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सर्वकोश
समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

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पृष्ठ 52

अध्याय - 3
तिदियो कत्तिकम्माधियारो
THE DOER AND THE KARMA
जीव के कर्म-बन्ध कैसे होता है -
जाव ण वेदि विसेसंतरं तु आदासवाण दोण्हं पि।
अण्णाणी ताव दु सो कोहादिसु वट्टदे जीवो॥ (3-1-69)
कोहादिसु वट्टंतस्स तस्स कम्मस्स संचओ होदि।
जीवस्सेवं बंधो भणिदो खलु सव्वदरिसीहिं॥ (3-2-70)
जीव जब तक आत्मा और आस्रव दोनों के ही (भिन्न-भिन्न) लक्षण और भेद को
नहीं जानता है, तब तक वह अज्ञानी क्रोधादिक आस्रवों में प्रवृत्त रहता है। क्रोधादिक
आस्रवों में वर्तते हुए उसके कर्मों का संचय होता है। वास्तव में जीव के इस प्रकार
कर्मों का बन्ध सर्वज्ञदेवों ने बताया है।
So long as the soul (jīva) does not recognize the differences in the
attributes of the Self and the influx of karmas, it remains
ignorant, and indulges in baser emotions like anger. The
Omniscients declare that while indulging in anger etc., the soul
accumulates karmic matter and, in this manner, bondage takes
place.
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