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समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

पृष्ठ 53, कुल 226 में से

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पृष्ठ 53

अध्याय - 3
ज्ञान से बन्ध का निरोध -
जइया इमेण जीवेण अप्पणो आसवाण य तहेव।
णादं होदि विसेसंतरं तु तइया ण बंधो से॥ (3-3-71)
जब यह जीव आत्मा का और आस्रवों का (भिन्न-भिन्न) लक्षण और भेद जान लेता
है, तब उसके कर्मबन्ध नहीं होता।
When the soul (jīva) is able to recognize the differences in the
attributes of the Self and the influx of karmas, then fresh
bondage does not take place.
भेदज्ञान से आस्रव-निवृत्ति -
णादूण आसवाणं, असुचित्तं च विवरीदभावं च।
दुक्खस्स कारणं त्ति य, तदो णियत्तिं कुणदि जीवो॥
(3-4-72)
आस्रवों का अशुचिपना, इनका विपरीत भाव और वे दुःख के कारण हैं, यह जानकर
जीव उनसे निवृत्ति करता है।
After knowing that karmic influxes are impure, of nature
contrary to the Self, and the cause of misery, the Self abstains
from them.
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