)
ज्ञानी पौद्गलिक कर्मों के अनन्त फल का जानता हुआ भी निश्चय से परद्रव्यों के
पर्यायों में न तो परिणमन करता है, न उन्हें ग्रहण करता है, न उन रूप उत्पन्न होता
है।
The knower, while knowing the various fruits of karmic matter,
surely does not manifest himself in the modifications of alien
substances, or assimilate them, or transmute in their form.
39

अध्याय - 3
पुद्गल द्रव्य पररूप परिणमन नहीं करता -
ण वि परिणमदि ण गिण्हदि उप्पज्जदि ण परदव्वपज्जाए।
पोग्गलदव्वं पि तहा परिणमदि सगेहि भावेहिं॥ (3-11-79)
पुद्गल द्रव्य भी परद्रव्य की पर्यायों में उस रूप न तो परिणमन करता है, न उन्हें
ग्रहण करता है, न उन रूप उत्पन्न होता है, क्योंकि वह तो अपने ही भावों से
परिणमन करता है।
The physical matter too does not manifest itself in the modes of
any foreign substance, or assimilate them, or transmute in their
form, because it manifests in its own state or form.
───
जीव और पुद्गल के परिणामों में निमित्त-नैमित्तिक भाव है -
जीव परिणामहेदुं कम्मत्तं पोग्गला परिणमंति।
पोग्गलकम्मणिमित्तं तहेव जीवो वि परिणमदि॥ (3-12-80)
ण वि कुव्वदि कम्मगुणे जीवो कम्मं तहेव जीवगुणे।
अण्णोण्णणिमित्तेण दु परिणामं जाण दोण्हं पि॥ (3-13-81)
एदेण कारणेण दु कत्ता आदा सगेण भावेण।
पोग्गलकम्मकदाणं ण दु कत्ता सव्वभावाणं॥ (3-14-82)
पुद्गल जीव के (रागादि) परिणाम के निमित्त से कर्म रूप से परिणमित होते हैं।
इसी प्रकार जीव भी (मोहनीय आदि) पुद्गलकर्म निमित्त से (रागादि भाव रूप से)
40

अध्याय - 3
परिणमन करता है। जीव कर्म के गुणों को नहीं करता है। इसी प्रकार कर्म जीव के
गुणों को नहीं करता है; परन्तु एक-दुसरे के निमित्त से इन दोनों के परिणाम जानो।
इस कारण से आत्मा अपने ही भावों से कर्ता है, परन्तु पुद्गल कर्म के द्वारा किये गये
समस्त भावों का कर्ता नहीं है।
निश्चयनय से आत्मा अपना ही कर्ता और भोक्ता है -
णिच्छयणयस्स एवं आदा अप्पाणमेव हि करेदि।
वेदयदि पुणो तं चेव जाण अत्ता दु अत्ताणं।। (3-15-83)
(निश्चयनय का इस प्रकार मत है कि) आत्मा अपने को ही करता है और फिर
आत्मा अपने को ही भोगता है, ऐसा तू जान।

