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समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

अध्याय - 8
पुनः (चेतनाचेतन बाह्य) वस्तु का आलम्बन लेकर जीवों के वह रागादि अध्यवसान
होता है। वास्तव में वस्तु से बन्ध नहीं होता, अध्यवसान से ही बन्ध होता है।
Further, the Self, conditioned by objects (external – animate and
inanimate), entertains dispositions of attachment etc. In reality,
objects are not the cause of bondage; it is only due to
dispositions.
मोह-बुद्धि निरर्थक है -
दुक्खिदसुहिदे जीवे करेमि बंधेमि तह विमोचेमि।
जा एसा मूढमदी णिरत्थया सा हु दे मिच्छा॥ (8-30-266)
मैं जीवों को दुखी-सुखी करता हूँ, उन्हें बँधवाता हूँ, छुड़ाता हूँ, तेरी जो ऐसी
मूढ़बुद्धि है वह निरर्थक है, अतः वास्तव में वह मिथ्या है।
That I am responsible for making the other living beings
miserable or happy, cause them to be bound or released, this
assertion of yours is fraught with delusion, is futile, and,
therefore, erroneous, for sure.
पर कर्तृत्व का अहंकार निरर्थक है -
अज्झवसाणणिमित्तं जीवा बज्झंति कम्मणा जदि हि।
मुच्चंति मॉक्खमग्गे ठिदा य ते किं करोसि तुमं॥ (8-31-267)
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अध्याय - 8
यदि वास्तव में अध्यवसान के निमित्त से जीव कर्मों से बँधते हैं और मोक्षमार्ग में
स्थित वे कर्मों से मुक्त होते हैं, तब तू क्या करता है? (अर्थात् दूसरों को
बाँधने-छोड़ने का तेरा अध्यवसान निष्प्रयोजन रहा)।
If, in reality, the living beings get bondages of karmas due to
dispositions, and, treading on the path to liberation, they get
dissociated from such bondages, then what is your role?
(Meaning thereby that your dispositions concerning binding or
releasing others are useless.)
जीव निज को पररूप मानता है -
सव्वे करेदि जीवो अज्झवसाणेण तिरियणोरइये।
देवमणुवे य सव्वे पुण्णं पावं अणेयविहं॥ (8-32-268)
धम्माधम्मं च तहा जीवाजीवे अलोगलोगं च।
सव्वे करेदि जीवो अज्झवसाणेण अप्पाणं॥ (8-33-269)
जीव अध्यवसान के द्वारा तिर्यञ्च, नारक, देव और मनुष्य इन सब रूप और अनेक
प्रकार के पुण्य और पाप इन सब रूप अपने आपको करता है।
तथा उसी प्रकार जीव अध्यवसान के द्वारा धर्म-अधर्म, जीव-अजीव, लोक और
अलोक इन सब रूप अपने को करता है।
The Self, due to his dispositions, identifies himself with various
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अध्याय - 8
states of existence – subhuman (plants and animals), infernal,
celestial, and human beings – and various kinds of bondages
involving merit and demerit.
Similarly, due to his dispositions, he identifies himself with the
medium of motion and the medium of rest, the soul and the non-
soul, and the universe and beyond.
जिनके अध्यवसान नहीं, उनके कर्म-बन्ध नहीं -
एदाणि णत्थि जेसिं अज्झवसाणाणि एवमादीणि।
ते असुहेण सुहेण य कम्मेण मुणी ण लिप्पंति॥ (8-34-270)
ये पूर्व में कहे गये अध्यवसान तथा इसी प्रकार के अन्य भी अध्यवसान जिनके नहीं
हैं, वे मुनि अशुभ और शुभ कर्म से लिप्त नहीं होते हैं।
The ascetics who do not entertain the aforementioned, and
similar other, dispositions remain free from bondages of karmas
that result into merit or demerit.
