समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)
Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary
आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय - 3
ज्ञानी की पहिचान -
कम्मस्स य परिणामं णोकम्मस्स य तहेव परिणामं।
ण करेदि एदमादा जो जाणदि सो हवदि णाणी॥ (3-7-75)
जो आत्मा इस कर्म के परिणाम को, इसी प्रकार नोकर्म के परिणाम को नहीं करता
है, अपितु जो जानता है, वह ज्ञानी है।
The Self who does not get involved in the adoption of the karmic
matter, and, in the same way, the quasi-karmic matter
(nokarma), but is aware of these, is knowledgeable.
ज्ञानी परद्रव्य की पर्यायों में परिणमन नहीं करता -
ण वि परिणमदि ण गिण्हदि उप्पज्जदि ण परदव्वपज्जाए।
णाणी जाणंतो वि हु पोग्गलकम्मं अणेयविहं॥ (3-8-76)
ज्ञानी अनेक प्रकार के पौद्गलिक कर्मों को जानता हुआ भी निश्चय से परद्रव्य की
पर्यायों में न उन स्वरूप परिणमन करता है, न उन्हें ग्रहण करता है, न उन रूप
उत्पन्न होता है।
The knower, while knowing the various kinds of karmic matter,
surely does not manifest himself in the modifications of alien
substances, or assimilate them, or transmute in their form.
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