अध्याय - 3
व्यवहार से आत्मा पुद्गल कर्मों का कर्ता और भोक्ता है -
ववहारस्स दु आदा पोग्गलकम्मं करेदि णेयविहं।
तं चेव य वेदयदे पोग्गलकम्मं अणेयविहं॥ (3-16-84)
व्यवहार नय का मत है कि आत्मा अनेक प्रकार के पुद्गल कर्मों को करता है और
उन्हीं अनेक प्रकार के पुद्गल कर्मों को भोगता है।
It is only from the empirical point of view (vyavahāra naya) that
the Self is the creator of various kinds of karmic matter, and then
enjoys the fruits thereof.
व्यवहार की मान्यता में दोष -
जदि पोग्गलकम्ममिणं कुव्वदि तं चेव वेदयदि आदा।
दोकिरियावादिरित्तो पसज्जदे सो जिणावमदं॥ (3-17-85)
यदि आत्मा इस पुद्गल कर्म को करता है और उसी को भोगता है तो दो क्रियाओं से
अभिन्न होने का प्रसंग आता है। ऐसा मानना जिनेन्द्रदेव के मत के विपरीत है।
विशेष - क्रिया वस्तुतः परिणाम है और परिणाम क्रिया के कर्ता परिणामी से
अभिन्न होता है। जीव जिस प्रकार अपने परिणाम को करता है और उसी को भोगता
है उसी प्रकार यदि वह पुद्गलकर्म को करे और उसी को भोगे तो जीव अपनी और
पुद्गल की - दोनों की - क्रियाओं से अभिन्न हो जाएगा। दो द्रव्यों की क्रिया एक
द्रव्य करता है, ऐसा मानना जिनेन्द्रदेव के सिद्धान्त के विरुद्ध है।
If the Self creates the karmic matter and then enjoys the
consequences thereof, it will lead to the hypothesis of a single
42

अध्याय - 3
cause producing two different effects. This is in conflict with the
Jaina doctrine.
Note: Action (kriyā) actually leads to mode (paryāya) and the
mode of a substance cannot be altogether different from the
substance itself. As the Self produces his own modes, and, again,
enjoys results thereof, and if he also creates the karmic matter
and then enjoys the consequences thereof, then the Self will be
no different from the two actions – of self and of karmic matter.
To hypothesize that a single substance produces kriyā in two
substances is against the doctrine of the Omniscient Lord.
दो किरियावादी मिथ्यादृष्टि हैं -
जम्हा दु अत्तभावं पोग्गलभावं च दो वि कुव्वंति।
तेण दु मिच्छादिट्ठी दो-किरियावादिणो होंति॥ (3-18-86)
क्योंकि आत्मा, आत्मा के भाव को और पुद्गल के भाव (परिणाम) को - दोनों को

  • करता है। ऐसा मानने के कारण दो-किरियावादी (एक द्रव्य द्वारा दो द्रव्यों के
    परिणाम किये जाते हैं, ऐसा मानने वाले) मिथ्यादृष्टि होते हैं।
    Those who believe that the jīva or the Self is the producer of
    modifications in both – his own self, and in the physical matter,
    i.e., one single substance producing modifications in two
    substances, are of erroneous faith.
    43

अध्याय - 3
मिथ्यात्वादि भाव दो प्रकार के हैं -
मिच्छत्तं पुण दुविहं जीवमजीवं तहेव अण्णाणं।
अविरदि जोगो मोहो कोहादीया इमे भावा॥ (3-19-87)
पुनः मिथ्यात्व दो प्रकार का है - जीवमिथ्यात्व और अजीवमिथ्यात्व। इसी प्रकार
अज्ञान, अविरति, योग, मोह और क्रोध आदि कषाय - ये सभी भाव (जीव-अजीव
के भेद से) दो-दो प्रकार के हैं।
Again, erroneous faith is of two kinds – one pertaining to the jīva
or soul, and the other pertaining to ajīva or non-soul. Similarly,
nescience (ajñāna), non-abstinence (avirati), actions of the body,
the organ of speech and the mind (yoga), delusion (moha), and
passions (kaṣāya) like anger, are of two kinds (in respect of being
jīva or ajīva) each.
अजीव और जीव मिथ्यात्वादि भाव -
पोग्गलकम्मं मिच्छं जोगो अविरदि-अणाणमज्जीवं।
उवओगो अण्णाणं अविरदि मिच्छं च जीवो दु॥ (3-20-88)
जो मिथ्यात्व, योग, अविरति और अज्ञान अजीव हैं, वे पुद्गल कर्म हैं और जो
अज्ञान, अविरति और मिथ्यात्व जीव हैं, वे उपयोगरूप हैं।
Erroneous faith, actions of the body, the organ of speech and the
mind, non-abstinence, and nescience, which are of the nature of
ajīva, are karmic matter. And nescience, non-abstinence, and
erroneous faith, which are of the nature of jīva, are modes of
consciousness (upayogarūpa).
44