अध्यवसान के नामान्तर -
बुद्धी ववसाओ वि य अज्झवसाणं मदी य विण्णाणं।
ऍक्कट्ठमेव सव्वं चित्तं भावो य परिणामो॥ (8-35-271)
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अध्याय - 8
बुद्धि, व्यवसाय, अध्यवसान, मति, विज्ञान, चित्त, भाव और परिणाम ये सब
एकार्थक हैं (अर्थात् जीव का परिणाम अध्यवसान है)।
Intellect, resolution, disposition, opinion, logic, reflection,
emotion, and manifestation, all denote the same thing (meaning
that the manifestation of jīva is due to dispositions).
निश्चयाश्रित ही निर्वाण को पाते हैं -
एवं ववहारणओ पडिसिद्धो जाण णिच्छयणयेण।
णिच्छयणयासिदा पुण मुणिणो पावंति णिव्वाणं॥
(8-36-272)
इस प्रकार व्यवहारनय निश्चयनय के द्वारा निषिद्ध जानो; पुनः निश्चयनय के आश्रित
मुनि निर्वाण प्राप्त करते हैं।
Therefore, the empirical point of view (vyavahāra naya) is
contradicted by the transcendental point of view (niṣchaya
naya). The ascetics adopting the transcendental point of view
attain liberation.
अभव्य का चारित्र व्यर्थ है -
वदसमिदीगुत्तीओ सीलतवं जिणवरेहि पण्णत्तं।
कुव्वंतो वि अभव्वो अण्णाणी मिच्छादिट्ठी दु॥
(8-37-273)
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अध्याय - 8
जिनेन्द्रदेव के द्वारा कथित व्रत, समिति, गुप्ति, शील और तप को करता हुआ भी
अभव्य जीव अज्ञानी मिथ्यादृष्टि ही है।
Those incapable of attaining liberation, even though they may
observe vows, carefulness, control, supplementary vows, and
practice austerities as prescribed by the Omniscient, remain
without knowledge and are wrong believers.
अभव्य का शास्त्र-पाठ गुणकारी नहीं है -
मॉक्खं असद्दहंतो अभवियसत्तो दु जो अधीयेज्ज।
पाठो ण करेदि गुणं असद्दहंतस्स णाणं तु॥ (8-38-274)
जो अभव्यजीव है वह शास्त्र तो पढ़ता है, किन्तु मोक्षतत्त्व का श्रद्धान नहीं करता तो
ज्ञान का श्रद्धान न करने वाले उस अभव्य जीव का शास्त्र-पाठ कोई लाभ नहीं करता
है।
The abhavya (one incapable of attaining liberation), even
though he may have studied the scriptures, but having no faith
in the substance (tattva) called liberation (mokṣa), then, not
having faith in true knowledge, his study of the scriptures is of
no use.
अभव्य की श्रद्धा निरर्थक है -
सद्दहदि य पत्तियदि य रोचेदि य तह पुणो वि फासेदि य।
धम्मं भोगणिमित्तं ण हु सो कम्मक्खयणिमित्तं॥ (8-39-275)
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अध्याय - 8
वह अभव्य जीव भोग के निमित्तभूत धर्म का ही श्रद्धान करता है, (उसी की)
प्रतीति करता है, (उसी की) रुचि करता है तथा पुनः (उसी का) स्पर्श करता है,
परन्तु कर्म-क्षय के निमित्तरूप (धर्म की श्रद्धा, प्रतीति, रुचि और स्पर्श) नहीं
करता।
Such a person (incapable of attaining liberation), has faith in the
dharma only to the extent of achieving worldly pleasures; he
loves it, takes interest in it, and touches it. But for the dharma
that is instrumental in dissociation of karmas, he does not have
faith, love, interest or tactile-feeling.
