समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)
Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary
आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय - 8
यदि वास्तव में अध्यवसान के निमित्त से जीव कर्मों से बँधते हैं और मोक्षमार्ग में
स्थित वे कर्मों से मुक्त होते हैं, तब तू क्या करता है? (अर्थात् दूसरों को
बाँधने-छोड़ने का तेरा अध्यवसान निष्प्रयोजन रहा)।
If, in reality, the living beings get bondages of karmas due to
dispositions, and, treading on the path to liberation, they get
dissociated from such bondages, then what is your role?
(Meaning thereby that your dispositions concerning binding or
releasing others are useless.)
जीव निज को पररूप मानता है -
सव्वे करेदि जीवो अज्झवसाणेण तिरियणोरइये।
देवमणुवे य सव्वे पुण्णं पावं अणेयविहं॥ (8-32-268)
धम्माधम्मं च तहा जीवाजीवे अलोगलोगं च।
सव्वे करेदि जीवो अज्झवसाणेण अप्पाणं॥ (8-33-269)
जीव अध्यवसान के द्वारा तिर्यञ्च, नारक, देव और मनुष्य इन सब रूप और अनेक
प्रकार के पुण्य और पाप इन सब रूप अपने आपको करता है।
तथा उसी प्रकार जीव अध्यवसान के द्वारा धर्म-अधर्म, जीव-अजीव, लोक और
अलोक इन सब रूप अपने को करता है।
The Self, due to his dispositions, identifies himself with various
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