अध्याय - 3
मोहयुक्त जीव के अनादिकालीन परिणाम -
उवओगस्स अणाई परिणामा तिण्णि मोहजुत्तस्स।
मिच्छत्तं अण्णाणं अविरदिभावो य णादव्वो॥ (3-21-89)
मोह से युक्त उपयोग के तीन अनादिकालीन परिणाम हैं। वे (तीन परिणाम)
मिथ्यात्व, अज्ञान और अविरतिभाव जानने चाहिये।
The consciousness, conditioned by delusion, undergoes three
different kinds of modifications perpetually. These three
modifications must be known as erroneous faith, nescience, and
non-abstinence.
───
उपयोग विकारी भाव का कर्ता है -
एदेसु य उवओगो तिविहो सुद्धो णिरंजणो भावो।
जं सो करेदि भावं उवओगो तस्स सो कत्ता॥ (3-22-90)
(मिथ्यात्व, अज्ञान और अविरति) इन तीनों का निमित्त मिलने पर भी आत्मा का
उपयोग (यद्यपि निश्चय नय से) शुद्ध, निरंजन और एकभाव है, फिर भी तीन प्रकार
के परिणाम वाला वह उपयोग जिस (विकारी) भाव को करता है, वह उसी भाव का
कर्ता होता है।
Although the consciousness of the soul is inherently pure,
flawless, and of unified disposition, when conditioned by the
above mentioned three impurities (erroneous faith, nescience,
and non-abstinence), it becomes the causal agent of
corresponding psychic imperfections.
45

अध्याय - ३
आत्मा जिस भाव को करता है, वह उस भाव का कर्ता होता है -
जं कुणदि भावमादा कत्ता सो होदि तस्स भावस्स।
कम्मतं परिणमदे तम्हि सयं पोग्गलं दव्वं॥ (3-23-91)
आत्मा जिस भाव को करता है, वह उस भाव का कर्ता होता है। उसके कर्ता होने पर
पुद्गल द्रव्य स्वयं कर्मरूप परिणमित होता है।
अज्ञान से कर्मों का कर्तृत्व है -
परमप्पाणं कुव्वं अप्पाणं पि य परं करंतो सो।
अण्णोणमओ जीवो कम्माणं कारगो होदि॥ (3-24-92)
पर को अपने रूप करता हुआ और अपने को पररूप करता हुआ वह अज्ञानी जीव
कर्मों का कर्ता होता है।
46

अध्याय - 3
ज्ञानी कर्मों का कर्ता नहीं होता -
परमप्पाणमकुव्वं अप्पाणं पि य परं अकुव्वंतो।
सो णाणमओ जीवो कम्माणमकारगो होदि॥ (3-25-93)
जो पर को अपने रूप नहीं करता और जो अपने को भी पर रूप नहीं करता, वह
ज्ञानी जीव कर्मों का कर्ता नहीं होता।
The knowing Self, who does not engender feelings of non-self as
self, and self as non-self; that Self does not become the causal
agent of various karmas.
अज्ञानी अपने विकारी भाव का कर्ता है -
तिविहो एसुवओगो अप्पवियप्पं करेदि कोहो हं।
कत्ता तस्सुवओगस्स होदि सो अत्तभावस्स॥ (3-26-94)
यह (मिथ्यात्व, अज्ञान और अविरति रूप) तीन प्रकार का उपयोग ‘मैं क्रोध हूँ' ऐसा
आत्मविकल्प करता है। वह आत्मा उस उपयोग रूप अपने भाव का कर्ता होता है।
The Self, conditioned by the three impurities (erroneous faith,
nescience, and non-abstinence), indulges in such self-assertions
as “I am anger”. That Self becomes the causal agent of impure
modifications in his consciousness.
47