व्यवहार और निश्चय का स्वरूप -
आयारादी णाणं जीवादी दंसणं च विण्णेयं।
छज्जीवणिकं च तहा भणदि चरित्तं तु ववहारो॥
(8-40-276)
आदा हु मज्झ णाणं आदा मे दंसणं चरित्तं च।
आदा पच्चक्खाणं आदा मे संवरो जोगो॥
(8-41-277)
आचारांग आदि शास्त्र ज्ञान है, जीवादि तत्त्व दर्शन जानना चाहिये और छह
जीवनिकाय चारित्र है - इस प्रकार तो व्यवहारनय कहता है।
निश्चय से मेरी आत्मा ही ज्ञान है, मेरी आत्मा ही दर्शन और चारित्र है, मेरी आत्मा
ही प्रत्याख्यान है और मेरी आत्मा ही संवर और योग है (यह निश्चयनय का कथन
है)।
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अध्याय - 8
(Understanding of) the scriptures (Āchārāng) is knowledge,
(belief in) substances like jīva is faith, and (protection of) six
kinds of organisms is conduct; this is the empirical point of view
(vyavahāra naya).
Surely, the Self is knowledge, the Self is faith and conduct, the
Self is renunciation, and the Self is stoppage of karmas, and
yoga; this is the transcendental point of view (niṣchaya naya).
भावकर्म से रागादि परिणति -
जह फलिहमणि विसुद्धो ण सयं परिणमदि रागमादीहिं।
रंगिज्जदि अण्णेहिं दु सो रत्तादीहि दव्वेहिं॥ (8-42-278)
एवं णाणी सुद्धो ण सयं परिणमदि रागमादीहिं।
रागिज्जदि अण्णेहिं दु सो रागदीहि दोसेहिं॥ (8-43-279)
जैसे स्फटिक मणि विशुद्ध है, वह स्वयं लाल आदि वर्ण रूप से परिणत नहीं होती;
परन्तु वह अन्य लाल आदि वर्ण वाले द्रव्यों से लाल आदि रूप परिणमन करती है।
इसी प्रकार ज्ञानी (आत्मा स्वयं तो) शुद्ध है। वह रागादि रूप स्वयं परिणमन नहीं
करता; परन्तु वह अन्य रागादि दोषों से राग रूप परिणमन करता है।
Just as a crystal, which is pure, does not alter its colour by itself,
but when in proximity with coloured (like red) objects, seems to
acquire red tinge, similarly the knowledgeable Self is pure, and
does not acquire modifications like attachment by itself. But due
to dispositions like attachment, its purity gets tainted.
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अध्याय - 8
ज्ञानी रागादि का कर्ता नहीं है -
ण वि रागदोसमोहं कुव्वदि णाणी कसायभावं वा।
सयमप्पणो ण सो तेण कारगो तेसि भावाणं॥ (8-44-280)
ज्ञानी राग, द्वेष, मोह को अथवा कषाय भाव को स्वयं निजरूप नहीं करता है,
इसलिए वह उन भावों का कर्ता नहीं है।
The knowledgeable Self does not, on his own accord, produce in
himself dispositions like attachment, aversion, delusion or
passions. Therefore, he is not the causal agent for these
dispositions.
अज्ञानी रागादि का कर्ता है -
रागम्हि य दोसम्हि य कसायकम्मेसु चेव जे भावा।
तेहिं दु परिणमंतो रागादी बंधदि पुणो वि॥ (8-45-281)
राग के होने पर, द्वेष के होने पर और कषाय कर्मों के होने पर जो भाव होते हैं, उन
रूप परिणमन करता हुआ (अज्ञानी) रागादि को बार-बार बाँधता है।
Due to dispositions of attachment, aversion, and passions, the
psychic manifestations of the ignorant cause bondages of such
karmas, time and again.
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अध्याय - 8
रागादि से कर्मबन्ध होता है -
रागम्हि य दोसम्हि य कसायकम्मेसु चेव जे भावा।
तेहिं दु परिणमंतो रागादी बंधदे चेदा॥ (8-46-282)
राग, द्वेष और कषाय कर्मरूप (द्रव्यकर्म के उदय) होने पर जो रागादि परिणाम होते
हैं, उन रूप परिणमन करता हुआ आत्मा रागादि को बाँधता है।
(निष्कर्ष यह है कि कर्म-बन्ध के कारण रागादि भाव होते हैं और रागादि भाव
कर्म-बन्ध का कारण हैं।)
On the fruition of material karmas pertaining to attachment,
aversion, and passions, the psychic manifestations (like
attachment) of the Self cause bondages of karmas.