अध्याय - 3
इसी बात को विशेष रूप से कहते हैं -
तिविहो असुवओगो अप्पवियप्पं करेदि धम्मादी।
कत्ता तस्सुवओगस्स होदि सो अत्तभावस्स॥ (3-27-95)
वह (मिथ्यात्व, अज्ञान और अविरति रूप) तीन प्रकार का उपयोग 'मैं धर्मादिक हूँ'
ऐसा आत्मविकल्प करता है। वह आत्मा उस उपयोगरूप अपने भाव का कर्ता होता
है।
कर्तृत्व का मूल अज्ञान है -
एवं पराणि दव्वाणि अप्पयं कुणदि मंदबुद्धीए।
अप्पाणं अवि य परं करेदि अण्णाणभावेण॥ (3-28-96)
इस प्रकार मन्दबुद्धि (अज्ञानी) अज्ञानभाव से परद्रव्यों को अपने रूप करता है और
अपने को भी पररूप करता है।
48

अध्याय - 3
ज्ञान से कर्तृत्व का त्याग होता है -
एदेण दु सो कत्ता आदा णिच्छयविदूहिं परिकहिदो।
एवं खलु जो जाणदि सो मुंचदि सव्वकत्तित्तं॥ (3-29-97)
इस पूर्वोक्त कारण से निश्चय के ज्ञाताओं ने वह कर्ता कहा है। इस प्रकार वस्तुतः जो
जानता है, वह सब कर्तृत्व को छोड़ देता है।
Because of the aforesaid reason, the knowers of reality call such
a soul as a causal agent of various karmas. Whoever realizes the
truth, gives up all causal relationship with alien substances.
────────
व्यवहारी जनों का व्यामोह -
ववहारेण दु आदा करेदि घडपडरधादिदव्वाणि।
करणाणि य कम्माणि य णोकम्माणीह विविहाणि॥
(3-30-98)
व्यवहार से (व्यवहारी जन ऐसा मानते हैं कि) जगत में आत्मा घट-पट-रथ आदि
वस्तुओं को और इन्द्रियों को, अनेक प्रकार के क्रोधादि कर्मों को और शरीरादि
नोकर्मों को करता है।
The Self, in this worldly life, is identified, from the empirical
point of view (vyavahāra naya), as the producer of articles such
as a pot, a cloth or a chariot, besides the sense organs, various
types of karmas like anger, and the quasi-karmic matter
(nokarma).
────────
••••••••••••••••••••••••••
49

अध्याय - 3
व्याप्य-व्यापक भाव से आत्मा कर्ता नहीं है -
जदि सो परदव्वाणि य करेज्ज णियमेण तम्मओ होज्ज।
जम्हा ण तम्मओ तेण सो ण तेसिं हवदि कत्ता॥ (3-31-99)
यदि वह (आत्मा) परद्रव्यों को करे तो नियम से वह तन्मय (परद्रव्यमय) हो जाए;
क्योंकि वह तन्मय नहीं होता, इस कारण वह कर्ता नहीं है।
निमित्त-नैमित्तिक भाव से भी जीव कर्ता नहीं है -
जीवो ण करेदि घडं णेव पडं णेव सेसगे दव्वे।
जोगुवओगा उप्पादेगा य तेसिं हवदि कत्ता॥ (3-32-100)
जीव घट को नहीं करता, न ही पट को करता है, न ही शेष द्रव्यों को करता है। जीव
के योग और उपयोग घटादि के उत्पन्न करने में निमित्त हैं। उन योग और उपयोग का
कर्ता जीव है।
50