(The inference is that karmic bondages cause dispositions, like
attachment; and dispositions, like attachment, cause karmic
bondages.)
───────────────────────
प्रतिक्रमण का स्वरूप -
अप्पडिकमणं दुविहं अपच्चक्खाणं तहेव विण्णेयं।
एदेणुवदेसेण दु अकारगो वण्णिदो चेदा॥ (8-47-283)
अप्पडिकमणं दुविहं दव्वे भावे अपच्चक्खाणं पि।
एदेणुवदेसेण दु अकारगो वण्णिदो चेदा॥ (8-48-284)
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अध्याय - 8
जाव ण पच्चक्खाणं अप्पडिकमणं च दव्वभावाणं।
कुव्वदि आदा ताव दु कत्ता सो होदि णादव्वो॥ (8-49-285)
(पूर्वानुभूत विषयरागादिरूप) अप्रतिक्रमण दो प्रकार का है। इसी प्रकार (भावी
विषयाकांक्षारूप) अप्रत्याख्यान (दो प्रकार का) जानना चाहिये। इस उपदेश से
आत्मा अकारक कहा गया है। अप्रतिक्रमण और अप्रत्याख्यान भी द्रव्य और भावरूप
से दो प्रकार का है। इस उपदेश से आत्मा अकारक कहा गया है। जब तक आत्मा
द्रव्य और भाव का प्रत्याख्यान नहीं करता और प्रतिक्रमण नहीं करता, तब तक वह
आत्मा (कर्मों का) कर्ता होता है, ऐसा जानना चाहिये।
ज्ञानी मुनि को आहार निमित्तक बन्ध नहीं है -
आधाकम्मादीया पोग्गलदव्वस्स जे इमे दोसा।
किह ते कुव्वदि णाणी परदव्वगुणा दु जे णिच्चं॥
(8-50-286)
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अध्याय - 8
आधाकम्मं उद्देसियं च पोग्गलमयं इमं दव्वं।
किह तं मम होदि कदं जं णिच्चमचेदणं वुत्तं॥
(8-51-287)
अधःकर्म आदि जो ये पुद्गलद्रव्य के दोष हैं, उनको ज्ञानी (आत्मा) किस प्रकार
कर सकता है, जो कि सदा परद्रव्य के गुण हैं। यह अधःकर्म और औद्देशिक
पुद्गलमय द्रव्य हैं। वह मेरा किया किस प्रकार हो सकता है जो सदा अचेतन कहा
गया है।
How can a knowledgeable Self be responsible for the results of
actions like preparing food for family and saint, adhahkarma,
which are defects of the material substances, having qualities
alien to those of the Self? Results of actions like adhahkarma,
and food prepared specially for saint (auddeşik), are material in
nature. How can these be my doings as these are perennially
devoid of consciousness?
अट्ठमो बंधाधियारो समत्तो
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अध्याय - 9
णवमो मॉक्खाधियारो
THE LIBERATION
बन्ध के ज्ञानमात्र से मोक्ष नहीं -
जह णाम को वि पुरिसो बंधणयम्हि चिरकालपडिबद्धो।
तिव्वं मंदसहावं कालं च वियाणदे तस्स॥
(9-1-288)
जदि ण वि कुव्वदि छेदं ण मुच्चदे तेण बंधणवसो सं।
कालेण दु बहुगेण वि ण सो णरो पावदि विमॉक्खं॥
(9-2-289)
इय कम्मबंधणाणं पदेसपयडिट्ठिदी य अणुभागं।
जाणंतो वि ण मुच्चदि मुच्चदि सव्वे जदि विसुद्धो॥
(9-3-290)
जैसे बन्धन में बहुत समय से बँधा हुआ कोई पुरुष उस बन्धन के तीव्र-मन्द स्वभाव
को और उसके काल को जानता है, यदि वह उस बन्धन को नहीं काटता है तो वह
उस बन्धन से नहीं छूटता और बन्धन के वश हुआ वह मनुष्य बहुत काल में भी
छुटकारा नहीं पाता।
इसी प्रकार जीव कर्म-बन्धनों के प्रदेश, प्रकृति, स्थिति और अनुभाग को जानता
हुआ भी कर्म-बन्ध से नहीं छूटता। यदि वह रागादि को दूरकर शुद्ध होता है तो
सम्पूर्ण कर्म-बन्ध से छूट जाता है।
•••••••••••••••••••••
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८. बंध अधिकार (राग-द्वेष व बन्धन भेद)

अध्याय - 9
A man, bound in shackles for a long time, knows the nature of his
bondage, intense or feeble, and also its duration. He cannot get
rid of the bondage till the time he is able to break the shackles.
Without such an effort, he cannot get freedom for a very long
time.
In the same way, the Self, while knowing the nature of the
karmic bondages – quantity of space-points, species, duration,
and fruition – does not get rid of these bondages (till he makes an
effort). If he attains purity by abandoning attachment etc., he
can get rid of all karmic bondages.
बन्ध की चिन्तामात्र से मोक्ष नहीं -
जह बंधे चिंतंतो बंधणबद्धो ण पावदि विमोक्खं।
तह बंधे चिंतंतो जीवो वि ण पावदि विमोक्खं॥ (9-4-291)
जिस प्रकार बन्धन में पड़ा हुआ कोई पुरुष उस बन्धन की चिन्ता करता हुआ
(चिन्ता करने मात्र से) छुटकारा नहीं पाता, उसी प्रकार जीव भी कर्म-बन्ध की
चिन्ता करता हुआ (चिन्ता करने मात्र से) मुक्ति नहीं पाता।
Just as a man, bound in shackles, cannot get rid of the bondage
merely by worrying about it, similarly, a man cannot get
liberated from karmic bondage merely by worrying about it.
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अध्याय - 9
कर्म-बन्ध के क्षय से मोक्ष होता है -
जह बंधे छेत्तूण य बंधणबद्धो दु पावदि विमॉक्खं।
तह बंधे छेत्तूण य जीवो संपावदि विमॉक्खं॥ (9-5-292)
जिस प्रकार बन्धन में पडा हुआ कोई पुरुष बन्धनों को काटकर अवश्य ही मुक्ति
प्राप्त करता है, उसी प्रकार जीव कर्म-बन्ध को काटकर मोक्ष प्राप्त करता है।
Just as a man, bound in shackles, can surely get rid of the
bondage by breaking the shackles, similarly, a man can get
liberated if he makes efforts to get rid of the karmic bondage.
भेद-विज्ञान से मोक्ष होता है -
बंधाणं च सहावं वियाणिदुं अप्पणो सहावं च।
बंधेसु जो विरज्जदि सो कम्मविमॉक्खणं कुणदि॥ (9-6-293)
बन्धों के स्वभाव को और आत्मा के स्वभाव को जानकर जो पुरुष बन्धों के प्रति
विरक्त होता है, वह कर्मों से मुक्त होता है।
After knowing the nature of the karmic bondages and also the
nature of the Self, the man who keeps at bay all karmic
bondages, gets liberated.
140

अध्याय - 9
प्रज्ञा से भेद-विज्ञान होता है -
जीवो बंधो य तहा छिज्जंति सलक्खणेहि णियदेहिं।
पण्णाछेदणएण दु छिण्णा णाणत्तमावण्णा॥ (9-7-294)
जीव तथा बन्ध ये दोनों अपने-अपने निश्चित लक्षणों के द्वारा पृथक् किये जाते हैं।
प्रज्ञा रूपी छुरी के द्वारा छेदे हुए (पृथक् किये हुए) ये नानारूप हो जाते हैं (पृथक्
हो जाते हैं)।
The Self and the karmic bondage are differentiated on the basis
of their own intrinsic nature. These two are chiselled
(separated) with the help of the instrument of self-
discrimination.