अध्याय - 3
ज्ञानी ज्ञान का ही कर्ता है -
जे पोग्गलदव्वाणं परिणामा होंति णाण-आवरणा।
ण करेदि ताणि आदा जो जाणदि सो हवदि णाणी॥
(3-33-101)
जो ज्ञानावरणादिक पुद्गल द्रव्यों के परिणाम हैं, उन्हें जो आत्मा नहीं करता, (परन्तु
जो) जानता है, वह ज्ञानी है।
The Self who does not engage in doing karmas, such as
knowledge-obscuring karma, which are consequences of the
karmic matter, but only knows these karmas, is the knower.
अज्ञानी अज्ञान भावों का कर्ता है -
जं भावं सुहमसुहं करेदि आदा स तस्स खलु कत्ता।
तं तस्स होदि कम्मं सो तस्स दु वेदगो अप्पा॥ (3-34-102)
आत्मा जिस शुभ या अशुभ भाव को करता है, वह उस भाव का निश्चय ही कर्ता
होता है। वह भाव उसका कर्म होता है, वह आत्मा उस भावरूप कर्म का भोक्ता
होता है।
Whatever psychic disposition, virtuous or wicked, the Self
engages in, he is definitely the author of the disposition. The
disposition becomes his karma and he is the enjoyer of the fruits
of this psycho-physical karmic matter (bhāv karma).
51

अध्याय - ३
कोई द्रव्य परभाव को नहीं करता -
जो जम्हि गुणे दव्वे सो अण्णम्हि दु ण संकमदि दव्वे।
सो अण्णमसंकंतो किह तं परिणामए दव्वं॥ (3-35-103)
जो वस्तु जिस द्रव्य और गुण में (वर्तती है), वह अन्य द्रव्य (और गुण) में संक्रमण
नहीं करती। अन्य में संक्रमण न करती हुई वह वस्तु उस (अन्य) द्रव्य को किस
प्रकार परिणमन करा सकती है।
The matter and quality of a substance are not transmittable into
the matter (and quality) of another substance. Being non-
transmittable, how can a substance change the modes of another
substance?
आत्मा पुद्गल कर्मों का कर्ता नहीं है -
दव्वगुणस्स य आदा ण कुणदि पोग्गलमयम्हि कम्मम्हि।
तं उहयमकुव्वंतो तम्हि कहं तस्स सो कत्ता॥ (3-36-104)
आत्मा पुद्गलमय कर्म में (अपने) द्रव्य और गुण का (संक्रमण) नहीं करता। उसमें
द्रव्य और गुण दोनों का (संक्रमण) न करता हुआ वह (आत्मा) उस पुद्गल कर्म
का कर्ता किस प्रकार हो सकता है?
The soul does not transmit its matter and quality into karmic
matter. How then, without transmitting its matter and quality,
can it be considered a causal agent for producing the karmic
matter?
52

अध्याय - 3
आत्मा उपचार से पुद्गल कर्म का कर्ता कहा है -
जीवम्हि हेतुभूदे बंधस्स दु पस्सिदूण परिणामं।
जीवेण कदं कम्मं भण्णदि उवयारमेत्तेण॥ (3-37-105)
जीव के निमित्तभूत होने पर ज्ञानावरणादि बन्ध का परिणमन देखकर 'जीव ने कर्म
किया' यह उपचार मात्र से कहा जाता है।
The soul is perceived as an extrinsic agent for the modifications
of karmic bondages (knowledge-obscuring karma, etc.) and it is
figuratively said that the karma has been produced by the soul.
व्यवहार से कर्मों का कर्तृत्व -
जोधेहि कदे जुद्धे रायेण कदं त्ति जंपदे लोगो।
तह ववहारेण कदं णाणावरणादि जीवेण॥ (3-38-106)
योद्धाओं के द्वारा युद्ध करने पर 'राजा ने युद्ध किया' इस प्रकार लोग कहते हैं। उसी
प्रकार ज्ञानावरणादि कर्म जीव ने किया, यह व्यवहार से कहा जाता है।
A war is fought by the warriors, still it is figuratively said that
the king is at war. Similarly it is said from the empirical point of
view, that the jīva, or the soul, has produced the karma.
53