भेद-विज्ञान होने पर जीव का कर्त्तव्य -
जीवो बंधो य तहा छिज्जंति सलक्खणेहि णियदेहिं।
बंधो छेदेदव्वो सुद्धो अप्पा य घेंत्तव्वो॥ (9-8-295)
जीव तथा बन्ध अपने-अपने निश्चित लक्षणों के द्वारा पृथक् किये जाते हैं। वहाँ बन्ध
को तो (आत्मा से) पृथक् कर देना चाहिये और शुद्ध आत्मा को ग्रहण करना
चाहिये।
The Self and the karmic bondage are differentiated (and
separated) on the basis of their own intrinsic nature. The karmic
bondage should be discarded and the pure soul ought to be
realized.
141

अध्याय - 9
प्रज्ञा के द्वारा ही आत्मा को ग्रहण करना चाहिये -
किह सो घेप्पदि अप्पा पण्णाए सो दु घेप्पदे अप्पा।
जह पण्णाइ विहत्तो तह पण्णाएव घेत्तव्वो॥ (9-9-296)
(शिष्य गुरू से पूछता है) वह शुद्ध आत्मा कैसे ग्रहण किया जा सकता है?
(आचार्य उत्तर देते हैं) वह शुद्ध आत्मा प्रज्ञा के द्वारा ग्रहण किया जाता है। जैसे
(पहले) प्रज्ञा के द्वारा विभक्त किया था, उसी प्रकार प्रज्ञा के द्वारा ही ग्रहण करना
चाहिये।
(The disciple asks –) “How can one realize that pure soul?” (The
Āchārya replies –) “That pure soul can be realized through self-
discrimination. As earlier the pure soul was separated from the
karmic bondage through self-discrimination, in the same way,
the pure soul is realized through self-discrimination.”
मैं चिदात्मा हूँ -
पण्णाए घेत्तव्वो जो चेदा सो अहं तु णिच्छयदो।
अवसेसा जे भावा ते मज्झ परे त्ति णादव्वा॥ (9-10-297)
प्रज्ञा के द्वारा इस प्रकार ग्रहण करना चाहिये कि जो चिदात्मा है, निश्चय से वह मैं
हूँ; शेष जो भाव हैं, वे मुझसे पर हैं, यह जानना चाहिये।
Through self-discrimination, one must realize that ‘I’ is really
the ‘pure consciousness’; and, further, that all other dispositions
are not part of oneself.
.......................
142

अध्याय - 9
मैं दृष्टा मात्र हूँ -
पण्णाए घेत्तव्वो जो दट्ठा सो अहं तु णिच्छयदो।
अवसेसा जे भावा ते मज्झ परे त्ति णादव्वा॥ (9-11-298)
प्रज्ञा के द्वारा इस प्रकार ग्रहण करना चाहिये कि जो देखने वाला दृष्टा है, निश्चय से
वह मैं हूँ; शेष जो भाव हैं, वे मुझसे पर हैं, यह जानना चाहिये।
Through self-discrimination, one must realize that ‘I’ is really
the ‘seer’ who sees; and, further, that all other dispositions are
not part of oneself.
मैं ज्ञातामात्र हूँ -
पण्णाए घेत्तव्वो जो णादा सो अहं तु णिच्छयदो।
अवसेसा जे भावा ते मज्झ परे त्ति णादव्वा॥ (9-12-299)
प्रज्ञा के द्वारा इस प्रकार ग्रहण करना चाहिये कि जो जानने वाला ज्ञाता है, निश्चय से
वह मैं हूँ; शेष जो भाव हैं, वे मुझसे पर हैं, यह जानना चाहिये।
Through self-discrimination, one must realize that ‘I’ is really
the ‘knower’ who knows; and, further, that all other dispositions
are not part of oneself.
143

अध्याय - 9
चिन्मात्र भाव ही अपने हैं -
को णाम भणेज्ज बुहो णादुं सव्वे पराइए भावे।
मज्झमिणं ति य वयणं जाणंतो अप्पयं सुद्धं॥ (9-13-300)
आत्मा को शुद्ध जानता हुआ, शेष सब भावों को पर जानकर कौन बुद्धिमान ‘ये भाव
मेरे हैं' ऐसे वचन कहेगा।
Knowing the Self to be pure, and all dispositions to be alien,
which knowledgeable person will utter these words, ‘These
dispositions belong to me.’?
सापराध और निरपराध आत्मा -
थेयादी अवराहे कुव्वदि जो सो ससंकिदो होदि।
मा बज्झे हं केण वि चोरो त्ति जणम्हि वियरंतो॥
(9-14-301)
जो ण कुणदि अवराहे सो णिस्संको दु जणवदे भमदि।
ण वि तस्स बज्झिदुं जे चिंता उप्पज्जदि कया वि॥
(9-15-302)
एवं हि सावराहो बज्झामि अहं तु संकिदो चेदा।
जो पुण णिरावराहो णिस्संको हं ण बज्झामि॥
(9-16-303)
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अध्याय - 9
जो पुरुष चोरी आदि अपराधों को करता है, वह पुरुष सशंकित रहता है कि मनुष्यों
के बीच घूमते हुए ‘चोर है’ ऐसा जानकर किसी के द्वारा मैं बाँध न लिया जाऊँ। जो
पुरुष अपराध नहीं करता, वह तो देश में निःशंक घूमता है क्योंकि उसके मन में
बँधने की चिन्ता कभी उत्पन्न नहीं होती।
इसी प्रकार अपराधी आत्मा शंकित रहता है कि मैं (ज्ञानावरणादि कर्मों से) बन्ध को
प्राप्त होऊँगा। यदि वह निरपराध हो तो निःशंक रहता है कि मैं नहीं बँधूँगा।
निरपराध आत्मा निःशंक होता है -
संसिद्धिराधसिद्धं साधिदमाराधिदं च एयट्ठं।
अवगदराधो जो खलु चेदा सो होदि अवराधो॥ (9-17-304)
जो पुण णिरावराधो चेदा णिस्संकिदो दु सो होदि।
आराहणाइ णिच्चं वट्टदि अहमिदि वियाणंतो॥ (9-18-305)
संसिद्धि, राध, सिद्ध, साधित और आराधित ये सब एकार्थक हैं। जो आत्मा राधरहित
है (निज शुद्धात्मा की आराधना से रहित है), वह आत्मा अपराध होता है; और जो
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अध्याय - 9
आत्मा निरपराध होता है, वह निःशंक होता है। ऐसा आत्मा 'मैं (उपयोग-स्वरूप
एक शुद्ध आत्मा) हूँ' इस प्रकार जानता हुआ (शुद्धात्मसिद्धिरूप) आराधना से सदा
ही वर्तता है।
विषकुम्भ और अमृतकुम्भ -
पडिकमणं पडिसरणं पडिहरणं धारणा णियत्ती य।
णिंदा गरुहा सोही अट्ठविहो होदि विसकुंभो॥ (9-19-306)
अपडिकमणमपडिसरणमप्पडिहारो अधारणा चेव।
अणियत्ती य अणिंदागरुहासोही अमयकुंभो॥ (9-20-307)
प्रतिक्रमण, प्रतिसरण, परिहार, धारणा, निवृत्ति, निन्दा, गर्हा और शुद्धि - यह आठ
प्रकार का विषकुम्भ है (क्योंकि इसमें कर्तृत्व बुद्धि होती है)।
अप्रतिक्रमण, अप्रतिसरण, अपरिहार, अधारणा, अनिवृत्ति, अनिन्दा, अगर्हा और
अशुद्धि - ये आठ अमृतकुम्भ हैं (क्योंकि इसमें कर्तृत्व का निषेध है)।
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